'...कितना बदल गया इंसान' लिखने वाले कवि प्रदीप की कहानी - 2 - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 11 अगस्त 2019

'...कितना बदल गया इंसान' लिखने वाले कवि प्रदीप की कहानी - 2

कवि प्रदीप - भाग 2

कहीं पे झगड़ा कहीं पे दंगा, नाच रहा नर होकर नंगा
राम के भक्त रहीम के बंदे, रचते रोज़ फ़रेब के फंदे
                          
माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–95

                                                                                      कवि प्रदीप                                                             (फोटो नेट से साभार)

मशाल (1950)
नितिन बोस निर्देशित और अशोक कुमार सुमित्रा देवी वाली मशाल का प्रसिद्ध गीत था : -
ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल,
बीच में धरती वाह मेरे मालिक तू ने किया कमाल,
अरे वाह मेरे मालिक क्या तेरी लीला तू ने किया किया कमाल,
एक फूंक से रच दिया तू ने सूरज अगन को गोला,
एक फूंक से रचा चंद्रमा लाखों सितारों को तोला,
तू ने रच दिया पवन झकोला जिसे देख हमारा मन डोला,
सोच सोच हम करें अचंभा -  नज़र न आता एक भी खंभा,
फिर भी ये आकाश खड़ा है - हुए करोड़ों साल
मालिक, तू ने किया कमाल,
ऊपर गगन विशाल, नीचे गहरा पाताल,
आ हा आ हा आ आ आ,
तू ने रचा एक अद्भुत प्राणी, जिस का नाम इनसान,
इस की नन्हीं प्राण है लेकिन भरा हुआ तूफ़ान,
इस जग में इनसान के दिल को कौन सका पहचान,
इस में भी शैतान बसा है इस में ही भगवान,
बड़े ग़ज़ब का है ये खिलौना, इस की नहीं मिसाल,
मालिक तू ने किया कमाल, ऊपर गगन विशाल.
नास्तिक (1954)
फ़िल्मिस्तान के लिए शशधर मुखर्जी के लिए अपनी लिखी नास्तिक फ़िल्म का निर्देशन आई.एस. जौहर ने किया था। संवाद श्रीमती रमा जौहर के थे और गीत कवि प्रदीप के थे। पृष्ठभूमि में था देश का विभाजन। मुख्य कलाकार थे नलिनी जयवंत, राज मेहरा, उल्हास और महमूद।
इस का प्रसिद्ध गीत देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान स्वयं कवि प्रदीप ने गाया था:
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,
कितना बदल गया इनसान,
सूरज न बदला चांद ना बदला,
कितना बदल गया इनसान,
आया समय बड़ा बेढंगा,
आज आदमी बना लफंगा,
कहीं पे झगड़ा कहीं पे दंगा,
नाच रहा नर हो कर नंगा,
छल और कपट के हाथों अपना बेच रहा ईमान,
कितना बदल गया इनसान,
राम के भक्त रहीम के बंदे,
रचते रोज़ फ़रेब के फंदे,
कितने ये मक्कार ये अंधे,
देख लिए इन के भी धंधे,
इन की काली करतूतों से हुआ ये मुल्क मशान,
कितना बदल गया इनसान
जो हम आपस में ना झगड़ते,
बने हुए क्यों खेल बिगड़ते,
काहे लाखों घर ये उजड़ते,
क्यों ये बच्चे मां से बिछड़ते,
फूट फूट कर क्यों रोते प्यारे बापू के प्राण,
कितना बदल गया इनसान,
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,
कितना बदल गया इनसान


