गुरुदत्त की आर-पार कथा ! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 27 अक्तूबर 2019

गुरुदत्त की आर-पार कथा !


गुरुदत्तावली – दो 

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–106


गुरुदत्त की अंतिम फ़िल्म - बहारें फिर भी आएंगी
पिछला रविवार समर्पित था गुरुदत्त के अंतिम दिन को। गुरुदत्त पर मेरी दूसरी क़िस्त में पहले पढ़ें उनकी उस अंतिम फ़िल्म के बारे में जो वह पूरी नहीं कर पाए। यह थी बहारें फिर भी आएंगी’ - उनका ड्रीम प्रोजेक्ट। फ़िल्म बहुत नहीं बन पाई थीउनकी अकाल मृत्यु के कारण रुक गई। कुछ समय बाद गुरुदत्त की कंपनी के अंतर्गत पूरी कराई उनके छोटे भाई और सहायक निर्देशक आत्माराम ने। आज इस फ़िल्म की नामावली में निर्माता हैं गुरुदत्तलेखक वही है गुरुदत्त का प्रिय अबरारसंगीत भी ओ.पी. नैयर का ही हैकैफ़ी आज़मी के साथ कई और गीतकार हैं – एस.एच. बिहारीअनजान, शैवान रिज़्वी और अज़ीज़ कश्मीरी। मुख्य कलाकारों में माला सिन्हा और तनूजा के साथ नायक गुरुदत्त की जगह धर्मेंद्र हैनिर्देशक गुरुदत्त न होकर उस ज़माने का लोकप्रिय शाहिद लतीफ़ है। जिन दृश्यों में गुरुदत्त थेउन्हें धर्मेंद्र के साथ फिर शूट किया गया।
इस फ़िल्म के बारे में द हिंदू में छपी समीक्षा से कुछ अंश आप के साथ साझा कर रहा हूं: “किसी के चले जाने से दिल उसे और भी चाहने लगता हैउसकी प्रतिभागुण और मेधा का अभाव तीव्रता से खटकता है। बहारें फिर भी आएंगी देखते देखते बार बार याद आते हैं प्रतिभाशालीगुणी और मेधावी गुरुदत्त। शाहिद लतीफ़ कोई नौसिखिए नहीं हैंपर... फ़िल्म में बहार नहीं ला पाए।... हो सकता है कलाकारों के मन पर गुरुदत्त के जाने का अवसाद छाया रहा होऔर वे पूरी तरह रम नहीं सके इस में।... अफ़सोस है कि इस बहार में फूल खिल नहीं पाए।

गुरुदत्त
यह जो प्रतिभाशालीगुणी और मेधावी गुरुदत्त थाउसका जन्म कर्णाटक के कारवाड़ क्षेत्र मूल के चित्रपुर सारस्वत परिवार में 9 जुलाई सन् 1925 को हुआ था। परिवार अपने मूल स्थान दक्षिण कैनरा के तटवर्टी गांव पैनंबुर से यहां आ बसा था। पिता थे शिवशंकर राव पडुकोण और मां थीं वसंती पडुकोण। गुरुदत्त का जन्म का नाम था वसंत कुमार पडुकोण। बचपन में परिस्थितियां कठोर थीं। पिता पहले तो हैड मास्टर थेफिर किसी बेंक में क्लर्क। मां वसंती आरंभ में गृहिणी थींफिर स्कूलों में पढ़ायाप्राइवेट ट्यूशन करती रहीं, कहानियां लिखींबांग्ला उपन्यासों के कन्नड़ अनुवाद किए। मैं बड़े फ़ख़्र से कहना चाहता हूं कि श्रीमती वसंती पडुकोण की लिखी गुरुदत्त की जीवनी माधुरी में धारावाहिक रूप से छपी थी।

