काग़ज़ के फूल जहां खिलते हैं बैठ ना उन गुलज़ारों में ... बिछड़े सभी बारी बारी ... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 17 नवंबर 2019

काग़ज़ के फूल जहां खिलते हैं बैठ ना उन गुलज़ारों में ... बिछड़े सभी बारी बारी ...

बुलंदियों के दिन : शोहरत और मुस्कान 


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–109

गुरुदत्तावली – पांच. (अंतिम भाग)  

काग़ज़ के फूल
भारत में सिनेमास्कोप में बनी पहली फ़िल्म काग़ज़ के फूल गुरुदत्त की ही नहीं, भारतीय की ही नहीं संसार की सर्वोत्तम फ़िल्मों में गिनी जाती है। जितनी बार इसे देखो कुछ नया ही मिलता है।
सुबह सबेरे। आधा प्रकाश आधा अंधकार। बड़ा सुनसान फ़िल्म स्टूडियो ख़ाली है। बूढ़ा थका मांदा किसी ज़माने का सिरमौर फ़िल्म निर्देशक सुरेश सिन्हा (गुरुदत्त) चले आ रहा है। दाहिने हाथ में छड़ी। बढ़ी सफ़ेद दाढ़ी। मन में यादें। चेहरे पर उदासी। सुबह सबेरे स्टूडियो में भी छाई है उदासी।
 
कागज के फूल का अंतिम दृश्य - निर्देशक की कुर्सी पर मृत सुरेश सिन्हा

धीरे-धीरे चलता उदास बूढ़ा स्टूडियो की चहारदीवारी में प्रवेश करता है। रुकता है। चलता है। फ़िल्म की नामावली परदे पर आती है। वैसे ही चलता रुकता उदास बूढ़ा स्टूडियो में भीतर जाता है। फ़्लोर को देखता है। ऊपर जाती सीढ़ियों पर चढ़ने लगता है, रुकता है, चढ़ता है। कैट वाक तक पहुंच कर नीचे स्टूडियो को देखता बैठ जाता है। 



(कैट वाक फ़िल्म स्टूडियो में लगभग छत के पास चारों तरफ़ बनी दो तीन फ़ुट चौड़ी पट्टी होती है। कुछ कारीगर इस पर चलते हैं और नीचे से दिए जाते आदेशों का पालन करते हैं।)


वह नीचे देख रहा है। शुरू होता है यादों के सिलसिले के साथ गीत: देखी ज़माने की यारी, बिछड़े सभी बारी बारी...

