सीआईडी, चौदहवीं का चांद, सांझ और सवेरा - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 3 नवंबर 2019

सीआईडी, चौदहवीं का चांद, सांझ और सवेरा


गुरुदत्तावली – तीन 

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–107

सीआईडी
(निर्देशक राज खोसला की पहली फ़िल्म - गुरुदत्त मात्र निर्माता हैं)
जैसे देव आनंद ने वादा किया था गुरुदत्त को निर्देशक बनाने का, वैसा ही वादा गुरुदत्त ने किया था राज खोसला से। इसीलिए गुरुदत्त ने राज खोसला से निर्देशित कराई अपनी कंपनी की पहली फ़िल्म सीआईडी।


सीआईडी में पहला चित्र शकीला और देव आनंद,
दूसरा देव आनंद और वहीदा रहमान (पहली फ़िल्म)

उंगलियां टेलिफ़ोन का डायल घुमा रही हैँ। कभी हम उस आदमी के शरीर का एक हिस्सा देखते हैं कभी दूसरा। चेहरा कभी नहीं। किसी अन्य टेलिफ़ोन का डायल घुमा रही हैं किसी और की उंगलियां। यह है शुरूआतफ़िल्म न्वार शैली की सी.आई.डी. की।
बांबे टाइम्स अख़बार के दफ़्तर से सामान उड़ाने की नीयत से मेज़ों के नीचे दुबकता टोहता सरक रहा है उचक्का मास्टर (जानी वाकर)।
कई लोगों के बीच टेलिफ़ोन पर छोटी छोटी बातचीत। उनमें एक औरत भी है। कोई आदेश दे रहा किसी को राह पर लाने का। न माने तो उसेतुम जानते ही हो क्या...!” जिसे राह पर लाना है, वह हैं बांबे टाइम्स के ईमानदार सत्यनिष्ठ अटल संपादक श्रीवास्तव। वह किसी बड़े आदमी के कुकर्मों का भंडा फोड़ने की कगार पर हैं। यह जो क्या है, वह करने का काम सौँपा जा रहा है शेर सिंह (महमूद) को। कोई शेरसिंह से कह रहा है, रिश्वत धमकियां बेअसर हैं। अब एक ही उपाय है – तुम जानते ही हो क्या...!”
शेरसिंह ने फ़ोन पर धमकी दी श्रीवास्तव जी को। उनके पास एक और धमकी आई किसी महिला से। उन्होंने सीधे फ़ोन कर दिया सी.आई.डी. अफ़सर शेखर (देव आनंद) को। हवलदार रामसिंह को साथ ले शेखर तत्काल चल पड़ा। श्रीवास्तव जी को छुरा घोंप कर शेरसिंह बच कर निकल रहा है। मास्टर ने उसे देख लिया। लिफ़्ट से नीचे उतर रहा है शेरसिंह। लिफ़्ट से ऊपर जाने के लिए खड़े शेखर और रामसिंह की नज़र शेरसिंह पर पड़ी।
संपादक जी के दफ़्तर के क़ालीन पर शेखर को एक सिगरेट मिलती है। घायल संपादक जी के लिए एंबुलेंस का बंदोबस्त करने के लिए रामसिंह को वहीँ छोड़ शेखर भागा शेरसिंह को पकड़ने। शेरसिंह और साथी कार में भागे जा रहे थे। पीछा करने के लिए शेखर ने आव देखा न ताव, एक लड़की रेखा (शकीला) की कार क़ब्ज़ा ली। रेखा झुंझलाई, चीखी। वह शेखर को रोकने की कोशिश पर कोशिश कर रही है। शेखर को तो भागती कार पकड़नी है। कुछ देर बाद भगोड़ी कार ओझल हो गई। क्रुद्ध रेखा ने कार की चाभी निकाल कर बाहर फेंक दी। इधर उधर घूम कर कार किनारे रुक गई। तभी तेज़ बारिश शुरू हो गई। रेखा ने अंधेरे में चाभी ढूंढने की कोशिश की, पर वह मिली नहीं। दोनों ने रात कार में बिताई – अगली सीट पर शेखर, पिछली सीट पर रेखा।