माधुरी के पन्ने
परिवार की आर्थिक अवस्था विपन्न कही जा सकती है। मां बाप के परस्पर संबंध अच्छे नहीं थे। मामाओं का व्यवहार शत्रुतापूर्ण था। एक पागल मामा से भयानक मुठभेड़ परिवार की अविस्मरणीय घटना है। गुरुदत्त का छोटा भाई सात महीने का होते होते मर गया और एक दिन बच्चा वसंत कुमार पडुकोण गांव के कूएं में गिर गया! बड़ी मुश्किल से निकाला गया। ज्योतिषी जी ने ग्रहदोष निवारण के लिए बच्चे का नाम गुरु कर दियाजो बाद में गुरुदत्त हो गया। बंगाल में दत्त बड़ा सामान्य सा नाम है। काफ़ी लोग गुरुदत्त को बंगाली ही समझते थे।
पिता शिवशंकर राव को बरमा शैल नाम की पैट्रोल कंपनी में नौकरी मिल गई। तबादले होने लगे। कलकत्ते का हुआ तो परिवार कलकत्ते के पास भवानीपुर में जा बसा। वहीं गुरुदत्त की स्कूली पढ़ाई हुई। इससे आगे वह पढ़ नहीं पाए। भवानीपुर का बंगालीपन उनकी फ़िल्मों में अकसर मिलता है। बच्चा बंगाल में पले बढ़े और नृत्य का शौक़ न हो  यह अजब सी बात होती! गुरुदत्त को उदय शंकर की डांस अकादमीअल्मोड़ामें छात्र वृत्ति के साथ प्रवेश मिल गया। वहां उनके समकालीनों में विजय आनंद भी थे। आर्थिक संकट के चलते अकादमी बंद हो गई। गुरुदत्त ने कलकत्ता पहुंच कर घर तार भेजा, मुझे टेलिफ़ोन ऑपरेटर की नौकरी मिल गई है। जल्दी ही वह ऊब गए। सन् 1944 में मां बाप के पास बंबई आ गए।

माधुरी के पन्ने
दिशा परिवर्तक नया दरवाज़ा खुलने वाला था। खोला एक रिश्तेदार ने – गुरुदत्त को पूना (अब पुणें) की प्रभात फ़िल्म कंपनी में तीन साल का कंट्रैक्ट मिल गया। मुख्य काम था नृत्य निर्देशन। यहां अपनी पहली फ़िल्म चांद में वह कृष्ण बने। 1945 की फ़िल्म लाखारानी में अभिनय भी किया और नृत्य निर्देशन भी और पी.एल. संतोषी की हम एक हैं में नृत्यनिर्देशक के साथ साथ वह सहायक निर्देशक भी बने। यहां उन्हें मिले कुछ दोस्त – देव आनंदरहमान और राज खोसला। उनके जीवन भर ये साथ रहे। उनकी लगभग हर फिल्म में होता था रहमान चाहे प्यासा का लालची और ईर्ष्यालु पब्लिशर हो या चौदहवीं का चांद का दिलफेंक दोस्त या साहब बीबी ग़ुलाम का छोटे बाबू हो। देव आनंद ने अपने निर्माण की पहली फ़िल्म में उसे निर्देशक बनाने का वादा किया था। और उन्होंने यही वादा किया था राज खोसला से।
1947 में प्रभात कंपनी बंद हुई तो बेरोज़गार गुरुदत्त बंबई के माटुंगा में परिवार के साथ रहने लगा। ट्रेन और बस बदल कर दोस्त देव आनंद से मिलने जाता। दोनों फ़िल्मों पर बात करते। इंग्लिश में कहानियां लिखीं। कुछ इलस्ट्रेटिड वीकली ऑफ़ इंडिया में छपीं भी। बंबई में ही दो बड़े निर्देशकों का सहायक बनने का सौभाग्य मिला – अमिय चक्रवर्ती के साथ गर्ल्स स्कूल में और बंबई टाकीज़ के झंडे तले ज्ञान मुखर्जी के साथ संग्राम में।
बाज़ी
अब हुआ यह कि चेतन आनंद ने नवकेतन’ कंपनी बनाईसाथ था छोटा भाई देव आनंद। चेतन आनंद ने रूसी लेखक निकोलाई के नाटक द गवर्नमेंट इंस्पेक्टर पर बनाई अफ़सर। नायक देव आनंदनायिका सुरैयासहकलाकार कन्हैया लालज़ोहरा सहगल। पर यह नाटक ज़्यादा थीफ़िल्म चल नहीँ पाई। चेतन को नई फ़िल्में भी नहीं मिल रही थीं। अब मोर्चा संभाला देव आनंद ने। प्रभात के अपने दोस्त 26-वर्षीय गुरुदत्त पर बाज़ी लगा कर बाज़ी का निर्देशक बना डाला।
किली व्यंजन का नुस्ख़ा का कुछ भी स्वाद निर्भर करता कुक पर। उसी तरह कहानी कुछ भी हो फ़िल्म निर्भर करती है निर्देशक परऔर निर्देशक के ट्रीटमैंट पर। गुरुदत्त ने देव आनंद के अभिनय में नई अदा डाली, अधिक से अधिक शॉट चौड़े कैमरा एंगल से क्लोज़पों और बड़े क्लोज़पों में शूट किएकिसी सीन को इंट्रोड्यूस करने की अपनी नई विधि इस्तेमाल की। पहली बार हिंदी में फ़िल्म न्वार (Film noir)डार्क फ़िल्म’ बनी। नायक है तो बड़े घर का पर उस से अलग हो कर क्राइम की दुनिया में फंसा हैऔर कई मामलों में फंस जाता है। उसके साथ थी उस ज़माने की टॉप अभनेत्री गीता बाली और नई कलाकार कल्पना कार्तिक। 