फ़्लैश बैक
कभी वह चोटी का निर्देशक हुआ करता था। लोग उसके ऑटोग्राफ़ों के दीवाने होते थे। वह दिल्ली में बड़े पब्लिक स्कूल में पढ़ रही बेटी पम्मी (बेबी नाज़) से मिलने गया है। पम्मी बड़ी शान से मशहूर पापा को सहेलियों से मिलवाती है, पर क्लास टीचर टोकती है। पम्मी की मम्मी का आदेश है:पिता को उस से न मिलने दिया जाए।
अब हम देखते हैं बहुत बड़ा बंगला। उस में बहुत बड़ा ड्राइंग रूम। हिंदुस्तानी साहबीयत में डूबे बूढ़े पति पत्नी -राय बहादुर बी.पी. वर्मा (महेश कौल) और उनकी पत्नी (शोभना समर्थ) - दीवार में बनी अंगीठी के दोनों तरफ़ बैठे बातें कर रहे हैं। दामाद सुरेश सिन्हा का अचानक आ जाना उन्हें पूरी तरह नापसंद है। उनकी नज़र में वह फ़िल्मों के अनैतिक गंदे धंधे में फंसा है। कुछ देर उनके पास रुक कर वह ऊपर की मंज़िल में पत्नी वीना (वीना सप्रू) से मिलने जाता है। बहुत कहने पर वह दरवाज़ा खोलती भी है तो बेटी से मिलने की छूट देने से इनकार कर देती है।
बेचारा नीचे आता है। उसे मिलता है बिंदास शौक़ीन मिजाज साला राकेश रौकी (जानी वाकर) - घुड़दौड़ का शौक़ीन। उसका अपना अस्तबल है। रौकी को मां-बाप का रवैया पसंद नहीं है। फ़िल्म में एक जगह वह गाता भी है: हम तुम जिसको कहता है शादी / यू नो - है पूरा बरबादी / जो तुम ललचाओगे - पीछे पछताओगे/ माइंड यू - जाएगी आज़ादी / हम तुम जिस को कहता है शादी... जब मर्ज़ी आओ जब मर्ज़ी जाओ / डालो कहीं भी डेरा / सड़कों पे गाओ सीटी बजाओ / कर दो कहीं भी सबेरा - हम तुम जिसको कहता है शादी…/ जिस घर में रख दो क़दम - होती है क्या ख़ातिरदारी - शादी जो की - छुट्टी हुई / सूरत ना देखेगी कोई परी / हम तुम जिस को कहता है शादी.../ ये रंगीनियां - ये मस्तियां/ सब कुछ हैं- यारों के दम से/ किस्मत की बात - ख़ुशियां हैं साथ/ दुनिया क्यूं जलती है हम से/ वाह वाह वाह/ हम तुम जिस को कहता है शादी...
शैलेंद्र के नाम से केवल यही एक गीत है फ़िल्म में।
सास ससुर से हताश सुरेश सिन्हा भटक रहा है। भारी बारिश होने लगती है। छतनार पेड़ के नीचे शरण लेता है। वहां एक अध्यापिका शांति (वहीदा रहमान) ठंड से कांप रही है, छींक रही है। उससे यह देखा नहीं जा रहा, अपना कोट उसे पहना देता है।
बंबई। स्टूडियो। सुरेश सिन्हा की फ़िल्म देवदास का शॉट चालू है। वही दिल्ली वाली अध्यापिका काम की तलाश में बंबई आई है, उन तमाम लोगों की तरह जो बंबई आते रहते हैं आजीविका के लिए। बंबई आई है तो सुरेश का कोट वापस करना उसका दायित्व है। शूटिंग के नियमों से अनजान वह चालू शॉट के बीच से हो कर निर्देशक तक पहुंच जाती है। कोट वापस करके चली जाती है। बाद में दिन भर की शूटिंग का मुआयना करते निर्देशक की आंख उस लड़की पर अटक जाती है जो दिन में आई थी। अरे, यह लड़की! यह तो बनी बनाई पारो है! वह सादगी, वही भोलापन, वही अदा! तलाश किया तो संपर्क हो ही गया। उसे पारो की भूमिका दे दी गई। अब प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी गई है उसे मिलवाने के लिए। वह पहुंचती है बड़े शौक़ से भारी मेकअप और भड़कीले कपड़े पहन कर। सुरेश ने देखा तो झिड़क दिया,क्या बंदरिया बन कर आई हो! जैसी तुम हो वैसी ही दिखो। सादगी वाली शांति की एंट्री सब को पसंद आई।
 

