फिल्मों की रानी डेज़ी ईरानी की दर्द भरी ‘वो’ कहानी... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 1 सितंबर 2019

फिल्मों की रानी डेज़ी ईरानी की दर्द भरी ‘वो’ कहानी...

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–98
 
डेजी ईरानी : तब और अब 
पैसे या नाम के लिए बच्चियों को फ़िल्म या टीवी पर रीयल्टी शो में अकेली मत भेजो – साथ जाओ और रहो!”

डेज़ी का जन्म सन् 1950 में गुजराती-भाषी पारसी परिवार में हुआ था। पिता थे नौशेर और मां थी पेरिन ईरानी। पांच साल की उम्र से ही फ़िल्मों में काम करने लगी थी। उस की बहन हनी का भी यही हाल था। इसीलिए डेज़ी का कहना है कि हम दोनों ने बचपन कभी जाना ही नहीं। उसकी तीसरी बहन का नाम है मेनका ईरानी। मेनका का विवाह हुआ स्टंट फ़िल्ममेकर कामरान ख़ान से। उस की संतान हैं फ़िल्मकार साजिद ख़ान और फ़राह ख़ान। हनी की बेटी ज़ोया और बेटा फ़रहान फ़िल्मों की मशहूर हस्ती हैं।
डेजी और हनी : बचपन के दिन
डेज़ी ने 1955 से 2005 तक लगभग बयालीस फ़िल्मों काम किया। 1970 तक आते आते वह किशोरी हो गई थी। उस साल की उसकी प्रमुख फ़िल्म थी कटी पतंग जिसमें खलनायक उसे बहका फुसला कर नायिका आशा पारेख के विरुद्ध खड़ा कर देता है, पर बाद में वह समझ जाती है। 1972 तक आते उसने कई साल फ़िल्म जगत छोड़ दिया।
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बंदिश (1955)
सत्येन बोस निर्देशित बंदिश डेज़ी ईरानी की पहली फ़िल्म थी। इसमें टमाटर (डेज़ी) की बात ही निराली धी। नामावली में उसका नाम अशोक कुमार और मीना कुमारी के बाद आता है, पर मेरी नज़र में वे दोनों सुपरस्टार डेज़ी के सह कलाकार थे। अन्य कुछ कलाकार थे नज़ीर हुसैन, सज्जन, शम्मी व महमूद (जो बस एक दृश्य में नौका खिवैया बना गाता नज़र आया था), संगीत हेमंत मुखर्जी का था।
बीमार महेंद्र (नज़ीर हुसैन) से डॉक्टर ने कहा, तुम अब ज़्यादा दिन के नहीं हो!” महेंद्र परेशान हो गया। वह अनाथ टमाटर को पाल रहा था। मेरे बाद इस का क्या होगा?’ तो उसने टमाटर से कहा चल, तुझे तेरे बाप को खोजते हैं। मिल जाए तो छोड़ियो मत!” पार्क में बेंच पर बैठे नौजवान ने भिखारी को कुछ दिया, तो महेंद्र ने तय कर लिया, यह दयालु इनसान ही टमाटर का नया पिता बनने लायक़ है। वह नौजवान था कमल (अशोक कुमार) – धनी घराने का बिगड़ा बेटा - पीने पिलाने का शौक़ीन, कई गर्ल फ़्रैंडों से एक साथ रोमांस में मशग़ूल। महेंद्र ने टमाटर से कहा है, यही है तेरा खोया बाप। जा, और उसे छोड़ियो मत!” धीरे-धीरे सरकता टमाटर नए पिता कमल के पास पहुंच गया। उसे पापा कहने लगा। कमल हैरान। उसने सोचा बच्चे को बेंच पर बैठा छोड़ सरक लूंगा। कुछ क़दम ही गया था, कुछ लोगों ने समझा यह शख़्स बेटे को छोड़ भाग रहा। जो शोर शराबा हुआ उससे लाचार कमल को टमाटर को कार में अपने साथ ले ही जाना पड़ा। कमल कई कोशिश करता है उसे छोड़ने की पर टमाटर तो चिपक ही गया है, पापा को छोड़ने को तैयार ही नहीं है।