सुबह हुई। रेखा को चाभी मिल गई। गाड़ी स्टार्ट कर के वह रफ़ू चक्कर हो गई। शेखर किसी तरह श्रीवास्तव जी के दफ़्तर पहुंचा। पुलिस अफ़सर जगदीश पहले ही वहां पहुंच चुका था। दोनों तफ़्तीश करने लगे। किसी को नहीं पता कि किसी ने संपादक जी पर हमला क्यों करवाया होगा।
पुलिस अफ़सर जगदीश का दफ़्तर। शेखर तो कार के पीछे भाग गया था। रामसिंह के हाथ आ गया था उचक्का मास्टर। तभी वहां पहुंच जाती है मास्टर की तेज़ तर्रार गर्ल फ़्रैंड कुमकुम। अब शेखर भी आ पहुंचा। मास्टर ने कबूल कर लिया कि उसने हमलावर को देखा था और पहचान भी लेगा।
इस बीच अस्पताल में अचेत श्रीवास्तव जी का देहांत हो गया।
अब पुलिस सुपरिंटेंडैन्ट मिस्टर माथुर (के.ऐन. सिंह) का दफ़्तर। शेखर ने बताया कि मरने से पहले श्रीवास्तव जी ने कंपोज़िंग डिपार्टमैंट में जो मैटर भेजा था उसमें संकेत था कि जल्दी ही वह कोई रहस्य उद्घाटित करने वाले हैं। तभी लैबरेटरी से सूचना आई कि उस सिगरेट में चरस भरी थी। यह बड़े काम का सूराग़ था। शेखर के कहने पर रामसिंह ने चरसियों का रिकार्ड खंगाला। उनमें से एक था शेरसिंह। अब लक्ष्य पक्का था। भेस बदल कर शेखर और रामसिंह चरसियों के अड्डे जा पहुंचे। शेरसिंह उन के हत्थे आ गया। मास्टर ने उसे पहचान भी लिया।
शेखर माथुर साहब के घर जा रहा है। रास्ते में बंबई की मैरीन ड्राइव पर रेखा जा रही है। उसे लगा शेखर उस के पीछे पड़ा है। दोनों घर पहुंचे तो ग़लतफ़हमी दूर हुई। दोनों में रोमांस शुरू हुआ।
शेखर को तो हत्या के रहस्य से परदा उठाना है। कोई अता-पता, कोई सूराग़ नहीं मिल रहा। समझ में नहीं आ रहा कि गुत्थी कैसे सुलझेगी या सुलझेगी भी?
कोतवाली में शेरसिंह यह उगलने को राज़ी नहीं है कि श्रीवास्तव जी की हत्या करवाने वाला कौन है।
और अब एक अजीब टेलिफ़ोन आता है। कोई अज्ञात रहस्यपूर्ण महिला कह रही है, मेरे पास श्रीवास्तव की हत्या के बारे में जानकारी है, मुझसे मिलिए, मैं कार भेज रही हूं...कोई नया सूराग़ मिलने की आशा से शेखर सहमत हो गया। कार आई, पीछे की सीट पर एक मुस्टंगा बैठा है, उसने शेखर को भीतर खींच लिया। अंधेरे कांच वाली कार इधर उधर कई चक्कर लगा कर एक इमारत की गराज में रुकी। शेखर को ऊपर तक ले जाने के लिए हर मोड़ पर लड़कियां तैनात थीँ। उससे बात करने वाली लड़की (वहीदा रहमान) सुंदर तो है ही, गर्वीली भी है, चंचल भी। अनोखी अदा है। बात पहेलियों में करती है। उसने पूछा, आप को तोते पसंद हैं?” शेखर हैरान! अब वह बोली, मुझे पता है आपको अभी हाल एक तोता मिला है। उसे छोड़ने पर आपको पचास हज़ार मिल सकते हैं!”