जागृति (1954)
सत्येन बोस ने अपना बांग्ला फ़िल्म परिवर्तन आधार बना कर हिंदी में बनाई थी जागृति। बिगड़ैल बच्चे अजय (राज कुमार गुप्ता) को बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। स्कूल का संचालक शेखर (अभि भट्टाचार्य) बच्चों को देश की धरोहर के माध्यम से सुधारने में सफल होता। इसके सभी प्रसिद्ध गीत लिखे थे कवि प्रदीप ने। इन में से तीन गीत हैं:
-1.
आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की,
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम वंदे मातरम, वंदे मातरम वंदे मातरम
ये है अपना राजपूताना नाज़ इसे तलवारों पे,
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे,
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे,
कूद पड़ी थी यहां हज़ारों पद्मिनियां अंगारों पे,
बोल रही है कण कण से कुरबानी राजस्थान की,
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की,
वंदे मातरम वंदे मातरम
देखो मुल्क मराठों का यह, यहां शिवाजी डोला था,
मुग़लों की ताकत को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था,
बोली हरहर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था,
शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की,
इस मिट्टी से तिलक करोये धरती है बलिदान की,
जलियांवाला बाग़ ये देखो, यहीं चली थी गोलियां,
ये मत पूछो किस ने खेली यहां ख़ून की होलियां,
एक तरफ़ बंदूकें दन दन एक तरफ़ थी टोलियां,
मरनेवाले बोल रहे थे इन्कलाब की बोलियां,
यहां लगा दी बहनों ने भी बाजी अपनी जान की,
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की,
वंदे मातरम वंदे मातरम
आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झाँकी हिंदुस्तान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की,
वंदे मातरम वंदे मातरम, वंदे मातरम वंदे मातरम
वंदे मातरम वंदे मातरम
वंदे मातरम वंदे मातरम
-2
पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के,
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के,
मंज़िल पे आया मुल्क हर बला को टाल के,
सदियों के बाद फिर उड़े बादल गुलाल के,
हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के
तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के,
इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के,
देखो कहीं बरबाद ना होए ये बगीचा,
इसको हृदय के ख़ून से बापू ने है सींचा,
रक्खा है ये चिराग़ शहीदों ने बाल के,
इस देश को...
दुनिया के दांव पेंच से रखना ना वास्ता,
मंज़िल तुम्हारी दूर है लम्बा है रास्ता,
भटका ना दे कोई तुम्हें धोखे में डाल के,
इस देश को...
ऐटम बमों के ज़ोर पे ऐंठी है ये दुनिया,
बारूद के इक ढेर पे बैठी है ये दुनिया,
तुम हर क़दम उठाना ज़रा देख भाल के,
इस देश को...
आराम की तुम भूल भुलय्या में ना भूलो,
सपनों के हिंडोलों पे मगन होके ना झूलो,
अब वक़्त आ गया है मेरे हंसते हुए फूलों,
उठो छलांग मार के आकाश को छू लो,
तुम गाड़ दो गगन पे तिरंगा उछाल के,
हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के,
इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के
-3.  
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्‌ग बिना ढाल,
साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल,
आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल,
साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल,
दे दी हमें आज़ादी
धरती पे लड़ी तू ने अजब ढंग की लड़ाई,
दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई,
दुश्मन के किले पर भी न की तू ने चढ़ाई,
वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई,
चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल,
साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल,दे दी हमें आज़ादी
रघुपति राघव राजा राम
शतरंज बिछा कर यहां बैठा था ज़माना,
लगता था मुश्किल है फ़िरंगी को हराना,
टक्कर थी बड़े ज़ोर की दुश्मन भी था ताना,
पर तू भी था बापू बड़ा उस्ताद पुराना,
मारा वो कस के दांव के उलटी सब की चाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल,
दे दी हमें आज़ादी
रघुपति राघव राजा राम
जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े,
मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े,
हिंदू और मुसलमान, सिख पठान चल पड़े,
कदमों में तेरी कोटि कोटि प्राण चल पड़े,
फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल,
साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल,
दे दी हमें आज़ादी
रघुपति राघव राजा राम
मन में थी अहिंसा की लगन, तन पे लंगोटी,
लाखों में घूमता था लिए सत्य की सोंटी,
वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी,
लेकिन तुझे झुकती थी हिमालय की भी चोटी,
दुनिया में भी बापू तू था इन्सान बेमिसाल,
साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल,
दे दी हमें आज़ादी
रघुपति राघव राजा राम
जग में जिया है कोई तो बापू तू ही जिया,
तू ने वतन की राह में सब कुछ लुटा दिया,
माँगा न कोई तख्त न कोई ताज भी लिया,
अमृत दिया तो ठीक मगर ख़ुद ज़हर पिया,
जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल,
साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल,
दे दी हमें आज़ादी
रघुपति राघव राजा राम