बाजी में गीता बाली और देव आनंद
कहानी थी मदन (देव आनंद) की। वह सड़क के किनारे जुआ खेलने वाले गिरोह में है। पासे फेंकने से पहले एक लड़की अपना हाथ चुमवाता हैऔर पासे वैसे ही पड़ते हैं जैसे वह चाहता है। उसके परिवार में वह है और है। उसकी छोटी बहन। बहन का इलाज करने डॉक्टर है रजनी (कल्पना कार्तिक – यह उसकी पहली फ़िल्म थी)। रजनी के मन में बसा है मदन। पुलिसिया रमेश (कृष्ण धवन) के मन में बसी है रजनी। एक एजेंट मदन को स्टार होटल के मालिक से मिलवाता है। होटल में ताश पर जुआ भी खेलवाया जाता है। मदन ताश के पत्ते साधने में भी माहिर है। उसकी वज़ह से ताशों का यह ग़ैरक़ानूनी धंधा बहुत कमाऊ हो गया। यह बात समझ में आई तो मदन ने चाहा कि यह धंधा छोड़ दे। होटल का रहस्यपूर्ण मालिक उसे मरवाने की कोशिश करता है। मदन को बचाने की कोशिश में मर जाती है होटल की कैबरे डांसर है नीना (गीता बाली)। उस की हत्या में फंसा दिया गया स्वयं मदन।
अपने नए ट्रीटमैंट के बल पर यह क्लासिक बन गई। गीतों को कहानी आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया। नायक को चेतावनी देने के लिए नीना के कैबरे डांस का गाना सुनो गजर क्या गाए वाला काम में लाया गया था। और पश्चिमी धुन पर बना वह गीत तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले काम आया नायक को मोहने में। यह गीत आज तक लोकप्रिय है। देव आनंद का कहना था इस एक गाने को देखने के लिए भीड़ उमड़ने लगी थी।
आज बाज़ी’ हिंदी की सर्वोत्तम फ़िल्मों में गिनी जाती है। मैं ने इस पर हिंदी फ़िल्म इतिहास के शिलालेख में माधुरी के कई अंकों में लिखा था। अचानक मुझे मिल गया है उसका अंतिम खंड के पहले दो पेज।