                        100वें भाग की एक झलक, सबको है इंतजार 

एक और जगह दोनों बैठे हैं। कमल के पर्स में कई फ़ोटो हैं। एक है उषा (मीना कुमारी) का। फ़्लैशबैक में हम देखते हैं किस तरह कमल के बाप (बिपिन गुप्ता) ने उषा से उसकी शादी स्वीकार नहीं की थी। बस, अब कमल ने टमाटर से छुट्टी पाने की जुगत निकाली। उषा के घर ले गया टमाटर को और समझा दिया –यह है तेरी मां। उषा ने एक रात के लिए रख लिया उसे। अब टमाटर नई मां से चिपक लिया! और उषा के दिल से भी चिपक गया टमाटर। (डेज़ी का कहना है, अपनी मां से मुझे उतना प्यार कभी नहीं मिला जितना मीना कुमारी ने मुझे दिया।) लेकिन उषा के घर से ले जाना ही पड़ा टमाटर को। बेचारा कई कोशिश करता है। नाटक घर में छोड़ना चाहता है। वहां उषा मंच पर नाटक कर रही थी। टमाटर पहुंच गया मंच पर, बोला, मम्मी!” एक बार फिर टमाटर कमल के पास।
एक बार कमल सचमुच टमाटर से मुक्त होने में सफल होता प्रतीत होता है। रात को दूर-दराज़ बेंच पर उसे सुला कर घर चला आया। चलो, छुट्टी मिली टमाटर से! सुबह हुई। दो लोगों ने देखा रोता टमाटर। आस-पास टटोला। बटुए में कुछ रुपए छोड़ गया था कमल। बटुए में कमल का विज़िटिंग कार्ड भी था। भले मानस घर पहुंचा आए टमाटर को। कमल ने उसे ऊपर अपने कमरे में छिपा लिया। अब हुआ यह कि टमाटर साहब टहलते टहलते नीचे आ पहुंचे। कमल के पिता (बिपिन गुप्ता) और मां (प्रतिमा देवी) के दिल से चिपक गया टमाटर। कमल के पास कोई जवाब नहीं कि टमाटर उसे पापा क्यों कहता है। रिश्तेदार आते, बच्चे के बारे में पूछते। दादा दादी के पास कोई जवाब नहीं! नाराज़ रिश्तेदार इल्जाम लगाते चले जाते। टमाटर से पूछा,तेरी मां का नाम क्या है?” टमाटर बोला, उषा!” अंततः टमाटर बन जाता है बहाना कमल और उषा की शादी का। पूरी फ़िल्म बंदिश चिपकी है टमाटर से। और टमाटर चिपक जाता है दर्शकों के दिल से।
इस तरह अपनी पहली फ़िल्म से ही पांच साल की बच्ची डेज़ी सुपरस्टार बन गई। (‘बंदिश ही नहीं अन्य अनेक फ़िल्मों में डेज़ी लड़का बनी है। परदे पर उस का नाम आता है – रूप कुमार।)