शेखर समझ गया कि वह शेर सिंह की बात कर रही है। वह डिगने वाला नहीं था। लड़की ने शरबत पिलाने के बहाने उसे बेहोश कर दिया। होश आया तो उसने अपने आप का आगरा-बंबई रोड पर पाया। कोई भला मानस उसे माथुर साहब के घर छोड़ गया। यहां बड़े प्यार से रेखा उस की देखभाल कर रही है।
अब शेखर बिल्कुल फ़िट है। माथुर साहब उस से रेखा के जन्म दिन की पार्टी में भाग लेने की बात कर रहे हैं। मेहमानों की लिस्ट में रेखा चाहती है कि उसकी बरसों पहले बिछड़ी सहेली कामिनी को भी बुलाया जाए।
पार्टी में आए हैं शहर के बड़े बड़े लोग। दानी धर्मी सेठ धरमदास शेखर से बात कर रहे हैं। वह रहस्य बाला भी आ रही है जिसने उसे अपने घर बुलाया था! यह कामिनी है – रेखा की सहेली। शेखर हैरान है कि उसका यहां क्या काम। उसने देखा कि सेठ धरमदास फुसफुसा कर उसे (कामिनी को) यहां से तुरंत चले जाने को कह रहे हैं।
शेरसिंह को पैसे देने वाला कौन था? शेरसिंह कुछ बता नहीं रहा। हवालात में दो मुस्टंडे क़ैदी आए। उन्होंने शेरसिंह को मार दिया। अख़बारों में सुर्ख़ियां छपीं हवालात में क़ैदी की मौत!” अब क्रिमिनल के तौर पर शेखर भाग रहा है, पुलिस उस के पीछे है।
एक समीक्षक ने लिखा है – हत्यारे और हत्या का उद्देश्य शुरू में ही बता दिया गया है, अधिकांश घटनाएं रात की गहरी छायाओं में होती हैं। एक सुनिश्चित पैटर्न है खिड़कियों और सीख़चों के पीछे पात्रों का। जाल मॆं फंसने और बच निकलने की कहानी है फ़िल्म। कभी शिकारी है शेखर, कभी धरमदास। खलनायकों को फंसाने की कोशिश में शेखर ख़ुद फंस जाता है। फ़िल्म बिल्ली और चूहे के खेल जैसी भी है और सांप और सीढ़ी के खेल जैसी भी। अभी आप शिखर पर हैं तो अगले पल नीचे तल में।
और यह ट्रैप है या जाल है। और जाल क्या है - फंसने पर ही पता चलता है कि इस में फंस गए!
चौदहवीं का चांद
(निर्माता-अभिनेता हैं गुरुदत्त)
मेरा नाम जोकर पिट जाने के बाद दीवालिया राज कपूर ने बनाई थी रोमांटिक बॉबी, और काग़ज़ के फूल की असफलता की मार खाए गुरुदत्त गए मुसलिम सोशल की शरण और बना डाली रोमांटिक क्लासिक चौदहवीं का चांद। मुसलिम समाज की बारीक़ियोँ की अपनी जानकारी पर भरोसा नहीं था तो निर्देशन का भार सौंपा जाने माने उस्ताद मोहम्मद सादिक़ को। कहानी चुनी सग़ीर उस्मानी की झलक। पटकथा भी सग़ीर से लिखवाई। संवाद लिखवाए तबिश सुलतान पुरी से।
और संगीत? काग़ज़ के फूल के निर्माण से एस.डी. बर्मन सहमत नहीं थे। वे जानते थे कि यह बनाना गुरुदत्त को भारी पड़ेगा। तभी उन्होंने कह दिया था कि तुम्हारे लिए यह मेरी आख़िरी फ़िल्म होगी!’ तो संगीत का भार दिया गया रवि को। शक़ील बदायूंनी से बढ़िया गीतकार इसके लिए हो ही नहीं सकता था!