आर पार
1954 की आर पार को न्वार कॉमेडी कहा जाता है। यह शुरू होती है जेल से। अच्छे बरताव और ईमानदारी के लिए क़ैदी कालू का दो महीने पहले छोड़ा जा रहा है। कालू टैक्सी ड्राइवर है।
समीक्षक दिनेश रहेजा ने लिखा है : - 
1954 की आर पार देख कर मन में दुख होता कि गुरुदत्त ने अपनी कला को बाद में उदास फ़िल्मों तक गी महदूद कर लिया। आरपार और मिस्टर ऐंड मिसेज 55 की जीवंततारसिकता और जिजीविषा मस्त कर देती थी। वे उदास फ़िल्मों में न उलझ जाते तो उनके व्यक्तित्व पर भी उदासी न छा पाती। (देव आनंद को भी दुख था कि उनका गुरुदत्त उदास फ़िल्म बना रहा है।)
आरपार में बताया जाता है कि कालू को सज़ा मिली थी बेतहाशा टैक्सी चलाने पर। कालू बाहर निकल रहा है। एक क़ैदी कहता है उसका संदेश अमुक तक पहुंचा दे। वह अमुक अंडरवर्ल्ड का कप्तान है। जिसके यहां कालू काम करता थाउसने उसे निकाल दिया। घर वाले भी उससे संबंध रखना नहीं चाहते। उसे ईमानदाराना काम की तलाश है। वह पहुंच जाता है लालाजी की गराज में। वहीं रहनावहीं काम करना। जब तब काम की खट खट में सुनाई पड़ती है लालाजी की चंचल बेटी निक्की (श्यामा) की खिलखिलाहट। एक दिन लालाजी ने दोनों की प्रेम लीला क्या देखीउबल पड़े लालपीले हो गए। कालू फिर बेरोज़गार!
वह जो अंडरवर्ल्ड का कप्तान था उससे कालू की मुलाक़ात संयोगवश ही हुई। उसकी शानदार टैक्सी डॉज कार थी। कालू को क्या पता कि जल्द ही वह बैंक की लूट में शामिल होने वाला है।
इधर शतरंज के शौक़ीन लालाजी के साथी खिलाड़ी ने बताया कालू की जेलयात्रा के बारे में। निक्की को पता चला तो दिल टूट गया। कालू हार मानने वाला नहीं था। वह उसे ले गया जेलर साहब के पास सच्चाई जानने के लिए। अब निक्की उसकी हो गई। वाजिब ही था कि कालू लालाजी के पास जाए और निक्की से ब्याह की बात करे। लालाजी किसी शर्त पर राज़ी हो ही नहीं सकते थे।
अंडरवर्ल्ड के कप्तान की पसंददीदा नर्तकी (शकीला) को कालू पसंद था। उस ने सलाह दी कि निक्की के साथ भाग जाए। क्या करना है तय करने के लिए निक्की के सामने दुअन्नी के सिक्के पर चित पट कर ली – आर या पार। तो तय हो गया भाग जाएंगे एक रात बारह बजे। कालू गाड़ी लेकर आएगापंदरह मिनट तक कालू इंतज़ार करेगा। निक्की नहीं आई। वह एक दो बार उसी रात फिर आया। निक्की नहीं आई। कालू के लिए निक्की का अध्याय समाप्त हो गया। शकीला कोशिश करती है कालू को पटाने की।
पर एक बार फिर वह कालू कि ज़िंदगी में फिर आई। कप्तान की बैंक लूट में कालू शामिल होना नहीं चाहतालेकिन कप्तान ने निक्की को बंधक बना लिया उसे लूट में शामिल करने के लिए। लंबी कार चेज के बाद कालू
ने निक्की को बचा ही लिया।