                                                              माधुरी सिनेवार्ता क्यों, सुनें अरविंद कुमार की जुबानी  
भाई भाई (1956)
अपनी दूसरी फ़िल्म भाई भाई में भी वह अशोक (अशोक कुमार) का बेटा थी मुन्ना, मां थी लक्ष्मी (निरूपा राय)। अशोक दोनों को छोड़ कर बंबई में लालची संगीता (श्यामा) से प्रेम में फंस गया है। अशोक का छोटा भाई था राज (किशोर कुमार)। राज ने चोरी की थी तो बाप ने उंगलियां काटने की धमकी क्या दी कि वह भाग लिया और जेबकतरा राजा बन कर बंबई पहुंच गया है। मुख्य कहानी है लक्ष्मी और मुन्ना के बंबई जा कर अशोक की खोज में भटकते रहने की। अनपहचाना राजा शरण देता है भाभी और भतीजे को। फ़िल्म का अंत सुखद होता है। करुणा के दृश्य पैदा करने के काम आता है मुन्ना (डेज़ी)।
डेज़ी की दूसरी फ़िल्म भी सफल! अब उसे चोटी तक पहुंचने से रोकने वाला कोई नहीं था। परदे पर उसे ज़्यादा से ज़्यादा रखने के लिए फ़िल्मों नए नए दृश्य जोड़े जाने लगे। एक समय ऐसा आया जब उस के लिए फ़िल्में लिखी जाने लगीं। पोस्टरों में विज्ञापनों में भी उस का नाम और फ़ोटो प्रमुखता से दिखाए जाने लगे-जैसे नया दौर के पोस्टर में।
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1956 में ही डेज़ी देवता, एक ही रास्ता और जागते रहोमें भी आई।
-देवता (1956)
देवता (नाग देवता) एक सफल तमिल फ़िल्म का हिंदी रीमेक थी। निर्माता सदाशिव ब्रह्मन के लिए निर्देशन किया था पट्टन ने। मुख्य कलाकार थे वैजयंती माला, जैमिनी गणेशन, अंजलि देवी और डेज़ी ईरानी के साथ आग़ा, विपिन गुप्ता, कृष्णा कुमारी और नंबियार। संगीतकार सी. रामचंद्र और गीतकार राजेंदर क्रिशन।
राजा की आंखें जाती रहीं। ठीक करने के लिए चाहिए सर्पलोक के नागी ज्योती। राजकुमारी अंजलि देवी का प्रेमी जैमिनी गणेशन निकलता है सर्पलोक से नागी ज्योती लाने। सर्पलोक की रानी है नागिन वैजयंती माला। उसके अधीन एक सांप के फण में थी नागी ज्योती। जैमिनी गणेशन नागिन वैजयंती माला से प्रेम का नाटक कर के नागी ज्योती लाने में सफल होता है, लेकिन नागिन वैजयंती माला के शाप से कुरूप और विद्रूप हो जाता है। फिर भी राज कुमारी ने उस से विवाह कर लिया। शीघ्र बेटा (डेज़ी) जन्म लेता है। मां बेटे के कठोर जतन से पिता फिर से सुंदर हो जाता है। अब तीनों सुख से रहते हैं। यह अजब कहानी दर्शकों को बांधे रखती है और डेज़ी की लोकप्रियता बढ़ाने में सहायक होती है।