युवा कवि प्रदीप और वृद्धावस्था में कवि प्रदीप 

पैग़ाम (1959)
चेन्नई (तब मद्रास) के सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक की पैग़ाम के मुख्य कलाकार थे दिलीप कुमार, वैजयंती माला, राज कुमार, सरोजा देवी, मोतीलाल और जानी वाकर। कवि प्रदीप के गीतों को स्वरबद्ध किया था सी. रामचंद्र ने। कहानी थी दो भाई रतन (दिलीप) और राम (राज कुमार) की। एक मिल मालिक का समर्थक है दूसरा विरोधी। यूनियन की, हड़ताल की। मैं उस का टाइटिल गीत उद्धृत कर रहा हूं:
इनसान का इनसान से हो भाईचारा,
यही पैग़ाम हमारा, यही पैग़ाम हमारा...
नए जगत में हुआ पुराना - ऊंच नीच का क़िस्सा
सब को मिले मेहनत के मुताबिक़ - अपना अपना हिस्सा
सब के लिए सुख का बराबर हो बंटवारा
यही पैग़ाम हमारा, यही पैग़ाम हमारा...
हरेक महल से कहो के झोपड़ियों में दिए जलाएं
छोटों और बड़ों में अब कोई फ़र्क़ नहीं रह जाए
इस धरती पर हो प्यार का - घर घर उजियारा
यही पैग़ाम हमारा, यही पैग़ाम हमारा...
इनसान का हो इनसान से भाईचारा
-
अंत में:
संबंध (1969)
शशधर मुखर्जी की अजय विश्वास निर्देशित फ़िल्म संबंध का संबंध बनते, बिगड़ते, बनते, संवरते रिश्तों से है। मुख्य कलाकार थे देव मुखर्जी (तीन पात्र), अंजना मुमताज, प्रदीप कुमार, अचला सचदेव, अभि भट्टाचार्य, सुलोचना आदि। कवि प्रदीप के गीतों को स्वरबद्ध किया था ओ.पी. नैयर ने। उस के लोकप्रिय गीत थे-
-1.
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला,
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला
हज़ारों मील लंबे रास्ते - तुझको बुलाते,
यहां दुखड़े सहने के वास्ते - तुझको बुलाते,
हैं कौन सा वो इंसान यहां पर - जिसने दुख ना झेला,
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला
तेरा कोई साथ ना दे तो, तू ख़ुद से प्रीत जोड़ ले,
बिछौना धरती को कर के, अरे आकाश ओढ़ ले,
यहां पूरा खेल अभी जीवन का तू ने कहां हैं खेला,
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला...

(100वें भाग की झलक पाने के लिए ऊपर के वीडियो को देखें)
-2.
किस बाग़ में मैं जन्मा, खेला, मेरा रोम - रोम यह जानता है,
तुम भूल गए शायद, माली, पर फूल तुम्हें पहचानता है,
जो दिया था तुम ने इक दिन, मुझे फिर वो प्यार दे दो,
इक कर्ज़ मांगता हूं, बचपन उधार दे दो...
तुम छोड़ गए थे जिस को -इक धूलभरे रस्ते में,
वो फूल आज रोता है, इक अमीर के गुलदस्ते में,
मेरा दिल तड़प रहा है, मुझे फिर दुलार दे दो,
इक कर्ज़ मांगता हूं, बचपन उधार दे दो...
मेरी उदास आंखों को -है याद वो वक़्त - सलोना,
जब झूला था बांहों मेंमैं - बन के तुम्हारा खिलौना,
मेरी वो ख़ुशी की दुनिया, फिर एक बार दे दो,   
इक कर्ज़ मांगता हूं, बचपन उधार दे दो...
तुम्हें देख नाच उठते हैं, मेरे पिछले दिन वो सुनहरे,
और दूर कहीं दिखते हैं, मुझसे बिछड़े वो चेहरे,
जिसे सुनके घर वो लौटे, मुझे वो पुकार दे दो,
इक कर्ज़ मांगता हूं, बचपन उधार दे दो...
जो दिया था तुम ने इक दिन, मुझे फिर वो प्यार दे दो।

अरविंद कुमार

सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)      


अरविंद कुमार को सुनने के लिए ऊपर के वीडियो लिंक को क्लिक करें

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