कार दुर्घटना में सुरेश घायल हो गया। बड़े प्रेम से शांति उसकी सेवा सुश्रूषा करती है। समुचित दूरी बनाए रखती है। धीरे धीरे नज़दीकी बढ़ने लगी। सुरेश ने चेताया कि वह शादीशुदा है। पर प्रेम होना था हो कर रहा।
एक सुबह स्टूडियो में दोनों अकेले थे। आंखों ही आंखों में बातें होने लगीं। फ़िल्म का सबसे भावुक अलौकिक गीत वातावरण में बज रहा है। कहते हैं कि गीता दत्त ने अपने दांपत्य के कठिन काल की भावनाओं को इस में पूरी तरह उंडेल दिया था: वक़्त ने किया क्या हसीं सितम/ तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम/ वक़्त ने किया क्या हसीं सितम…/ बेक़रार दिल इस तरह मिले/ जिस तरह कभी हम जुदा ना थे/ तुम भी खो गए, हम भी खो गए/ एक राह पर चलके दो क़दम/ वक़्त ने किया क्या हसीं सितम…/ जायेंगे कहां - सूझता नहीं/ चल पड़े - मगर रास्ता नहीं/ क्या तलाश है - कुछ पता नहीं/ बुन रहे हैं दिल - ख्वाब दम-ब-दम/ वक़्त ने किया क्या हसीं सितम…”
फ़िल्म देवदास की शूटिंग चल रही है। गॉसिप पत्रिकाओं में इनके पल्लवित होते प्यार के चर्चे होने लगे। ख़बरें बेटी पम्मी तक पहुंची। सहपाठिनें मज़ाक़ उड़ाने लगीं। पम्मी स्कूल से भाग आईं और शांति से कह दिया, बंबई छोड़ो और मेरे पापा की ज़िंदगी से निकल जाओ।
देवदास रिलीज़ हुई। हर तरफ़ सुरेश और शांति के काम की तारीफ़ हो रही है। शांति बेचैन है। वह इस माहौल से बच निकलना चाहती है। निर्माताओं से कह दिया अब और फ़िल्मों में काम नहीं करेगी। सुरेश परेशान है। पम्मी के पीछे पड़ जाता है - उसी ने भड़काया है शांति को। आख़िर सुरेश और शांति ने अलगाव को स्वीकार कर लिया। सुरेश को अपना बुना स्कार्फ़ भेंट कर के शांति चली गई।
सास ससुर और पत्नी ने सुरेश पर मुक़दमा कर दिया। बच्ची पम्मी को अपने साथ रखने का अधिकार बदनाम पिता को नहीं होना चाहिए। सुरेश मुक़दमा हार गया। अब पम्मी मम्मी और नाना नानी के पास चली गई।
अकेलापन सुरेश को खाने लगा। कहीं कोई चैन नहीं है। वह पियक्कड़ बन गया। दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया। एक के बाद एक फ़िल्म पिटने लगी। निर्माताओं से झगड़े बढ़ने लगे। वह उन से अलग हो गया।
शांति फिर से टीचर बन गई है।
दो साल बीत गए हैं। सुरेश के पास कोई फ़िल्म नहीं है, घर का सामान नीलाम हो चुका है। कोई ठौर ठिकाना नहीं है। ड्राइवर की गराज में रहता है। निर्माताओं के साथ शांति का कई फ़िल्म करने का कांट्रैक्ट था। उन्होंने अदालती दावा ठोंका। अब वह फिर से काम करने लगी है। दिनों दिन उसकी मांग बढ़ती जा रही है।
पियक्कड़ सुरेश के पास पीने को पैसे नहीं हैं। गिरा पड़ा खाता है। ऐसे में उसकी आत्मसम्मान और गर्व की भावना और भी बढ़ गई है। वह किसी का दयापात्र बनने को तैयार नहीं है। एक दिन शांति पहुंची उसकी गंदी बस्ती में। एक नई फ़िल्म के निर्देशन का आफ़र लेकर। उसके अहं ने ठुकरा दिया।
साल पर साल बीत रहे हैं। पम्मी की शादी होने वाली है। शांति बड़ी स्टार है, पर दिल सुरेश में रमा है। पम्मी की शादी में उपहार के पैसे सुरेश के पास नहीं हैं। हार कर किसी शूटिंग में ऐक्स्ट्रा कलाकार भरती हो जाता है। उस का मेकप हो रहा है – बढ़ी दाढ़ी, फटे पुराने कपड़े। उसे पहचानना मुश्किल है। नायिका आती है शूटिंग के लिए। यह शांति है! उसे देख सुरेश की बोली ग़ुम हो जाती है। छोटा सा संवाद भी बोल नहीं पाता। सहायक निर्देशक उसे हकाल रहे हैं, मेकअप उतार रहे हैं। शांति उसे पहचान लेती है। वह भागता है, शांति उसके पीछे भाग रही है। उसे पकड़ नहीं पाती।
 