फ़िल्म शुरू होती है शहरे लखनऊ के गुणगान से, उसकी तहजीब के बखान से, वहां के मेले ठेलों और नज़ारों की तारीफ़ से। इन नज़ारों में तफ़रीह कर रहे हैं दो दोस्त मिर्ज़ा शैज़ा (जानी वाकर) और नवाब प्यारे मियां (रहमान)। एक नाज़नीं के रुख़ से परदा हटा, नवाब ने एक झलक देखी। यह एक झलक नवाब के कलेजे पर छुरी चला गई, परदे के पीछे वाली उसके दिलो दिमाग़ पर छा गई।
उस अनजान हसीना की ख़ूबसूरती की जादुई झलक एक बार फिर मिली फुलझड़ियों की चमक दमक में। उसने डाल रखा है कामदानी के फूलों की कढ़ाई वाला झीना शोख़ दुपट्टा। यही दुपट्टा बाद में गलतफ़हमियों की वज़ह बन जाता है। नवाब की बहन की सालगिरह पर घर में सहेलियां गा बजा रही हैं, मस्ख़री कर रही हैँ। झरोखे से उसे देख कर नवाब की दीवानगी और बढ़ रही है। जिस कमरे में वह बैठा है, उसमें बहुत सारे गद्दे पड़े हैं। नवाब की बहन और वह आपसी गुफ़्तगू के लिए खिड़की से वहीँ आने लगीँ। बेचारे नवाब को छिपने की एक ही जगह मिली – गद्दों के ढेर के बीच जो थोड़ी सी जगह थी, उसी में एक चादर के नीचे दुबक गया। सहेलियों की बातें सुनता रहा। किसी लड़की को छेड़ने के क़िस्से पर उसशोख़ नाज़नीं ने पास रखी छड़ी उठाई और कहा, “मैं इस तरह ख़बर लेती मरदुए की और ज़ोर से मार दी – सड़ाक से लगी नवाब को। बिलबिला कर वह उठा। लड़कियां भागीं। उस के दुपट्टे के कोने का एक टुकड़ा किवाड़ में फंसा रह गया। यही एक निशानी नवाब के पास रह गई। नवाब ने जुगत निकाली, छोटा सा पैग़ामे मोहब्बत लिखा और पकड़ा दिया नौकरानी टुनटुन को - ऐसे दुपट्टे वाली को देने के लिए। लड़कियां हमेशा के लिए सहेली रहने का खेल खेल रही थीँ। दो दो सहेलियों ने  दुपट्टे आपस में बदल लिए - उस ने भी। पैग़ाम पहुंचा ग़लत जगह...
नवाब की अम्मीं हज को जाना चाहती हैं। साथ ले जाना चाहती हैं मौलवी साहब को। वह जाने से पहले नवाब की शादी करवाना चाहती हैं। जाने से पहले मौलवी चाहते हैं अपनी बेटी की शादी करवाना। अम्मीं ने नवाब से कहा, तुम कर लो उससे निकाह। नवाब ने कई बहाने बनाए, जो अम्मीं की समझ में आ गए, पर बोलीं कोई और लड़का दिलवाओ।
अब हम मिलते हैं कहानी के हीरो असलम (गुरुदत्त) से। नवाब ने कहा, मौलवी साहब की बेटी से शादी कर लो। नवाब के अहसानों से दबे दोस्त असलम ने शादी कर ली। सुहाग रात पर हम मिलते हैं असलम की बीवी से– अरे, वही’! जिसके नवाब प्यारे मियां दीवाने थे। यह है जमीला (वहीदा रहमान)। पर यह बात न प्यारे मियां जानते हैं, न असलम और न मिर्ज़ा शैज़ा। असलम तो लुट ही गए बीवी पर! उस की तारीफ़ में उन्होंने ग़ज़ल लिखी और गाई:

गुरुदत्त और वहीदा रहमान 

चौदहवीं का चांद होया आफ़ताब हो/ जो भी हो तुम खुदा की क़सम, लाजवाब हो...
ज़ुल्फ़ें हैं जैसे कांधों पे बादल झुके हुए/ आंखें हैं जैसे मय के प्याले भरे हुए
मस्ती है जिसमें प्यार की तुम वो शराब हो/ चौदहवीं का चांद हो...
चेहरा है जैसे झील में हँसता हुआ कंवल/ या ज़िंदगी के साज़ पे छेड़ी हुई गज़ल
जाने बहार तुम किसी शायर का ख़्वाब हो/ चौदहवीं का चांद हो...
होंठों पे खेलती हैं तबस्सुम की बिजलियाँ/ सजदे तुम्हारी राह में करती है कहकशाँ
दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का तुम ही शबाब हो/ चौदहवीं का चांद हो…”

[ख़ूबसूरती की कोई उपमा किसी शायर के ख़्वाब से बेहतर नहीं हो सकती। लेकिन शक़ील बदायूंनी ने कोई बात बढ़ा चढ़ा कर नहीं लिखी है। फ़िल्म में वहीदा रहमान इन सब उपमाओं से बहुत ऊपर है।]
फ़िल्म का यही पेंच हैनवाब को नहीं पता उसने असलम की शादी उस हसीना से करा दी है जिस पर उस की अपनी नज़र थी। असलम नहीं जानता उसकी बीवी नवाब की मंज़िले मक़सूद थी। और मिर्ज़ा शैज़ा बेख़बर है इस उलट फेर से।
तमाम ग़लतफ़हमियों की वज़ह थी परदा प्रथा। परदे के पीछे क्या है के अज्ञान से अनगिनत त्रासदियों का जन्म हुआ है। चौदहवीं का चांद के एक जान और तीन कालिबदोस्तों की त्रासदी भी इसी की देन है।
असलम पर भेद खुला तो वह हरचंद कोशिश करने लगा कि बीवी से तलाक़ हो जाए। मिर्ज़ा शैज़ा की तरह कोठे पर जाने लगा। पर बात नहीं बनी। अपनी उलझनों में वह इतना उलझा कि यार नवाब प्यारे मियां से भी नहीं मिल पा रहा था।
अम्मीं की ज़िद पर प्यारे मियां की शादी हो रही है। जिस से शादी हो रही थी उनकी समझ से वह जमीला ही है। सब ख़ुश हैं, वह ख़ुद ख़ुश हैं, पर असलम नहीं आया है। वह ख़ुद दौड़े यार का लाने। दरवाज़ा खोल कर भीतर आए तो दिखाई दी जमीला! अब प्यारे मियां को होश आया। दिल पश्चात्ताप से भर गया। दौड़े दौड़े घर गए। ज़ोर ज़ोर से चीख़ रहे थे –यह शादी नहीं धोखा है। शादी नहीं बरबादी है। बंद करो शादी!” ख़ुशी ग़ायब हो गई।  रहमान शादी के घर में पड़ा तड़प रहा है। ग़लती का ग़म उस पर भारी पड़ रहा है। अंगूठी का हीरा खा कर उस ने आत्महत्या कर ली।
(रहमान ही है जो यह सीन कर पाया।)

सांझ और सवेरा
(निर्देशक हैं हृषिकेश मुखर्जी, गुरुदत्त मात्र अभिनेता हैं)
गुरुदत्त के अभिनय वाली आख़िरी फ़िल्म हैहृषिकेश मुखर्जी की सांझ और सवेरा’(1964)
गौरी (मीना कुमारी) के पिता का देहांत हो गया। पिता के अभिन्न मित्र ऐडवोकेट मधुसूदन (मनमोहन कृष्ण) उसे अपने घर ले आए। गौरी उनके घर में रम गई। मधुसूदन के साथ रहता है उन का भक्त भानजा तबलावादक प्रकाश (महमूद)।
यह उन दिनों की बात है जब लड़का या लड़की देखे नहीं जाते थे। परिवार का नाई या कोई रिश्तेदार रिश्ता पक्का कर दिया करता था। बंबई में अपनी मां के साथरहते हैं धनी डॉक्टर शंकर चौधरी (गुरुदत्त)। कभी पहले उनके किसी रिश्तेदार ने मधुसूदन जी की बेटी माया से डॉक्टर शंकर का रिश्ता पक्का कर दिया था। मां ने बेटे डॉक्टर को आदेश दिया शादी का। बेटे ने हां कर दी। मधुसूदन को तार मिला कि मां बेटे आ रहे हे शादी के लिए। माया (ज़ेब रहमान) दिल्ली में पढ़ रही है, आती है। शादी संपन्न हो जाती है। अधरात सरदर्द का बहाना कर के वह अपने कमरे में सोने चली जाती है। सुबह विदा होनी है। तैयारियां हो गई हैं। लड़के वाले अभी अपने कमरे में हैं। गौरी माया को जगाने गई तो कमरा ख़ाली था! वह संदेश छोड़ गई है कि अपने प्रेमी के साथ जा रही है। हम देखते हैं कि एक खुली छत वाली कार में दोनों किसी पहाड़ी सड़क पर तेज़ी से जा रहे हैं। वकील साहब मधुसूदन जी का दिल बैठ गया। सारा दायित्व प्रकाश के सिर पर आन पड़ा। उसे एक ही रास्ता सूझा परिवार की इज्जत बचाने का। गौरी को माया बना कर भेज दे। गौरी बहुत मना करती है, पर प्रकाश गौरी को डॉक्टर साहब के साथ विदा करवा ही देता है। उधर माया भागी तो पता चला कि उसके प्रेमी के ग़लत इरादे माया को पता चल गए। उसने स्टीयरिंग पर क़ब्ज़ा करना चाहा तो कार खड्ड में गिर पड़ी।
अब? कई संभावनाएं हैँ:
सात फेरे माया के साथ लिए गए थे। गौरी का मन कहता है कि वह पत्नी नहीं है।
कभी कोई गौरी को पहचान लेगा।
गौरी का भेद खुल गया तो डॉक्टर चौधरी की क्या प्रतिक्रिया होगी?
माया मरी नहीं है। कभी वह नमूदार हो गई तो क्या होगा?
सांझ और सवेरा में ये सब संभावनाएं घटित होती हैं।