दिनेश रहेजा टिप्पणी करते हैं: “गुरुदत्त ने शकीला का चरित्र फ़ॉर्मूला से हट कर बनाया है। वह कालू के लिए बिसूरती तो हैपर उस के लिए जान देने को तैयार नहीं है। पुलिस की पकड़ में आने से पहले कालू और निक्की पर गोली भी चलाती है!”
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मिस्टर ऐंड मिसेज फ़िफ़्टी फ़ाइव
टैनिस के मैदान में दर्शकों के लिए लकड़ी के फट्टों के स्टैंड बने हैं। ऐसे ही एक स्टैंड के नीचे छाया में लेट कर आराम फ़रमा रहा है हैट और पाइप पीने का शौक़ीन बेरोज़गार कार्टूनिस्ट प्रीतम (गुरुदत्त)।
बात उन दिनों की है जब देश में तलाक़ क़ानून पास हो चुका था। तलाक़ के समर्थन के आंदोलन में सक्रिय भाग ले रही थीं शहर की जानीमानी हस्ती धनी सीता देवी (ललिता पवार)। साथ ही वह पुरुषद्वेशी भी थीं। उनकी पालिता टैनिस प्रेमी पश्चिमी टाइप की खिलंदड़ी अनीता के लिए खिलाड़ी रमेश (अल् नासिर) सब कुछ हैलेकिन रमेश के लिए विंबलडन में खेल पाना सब कुछ है। सीता देवी नहीं चाहतीं कि अनीता रमेश से मेलजोल बढ़ाए। इसीलिए यह मैच देखने वह चोरी छिपे आई है। उसे डर है कोई अपना उसे वहां देख न ले।
उन से छिपने के लिए वह भी स्टैंड के नीचे आ धमकती क्या फिसल पड़ती है। यह है हीरो हीरोइन की पहली मुठभेड़। पहली मुलाक़ात में प्रीतम उसका दीवाना हो गया। इस तरह शुरू होती है 1955 की दिलचस्प मिस्टर ऐंड मिसेज फ़िफ़्टी फ़ाइव

अनीता (मधुबाला) और प्रीतम (गुरुदत्त)
सीता देवी के सामने अचानक बड़ी गंभीर समस्या आ गई। बीस बरस की उम्र होने पर अनीता को स्वर्गीय पिता की वसीयत से सत्तर लाख रुपए मिलेंगे। शर्त यह है कि बेटी की शादी हो जाए। अब सीता देवी को चाहिए ऐसा नौजवान जो शादी तो कर ले पर पत्नी से कभी कहीं भी मिले नहीं। चतुर जुगाड़ू सीता देवी ने अच्छी ख़ासी तनख़्वाह पर नौकर के लिए विज्ञापन दिया। जवाब में पहुंचा प्रीतम। प्रीतम उन्हें पसंद आयाशर्त रखी कि उसे अनीता से शादी करनी होगीपर मिलना कभी नहीं होगा। शादी गुपचुप कचहरी में होगी। वहां प्रीतम और अनीता मिले तो हंसी मज़ाक़ चलने लगा। दोनों को पता ही नहीं था कि यहां उन दोनों की ही शादी होने वाली है। जल्दी ही अनीता को पता चल गया कि यही है वह बंदा जो पैसों के लिए उससे शादी कर रहा है! वह प्रीतम से नफ़रत करने लगी। शादी हुई। प्रीतम को तनख्वाह मिलने लगी। दिन भर वह दोस्तों से मिलताकैफ़ीयत देता कि उसे तनख़्वाह मिलती है काम पर न जाने की!
सीता देवी उन्हें कहीं भी पति पत्नी को मिलने नहीं देना चाहती थीं। परेशान प्रीतम ने एक दिन अनीता को उड़वा लिया और ले गया भैया भाभी के घर। भैया तो थे नहींलेकिन अनीता और भाभी सहेली बन गईं।
इस बीच एक समाचार पत्र में नौकरी के लिए प्रीतम के पास वहां इंटरव्यू का न्योता आया। संपादक जी को वह पसंद तो आया। लेकिन साथ ही शर्त रखी कि वह समाज सेविका सीता देवी से प्रमाणपत्र लेकर आए। सीता देवी ठहरीं पक्की खिलाड़ी। मौक़ा देख कर उन्होंने मांग रख दी कि वह अपनी अनहुई पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचवा कर उन्हें दे। प्रीतम ने वही किया। सीता देवी कचहरी में अनिता से उस का तलाक़ जल्द ही कराने की कोशिश में थीं ही। प्रीतम ने अपने ख़िलाफ़ वही फ़ोटो अपनी एक और शादी के सबूत तौर पेश कर दिया और निराश होकर बंबई से बाहर चला गया। इस अनहुई शादी का भेद अनीता पर अचानक खुल जाता हैवह मानों तंद्रा से जागती है। उसे याद आते हैं प्रीतम के साथ अच्छे क्षण। वह उससे मिलने को उतावली हो जाती है। उधर प्रीतम को उसकी याद सता रही है। वह लौट रहा है। बंबई के हवाई अड्डे पर दोनों का मिलन होता है।
अबरार के नाटक मॉडर्न मैरिज पर आधारित फ़िल्म आरंभ से अंत तक तुर्शी बतुर्शी संवादों से भरी है। फ़िल्म में प्रीतम के कार्टून प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर.केलक्ष्मण ने बनाए थे। एक कार्टून में सीता देवी रोमन पहनावा टोगा पहने जो रथ हांक रही हैं उस के घोड़े हैं प्रीतम और अनीता।