नेपथ्य में बिछड़े सभी बारी बारी गीत का आख़िरी अंतरा बज रहा है –उड़ जा, उड़ जा, प्यासे भंवरे, रस ना मिलेगा ख़ारों में/ काग़ज़ के फूल जहां खिलते हैं, बैठ ना उन गुलज़ारों में/ नादान तमन्ना रेती में उम्मीद की कश्ती खेती है/ इक हाथ से देती है दुनिया सौ हाथों से लेती है/ ये खेल है कब से ज़ारी/ बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी।
वर्तमान। फ़िल्म स्टूडियो। बूढ़ा सुरेश धीरे धीरे कैट वॉक से उतर रहा है। वह नीचे उतर आया है। उस तरफ़ कैमरा रखा है, लाइट का स्टैंड है, निर्देशक की ख़ाली कुर्सी है। बूढ़ा सुरेश धीरे धीरे आता है। कुर्सी पर बैठ जाता है। गीत की अंतिम पंक्ति बिछड़े सभी बारी बारी बज रही है। बैठा बैठा सुरेश मर जाता है। फ़िल्म समाप्त होती है।
काग़ज़ के फूल की असफलता ने गुरुदत्त फ़िल्म निर्देशन से विरक्त कर दिया। उसने अपने सपने की महान फ़िल्म साहब बीबी और ग़ुलाम का निर्देशन लेखक अबरार अल्वी से करवाया
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साहब बीबी और ग़ुलाम
बहुत पहले मैं सरिता के संपादन विभाग में था। 1952 के आस पास पढ़ा था बिमल मित्र के बांग्ला उपन्यास साहब, बीबी, गोलाम का हिंदी संस्करण साहब बीबी और ग़ुलाम। पढ़ते ही उसका नशा दिमाग़ पर ऐसा छाया कि उतरता ही नहीं था। बंगाल के पुनर्जागरण का काल। थी उन्नीसवीं सदी। समाज में सती प्रथा, बाल विवाह और जात-पांत के संकुचित विधान के विरोध में 1828 में राजा राममोहन राय और द्वारकानाथ टैगोर ने ब्रह्मो समाज की स्थापना की थी। साहब बीबी और ग़ुलाम तत्कालीन बंगाली समाज का दर्पण था। उसका कथानक विदेशियों के बढ़ते आधिपत्य के विरोध में उपजी क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ आगे बढ़ता था। सरितामें उसकी समीक्षा में मैं ने कुछ इस तरह लिखा था: लगता है उपन्यासकार के सामने पूरे घटनाचक्र का विशाल कैनवस है, जब चाहे वह उस में से किसी एक दृश्य का वर्णन करने लगता है...
दस साल बाद 1962 में आई उपन्यास पर आधारित गुरुदत्त की साहब बीबी और ग़ुलाम। मुझ जैसे लोग दीवानों की तरह देखने गए। मैंने कई बार देखी। समीक्षा भी लिखी थी कारवां में। उपन्यास के विशाल कैनवस को कुल दो घंटे पचपन मिनट में चित्रांकित कर सकने वाली असंभव सी फ़िल्म।


वर्तमान। कलकत्ता।
सफल इंजीनियर अतुल्य चक्रवर्ती (गुरुदत्त) कई साल बाद यहां आया है। जब वह पहले आया था तो शर्मिला सा नया नया छात्र था। अपने घर फ़तेहपुर से आया था यहां। तब यहां एय्याशी का जीवन था। भीतर ही भीतर शान शौक़त के दिन बीत गए थे। दलालों के बहकावे में आ कर उन्होंने परिवार का सब कुछ कोयले की खदान पर लगा दिया था। पर कोयले की खदान थी ही नहीं। सारा मालमत्ता सिफ़र हो गया। मंझले बाबू देनदारों का रुपया वापस नहीं कर पा रहे थे। हवेली और उसका सारा सामान नीलाम हो गया। चौधरी परिवार तितर बितर हो गया। कौन कहां गया अब कोई नहीं जानता।
अब हवेली खंडहर बन चुकी है। अब उसका काम है इमारत के खंडहरों को ढहाना। अब उसका मन यादों में खो जाता है। यादें, बहुत पुरानी, भूली बिसरी सी यादें, यादें, यादें। इस पुरातन हवेली के वैभवपूर्ण काल की दुखियारी लंबी यादें...