सुनील दत्त, मीना कुमारी और डेजी ईरानी

-एक ही रास्ता (1956)
बी.आर. चोपड़ा की अपनी कंपनी की पहली फ़िल्म एक ही रास्ता के चार मुख्य पात्र थे अमर (सुनील दत्त), मालती (मीना कुमारी), उनका बेटा राजा (डेज़ी) और अविवाहित प्रकाश (अशोक कुमार)। प्रकाश की ही कंपनी का मैनेजर है अमर। इन चारों में घना आपसी हेलमेल है। अमर ने एक सहकर्मी मुंशी बिहारी (जीवन) को चोरी क्या पकड़ी, बिहारी ने अमर पर ट्रक चलवा दिया... अंततः अमर मर गया। अमर के घर प्रकाश का शुरू से ही आना जाना था। अब प्रकास मालती की सहायता करता है। बिहारी इन्हें बदनाम करता है। अब मालती ने प्रकाश से शादी कर ली। बिहारी राजा को राजा किसी भी तरह प्रकाश को पिता मानने से इनकार करता है और एक दिन मार देता है...
एक समीक्षक ने लिखा है: राजा का चरित्र चित्रण सूक्ष्म है और डेज़ी ने ख़ूबी से निभाया भी है। पहले भाग में वह लाड़ से बिगड़ा बच्चा होने के साथ समय से पहले अक़्लमंद बच्चा है, बिहारी उसे प्रकाश के ख़िलाफ़ भड़का रहा है, दूसरे भाग में वह समझ नहीं पा रहा जो हो रहा है वह क्या है, क्यों है, पिताजी अस्पताल में हैं, कभी घर क्यों नहीं आते, प्रकाश बाबू को मम्मी अपने बाल क्यों सहलाने देती हैं? हम लोग उन के घर में रहने क्यों आ गए? हम अपने घर कब जाएंगे पिताजी के पास? वह है तो बच्चा ही। अजीब हरक़तें कर बैठता है! संक्षेप में: बढ़िया पटकथा, बच्चों की अच्छी समझ, और बेहतरीन ऐक्टिंग!”
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-जागते रहो (1956)
राज कपूर द्वारा निर्मित, अमित मैत्रा और शंभु मित्र द्वारा निर्देशित ख़्वाज़ा अहमद अब्बास लिखित, सलिल चौधरी द्वारा स्वरबद्ध शैलेंद्र और प्रेम धवन के गीतों वाली जागते रहो हिंदी की क्लासिक फ़िल्मों गिनी जाती है। दसियों अपार्टमैंटों की बहुमंज़िला इमारत में गाँव से नया आया राजू (फ़िल्म में उस का कोई नाम नहीं है – राज कपूर) पानी पीने क्या आया, चौकीदार और निवासियों ने चोर चोर का शोर मचा दिया, जब कि वहां के सब लोग किसी न किसी तरह की चोरी में लिप्त थे।
जैसे तैसे बचता राजू ग्राउंड फ़्लोर पर गिर कर बेहोश सा हुआ तो उसे उठा रही थी प्रेम, स्नेह और सद्भाव के भरपूर एक भोली-भाली बच्ची (डेज़ी ईरानी – उल्लेखनीय है कि यह पहली फ़िल्म है जिस में वह लड़का नहीं है)। राजू को जीवन में नई किरण दिखती है। सामने मंदिर में पुजारन (नरगिस) गा रही है मानव प्रेम का गीत:“जागो मोहन प्यारे जागो!”
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अगले साल 1957 में आईं उसकी छह फ़िल्में –
-भाभी (1957). एवीएम प्रोडक्शन, सहकलाकार बलराज साहनी, पंढरी भाई और नंदा, पारिवारिक हृदयद्रावक ड्रामा।
मुसाफ़िर (1957). हृषीकेश मुखर्जी की पहली फिल्म, डेज़ी इसके तीसरे खंड में आती है। इसी खंड में है वह गीत मुन्ना बड़ा प्यारा क्यों न हम रोटियों का पेड़ एक लगा लें आम तोड़ें रोटी तोड़ें आम रोटी खा लें।
-नया दौर (1957.बी.आर. चोपड़ा निर्मित-निर्देशित दिलीप कुमार, वैजयंती माला वाली नया दौर मानव और मशीन के बीच (दिलीप कुमार के तांगे और जमींदार की बस के बीच प्रतियोगितात्मक दौड़ की कहानी थी। जीत तांगे की होती है। डेज़ी है दिलीप कुमार, वैजयंती माला का बेटा।
-सुवर्ण सुंदरी (1957). (तमिल और बाद में हिंदी में बनी तथाकथित स्वैशबकलिंग (तलवारबाज़ी आदि से भरपूर नायक और उस विरोधियों के बीच रोमांचक दृश्यों वाली फ़ैंटेसी फ़िल्म थी। निर्माता थे पी.आदिनारायण राव और निर्देशक थे वेदांतम राघवैया। हीरो हीरोइन थे अक्किनैनी और अंजलि देवी।
-यार पैयां (1957). (किस का बेटा) तमिल फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे जैमिनी गणेशन, के. सावित्री और डेज़ी ईरानी। कहानी कुछ बंदिश जैसी थी। पूरी (डेज़ी) को पता नहीं वह किस की बेटी है। पार्क में बैंच पर बैठे सुंदरराजन (जैमिनी गणेश) से उसका नाम पूछा, उस ने बताया तो कह दिया,“तुम ही मेरे बाप हो!”
-हम पंछी एक डाल के (1957). बच्चों के लिए बनी पी.एल. संतोषी का शीर्षक ही कह रहा है कि सभी वर्गों और जातियों के बच्चे एक ही देश की संतान हैं। तमाम बच्चे एक साथ ट्रिप पर हैं – उनमें प्रमुख हैं मास्टर रोमी, सतीश व्यास और डेज़ी ईरानी। एक समीक्षक ने लिखा है- फ़िल्म की हाईलाइट है डेज़ी ईरानी। नटखट चटपट के रोल में वह पूरा धमाल ही है। उसका पल पल परिवर्तित भावपूर्ण मनमोहक चेहरा जादू कर जाता है।
नया दौर : दिलीप कुमार, बैजयंती माला और डेजी ईरानी
 इसके बाद बाल कलाकार के रूप में सोहराब मोदी की जेलर (1958),अस्पी ईरानी की क़ैदी नंबर 911(1959) और तारा हरीश कीदो उस्ताद(1959) में राज कपूर और मधुबाला के साथ दिखाई दी।
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बाल कलाकार जीवन समाप्त हो चुका था। इक्कीस साल की डेज़ी की अंतिम फ़िल्म थी शक्ति की कटी पतंग
तब डेज़ी ने फ़िल्म पटकथा लेखक के. के. शुक्ला से शादी (21 जनवरी 1971) के बाद कई सालों तक फ़िल्मों में काम नहीं किया। तीन बच्चे हुए – बेटा कबीर, बेटियां वर्षा और ऋतु। इन तीनों का फ़िल्म जगत कैसा भी संबंध नहीं है। जन्म से पारसी होने पर भी डेज़ी बाद में ईसाई बन गई।
पति की मृत्यु के बाद सन् 1980 वाले दशक में वह नाटकों में सक्रिय हुई। कुछ टीवी सीरियल किए।
2010 में वह साजिद ख़ान की हाउस फ़ुल्ल और  2012 में फ़राह ख़ान की बेला सहगल निर्देशित शीरीं फ़रहाद की तो निकल पड़ी में दिखाई दी।
-भयानक याद डेज़ी की
सन् 2018 की 25 मार्च। डेज़ी ने बताई उनसठ साल पहले की वह बात जो तब से उसे सालती रही थी। क्रूर यौन शोषण की बात। तब वह छह साल की थी।हम पंछी एक डाल के (1957) की शूटिंग हो रही थी। जिस शख़्स पर उसकी देखभाल का, रक्षा का, भार सौँपा गया था उसी ने उसे दबोच लिया। वह असहाय थी। दुष्कर्म के बाद डराया धमकाया, किसी को कुछ न बताने का आदेश भी दिया गया।
डक्कन क्रानिकल की उमा रामा सुब्रामणियन ने यह वाक़या इस तरह बयान किया है:
[इतने साल बीत जाने पर भी डेज़ी उस भयानक याद को भुलाने की कोशिश करती रहती है, पर भुला नहीं पाती। अभी तक इससे उबर नहीं पाई है। आज मैं 87 साल की हूं। जब भी वह घटना याद आती है मैं मानों जम जाती हूं। हमेशा रहने वाली दर्दनाक याद है यह - जैसे जीवन में कोई गहरी अमिट दरार पड़ गई हो!
बचपन में क्या पता होता है कौन सी छुअन सही है, कौन सी ग़लत? बाल कलाकार के आसपास ढेरों लोग होते हैं। पर बच्चा इन में से किसी को कुछ कैसे बता सकता है?”