इसे देख कर सीता देवी ने जो जवाब तल्बी की। उनके हर सवाल का प्रीतम का जवाब था, जी हां!” लेकिन हर सवाल का और जवाब में जी हां!” का मतलब बदल जाता है। अंतिम सवाल है, क्या तुम कम्यूनिस्ट हो”, जवाब में पहली बार आता है, जी नहीं, कार्टूनिस्ट!”
फ़िल्मफ़ेअर के 27 मई 1955 अंक में इसकी समीक्षा थी:
Mr and Mrs 55 opened to most favourable reviews. To quote Filmfare in its issue of May 27, 1955, “A thoroughly delightful, honey and cream social comedy. Mr and Mrs 55 is a model of film craft and has gripping interest for every class of cinegoer. Its satire of characters we know and its incidents taken from life are spiced with humour… the dialogue, well-written, tense and witty, enhances the appeal of this true-to-life and thought-provoking entertainer.”

गीता बाली और देव आनंद 

जाल
बाज़ी के अगले ही साल गुरुदत्त ने निर्देशित की इतालवी बिटर राइस से प्रेरित यह रात यह चांदनी फिर कहां गीत वाली जाल 1952.
इसमें देव आनंद के भावी लोकप्रिय स्टाइल का पूर्ण विकास हुआ। गोआनी मछली बेचने वाली ईसाई मारिया (गीता बाली) को पसंद आ गया सोने का तस्कर अनोखी अदाओं वाला टोनी (देव आनंद)। इसमें गोआनियों को पियक्कड़ सांचे में न ढाल कर उनके जीवन का यथार्थवादी चित्रण किया गया था। एक दृश्य- बड़ा फ़ैरिस व्हील (चक्री झूला) चक्कर लगा रहा है। लीसा (पूर्णिमा) और मारिया अपनी बारी के इंतज़ार में हैँ। हर चक्कर के साथ लीसा मारिया को चेता रही हैटोनी की असलियत बता रही है। हर चक्कर के साथ मारिया की निगाह में टोनी का रूप बदल जाता है। शारीरिक ही नहीं मानसिक भी। एक और दृश्य- टोनी की पुकार यह रात यह चांदनी फिर कहां से मारिया खिंची जा रही है समुद्र तट की ओर। मछली के जाल में फंस जाती है। फ़िल्म में अंधे की भूमिका में के.एन. सिंह अविस्मरणीय थे।




सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)  

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