फ़्लैश बैक। कलकत्ता। दूर गांव से आया था नादान सा फटी फटी आंखों वाला शहर के धनी इलाक़े में महल सी हवेली में। उसका नाम है भूतनाथ (गुरुदत्त)। वह आया था जीजा मास्टर जी (कृष्ण धवन) के पास। कभी वह यहां पढ़ाते थे। अब हवेली में ही बस गए हैं। नगर में उनके अनेक संपर्क हैं। उनके ज़रिए कहीं काम मिल ही जाएगा इसी आशा से वह आया था। उसका आना हवेली में चर्चा का विषय बन गया। सब कह रहे थे, “मास्टर बाबू के साले बाबू आए हैं!” मास्टर जी ने उस का खुले दिल से स्वागत किया था।
मास्टर जी ने ब्रह्मो समाजी सुविनय बाबू (नासिर हुसैन) से बात पक्की कर ली उनकी सिंदूर बनाने वाली कंपनी में नौकरी की। प्रति माह सात रुपए वेतन मिलेगा। खाना वहीं मुफ़्त में मिलेगा। खाना बनाने वाला महाराज हिंदु है –तो भूतनाथ के धर्म पर कोई आंच नहीं आएगी। फ़िलहाल भूतनाथ हवेली में मास्टर जी के
कमरे मेँ ही रहेगा। हवेली में जो दमित इच्छाएं, चाहतें, हसरतें हैं...उन्हें भूतनाथ नहीं जानता था। पर जल्दी ही जान गया था और अनजाने इनका साक्षी बन गया था और भागीदार भी।
अब मास्टर जी उसे ले गए थे सुविनय बाबू से मिलाने। वह नाडिया ज़िले के फ़तेहपुर से आया है - यह जान कर सुविनय बाबू चौंक गए। भूतनाथ उनके विस्मय का कारण जानना चाहता था। पास ही बैठी थी उनकी सुंदर बेटी जवा (वहीदा रहमान)। उसने नाम सुना भूतनाथ तो खिलखिला उठी थी। बात वहीं की वहीं रह गई।
यह जो जवा थी बड़ी तेज़तर्रार थी, साफ़ बात करती थी और ईमानदारी की पाबंद थी। उसे पता चला कि शर्मिले भूतनाथ को महाराज भरपेट खाना नहीं देता और नाहक़ धमकाता रहता है तो उबल पड़ी। धीरे धीरे वह भूतनाथ के साथ छेड़खानी भी करने लगी थी। भूतनाथ नाराज़गी का नाटक करता, पर यह उसे अच्छा भी लगता था। सच तो यह है कि वह मन ही मन उसे चाहने लगा था। उधर जवा भी उसे चाहने लगी थी। उस की कविता भंवरा बड़ा नादान है, बगियन का मेहमान है, कलियन की मुस्कान है कभी उलझाए कभी मंडराए भेद जिया का खोले ना में भंवरा भूतनाथ ही था।
धीरे धीरे भूतनाथ हवेली के जीवन से भी परिचित हो रहा था। हवेली के तीन मालिकों में अब जीवित थे मंझले बाबू (डी.के. सप्रू) और उनके छोटे भाई छोटे बाबू (रहमान)। बड़े बाबू को गुज़रे कई साल हो गए थे। उन की पुरातनपंथी धर्मी कर्मी विधवा सभी पुरानी रस्में निभाती थी।
रईसों का जीवन अपना हर शौक़ पूरा करने का था। उदाहरण के तौर पर मंझले बाबू ने अपनी प्यारी बिल्ली के विवाह में दस हज़ार रुपए उड़ा देने में हाथ पीछे नहीं खींची। बिल्ली के साथ थे उनके प्यारे कबूतर, शाम को नाच रंग।
छोटे बाबू भी कुछ पीछे नहीं थे। सरेशाम घर से निकलते तो तवायफ़ों के कोठे पर रात गुज़ार कर पौ फटे घर लौटते। नशे में धुत्। छोटी बहू रात भर उन की राह देखती, दुखड़ा गाती रहती। भूतनाथ उनका एकाकी ग़मभरा दूर से देखता रहता।
छोटी बहू पति को लुभाने की तरक़ीबें तलाशती रहती। अख़बार में उसकी नज़र पड़ी मोहिनी सिंदूर के विज्ञापन पर। दावा किया गया था कि यह सिंदूर लगाने से बिछड़े प्रीतम वापस मिल जाते हैं। छोटी बहू को मालूम हुआ कि भूतनाथ उसी कंपनी में काम करता है। बस, यह जादुई सिंदूर मंगाने के लिए छोटी बहू ने भेजा अपने भरोसेमंद चाकर बंसी (धूमल) को भूतनाथ के पास। किसी पर पुरुष का किसी बहू के कक्ष में पाया जाना भयानक अपराध माना जाता था। इसलिए बंसी भूतनाथ को चोरी छिपे ले गया उनके पास।
छोटी बहू के सौदर्य से पराभूत भूतनाथ के मुंह से बोल ही नहीं निकल रहा था। उसकी हिचक मिटाने के लिए छोटी बहू ने बात शुरू की उसकी कंपनी के बारे में, वहां के लोगों के बारे में। अब तो भूतनाथ ने जवा के बारे में और उस के प्रति अपने आकर्षण के बारे में एक सांस में सब कुछ बता डाला। अब छोटी बहू ने सिंदूर के बारे में पूछा: कुछ काम का है या नहीं?” भूतनाथ ने कहा था कि असरदार है।
  