मीना कुमारी और गुरुदत्त - सांझ सवेरा में 

गौरी अपने आप को पत्नी नहीं मानती और पतिके सामने आत्मसमर्पण न करने के बहाने करती रहती है। पति अपने को वंचित मानता है और अप्रसन्न है। प्रकाश आता है माया/गौरी को पगफेरे की रस्म पूरी कराने। मधुसूदन मामाजी अब बनारस में रहते हैं, वहीं जाना होगा। किसी बहाने वहां मंदिर में डाक्टर शंकर और माया/गौरी की दूसरी शादी करा दी जाती है - एक दूसरे को माला पहना कर। गौरी प्रसन्न है, डॉक्टर शंकर प्रसन्न हैं - सब प्रसन्न हैं। डॉक्टर साहब को सीधा साधा प्रकाश पसंद आ गया है। वह उसे भी अपने साथ बंबई ले आते हैं। तबले की दूकान पर उसे मिलती है राधा (शुभा खोटे)। दोनों में तबले की ताल पर बहस हो जाती है जो अंत में प्रेम में परिवर्तित होनी ही थी। राधी की मां मनोरमा जाती है डॉक्टर शंकर की मां रुक्मिणी के पास और पहचान लेती है गौरी को जो अपने सफल दांपत्य में माँ बनने वाली है। मनोरमा को मौक़ा मिल गया रुक्मिणी को भड़काने का। एक दिन माया/गौरी डॉक्टर साहब के अस्पताल गई है किसी काम से। रोगी के बिस्तर पर पड़ी है बेहोश माया! उसकी याददाश्त जाती रही है। गौरी सिहर गई। भेद खुला तो सास और पति ने उसे इतना बुरा भला कहा कि वह आत्महत्या करने जा पहुंची। एक भले मानस ने उसे रोका और घर पर शरण दी। अंत में सब ठीक हो जाता है।
निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी इन सब परिस्थितियों में गुरुदत्त और मीना कुमारी और महमूद और मनमोहन कृष्ण की सशक्त सहायता से दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में सफल होते हैं। मुझे सब से ज़्यादा पसंद आया गुरुदत्त का अभिजात्य बंगाली रूप।
अंत में – शायद यही एकमात्र फ़िल्म है जिस में गुरुदत्त सिगार, पाइप, सिगरेट या बीड़ी पीते नहीं दिखाए गए हैं।
गुरुदत्त प्रकरण में अभी शेष हैं उनकी तीन आइकोनिक फ़िल्म प्यासा, काग़ज़ के फूल, और साहब बीबी ग़ुलाम
अगले अंतिम भाग में मैं इनको समाने की कोशिश करूंगा



सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)   

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