"वह घटना याद आती है तो जम जाती हूं"
डेज़ी दोष मां बाप को भी देती है,“मम्मी अड़ी थीं मुझे फ़िल्मी सितारा बनाने पर! तरह तरह के दबाओं से दबी थी मैं। मैं किसी से कुछ कहती भी तो कौन सुनता। थेंक गॉड, मैं किसी से कुछ नहीं कह पाई। विश्वास कोई करता नहीं, ऊपर से मैं बदनाम ही होती।वह कुकर्मी कभी का मर चुका है। मां को इस का पता दसेक साल बाद चला। तब मैं पंदरह साल की थी। मां शर्मिंदा थीं। माफ़ी मांगती रहीं!”

डेज़ी का कहना है, मैंने देखा है फ़िल्मों में हालात बदतर होते जा रहे हैं। लोग गिरते जा रहे हैं। बाल कलाकारों की हालत अच्छी नहीं है। मेरी समझ में आता ही नहीं कि इतनी कम उम्र के बच्चों कच्चों को इंडस्ट्री में क्यों धकेलते हैं! लोग हैं कि खिंचे आते हैं नाम और दाम के लिए। चलो पैसा कमाओ पर लालची तो मत बनो। मां बाप का काम है चौंकन्ना रहना, सब पर निगाह रखना। मेरा कहना है बच्चे बच्चियों को भेजना है तो अकेले मत भेजो।]
अंत में डेज़ी कहती है, बच्चों को बचपन का सुख भोगने दो।

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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

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