अगली शाम सिंदूर पहुंचाने वह गया छोटी बहू के पास। अब क्या था! सारा दिन छोटी बहू ने बिताया सिंगारपट्टी में। गाती रही पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे। उसे भरोसा था कि सिंदूर का असर होगा, होगा। बंसी से संदेश भिजवाया छोटे बाबू के पास कि बहूरानी बीमार हैं। शायद इस बहाने वे उसे देखने आ जाएं। पर वे कुछ कम नहीं थे। औरतों की बीमारी से विचलित होना मर्दों का काम नहीं था। नहीं आना था, नहीं आए।
आख़िर एक दिन छोटी बहू ने विनती कर ही दी –मैं क्या करूं आप को ख़ुश करने के लिए?” छोटे बाबू ने चुनौती फेंकी, तुम वह सब करोगी जो तवायफ़ करती हैं– गाओगी, नाचोगी, पियोगी?”
पहले तो छोटी बहू को धक्का लगा। पर उसकी हसरतें भी कम नहीं थीं। उसने संकल्प कर लिया, सब कुछ करेगी पति को पाने के लिए।
भूतनाथ की पुकार फिर हुई। उसे पैसे थमाते छोटी बहू ने शराब की सब से बढ़िया बेशक़ीमती बोतल लाने की मांग कर दी। भूतनाथ को यह अच्छा नहीं लगा। वह इनकार करता रहा, समझाता रहा, अनुनय विनय करता रहा। छोटी बहू अड़ी थी, अड़ी रही। तो वह बोतल ले ही आया और दे भी आया। सांझ पड़ी। छोटे बाबू ने गिलास में शराब भर कप आगे बढ़ाया। छोटी बहू झिझकी, पति ने वह उनके गले में ज़बरन उतार दिया पूरा गिलास।
इधर एक दिन बाज़ार में भूतनाथ को अचानक मिल गए मास्टर बाबू। कुछ अनोखा होने वाला था। कुछ अंगरेज़ सिपाही दुकानों से ज़बरन माल उठा रहे थे। मास्टर जी ने भूतनाथ को एक तरफ़ धकेला और झोले में से बम निकाल कर लुटेरों पर उछाल दिया। सिपाहियों को छोटी मोटी चोटें आईं। उन्होंने गोलीबारी शुरू कर दी। एक गोली भूतनाथ की टांग में लगी।
होश आया तो वह सुविनय बाबू के घर में था। जवा उसकी देखभाल कर रही थी। दोनों एक दूसरे के प्रति अपना प्रेम प्रकट करने ही वाले थे। तभी सुविनय बाबू ने ख़ुशख़बरी दी –उन्हों नेजवा की शादी ब्रह्मो समाजी युवक सुपवित्र से पक्की कर दी है!
उनका दूसरा समाचार और भी अशुभ था। अपना स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के कारण वे कंपनी बंद कर रहे हैं। लेकिन भूतनाथ के लिए नई नौकरी पक्की कर दी है – अब वह एक आर्किटेक्ट का सहायक होगा। वह जा रहा है। दुखी जवा उसे जाता देख रही है।
जाने से पहले वह छोटी बहू से भी विदा लेने गया था। वह पूरी पियक्कड़ हो चुकी थीं। उनके हाथ से बोतल छीनने की कोशिश में उसका हाथ उनके हाथ से छू गया तो वे नाराज़ हो गई थीं। ऐसा अभद्र व्यवहार! उसे फिर कभी उनके पास न आने का आदेश दिया था। जाते जाते भूतनाथ को बड़ी शान से बताया था कि अब पति से उनका मिलाप संपूर्ण हो गया है।
आर्किटेक्ट उसे अब मुंगेर भेज रहा है नए प्रोजैक्ट पर। जाने से पहले वह बीमार सुविनय बाबू से मिलने गया लेकिन वह मर चुके थे। जवा ने बताया था कि उसने अपना रिश्ता तोड़ दिया है। उसे पता चला था कि दादाजी ने एक साल की जवा की शादी करवा दी थी - तो वह विवाहिता है! शादी किस से हुई थी यह उसे पता नहीं चल पाया था।
भूतनाथ मुंगेर चला गया। चौधरी परिवार के दोनों भाई वैसा ही जीवन जी रहे थे–बदलते संसार के ठोस सत्यों से असंपृक्त ऐशोआराम वाला जीवन। मंझले बाबू का एक शौक़ था कबूतरबाज़ी। प्रतिदंद्वी चेनी दत्त के कबूतरों के पेंच लड़ रहे थे। ऐशो आराम के लिए चौधरी परिवार की ज़मीनें बेची जा रही थीं। किसी भी तरह की जानकरी हासिल करने का कष्ट उठाए बग़ैर उन्होंने एक जाली कोयला खदान में सारा पैसा झोंक दिया था। पियक्कड़ छोटी बहू पति की पूजा में लगी थी। पर बाबू उन से उकता गए थे। फिर उन्हीं तवायफ़ों के कोठे गुलज़ार करने लगे थे। एक रात छोटे बाबू ने देखा कि उनकी चहेती तवायफ़ अब चेनी दत्त को रिझा रही थी। नौबत मारपीट तक जा पहुंची। चेनी दत्त के गुर्गों ने छोटे बाबू को बुरी तरह घायल कर दिया।
वक़्त बीत रहा था। कोई दो एक साल बाद मुंगेर से लौटा भूतनाथ। चौधरी परिवार के पैसा धेला कुछ नहीं बचा था। हवेली ख़स्ताहाल थी। छोटे बाबू फ़ालिज़ के मारे बिस्तर में पड़े थे। छोटी बहू नशे में रहती थी। अब छोटे बाबू समझा उनका नशा छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे। छोटी बहू ने सुन रखा है कि नदी किनारे कोई चमत्कारी संत पघारे हैं। हर रोग के इलाज की औषध देते हैं। भूतनाथ मिला तो बहूरानी ने विनती की कि उन महात्मा के पास ले चले।


परंपरावादी चौधरी परिवार की बहुओं का पर पुरुष के साथ जाना भ्रष्ट और अक्षम्य अपराध था। मंझले बाबू ने देखा छोटी बहू किसी के साथ बग्घी में जा रही है। उनके पहलवान चाकर जल्दी ही वे बग्घी के पास पहुंच गए। भूतनाथ की इतनी पिटाई हुई कि उसकी आंखें खुली अस्पताल में। छोटी बहू कहां गई –किसी को पता नहीं था। भूतनाथ को होश आया तो बंसी ने बताया छोटी बहू के विलुप्त होने के बाद छोटे बाबू भी जाते रहे थे। कौड़ी कौड़ी के मोहताज मंझले बाबू हवेली छोड़ कर कहीं चले गए थे। इस सर्वनाश के साथ समाप्त होता है फ़्लैश बैक। 


अरविंद कुमार 
अब-
हवेली तोड़ी जा रही है। खंडहर के नीचे खोदते खोदते मज़दूरों को मिली छिपी क़ब्र। भूतनाथ को बुलाया गया। क़ब्र में बची हैं कुछ हड्डियां। एक हाथ में वही कड़ा है जो अंतिम दिन छोटी बहू ने पहना था। दुखी मन से वह अपनी बग्घी से घर पहुंचता है। घर में पत्नी जवा और बच्चे हैं। स्पष्ट है कि भूतनाथ वही अज्ञात बच्चा था जिस से एक साल की जवा का विवाह हुआ था। 
(सभी फोटो नेट से साभार)

 सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस) 

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