फिल्म लेखक पं. मुखराम शर्मा कहा करते थे - "मैं कहानी को स्टार कास्ट से बड़ी मानता हूं" - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

रविवार, 24 नवंबर 2019

फिल्म लेखक पं. मुखराम शर्मा कहा करते थे - "मैं कहानी को स्टार कास्ट से बड़ी मानता हूं"


पं. मुखराम शर्मा, खंड - एक

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–110


अपने दौर के इतने बड़े फिल्म लेखक की नेट पर महज यही फोटो उपलब्ध है

पंडित मुखराम शर्मा अशांत का स्ट्रांग पाइंट था उनकी कहानियां। तभी वह कह पाए: मैं कहानी को स्टार कास्ट से बड़ी मानता हूं।अपनी कहानियों का मर्म वे एक वाक्य में कहते थे, संघर्ष ही जीवन है और कर्म का गुणगान मेरे लेखन का उद्देश्य है।

मेरे दिनों में बंबई में कई फ़िल्म वाले मेरठ के थे: भारत भूषण, देवेंद्र गोयल, शेखर...शेखर ने तो मेरठ परिवार नाम का समूह ही बना रखा था। देवेंद्र गोयल के सहपाठी रहे थे मेरे तायसरे बड़े भाई रतीश मोहन, भारत भूषण का हमारे लाला वाले ख़ानदान से संबंध था।
मेरठ वालों में फ़िल्मों में सबसे लंबी पारी खेली कथाकार, गीतकार, संवाद लेखक, निर्माता पंडित मुखराम शर्मा ने। उनका सक्रिय काल शुरू हुआ था सन् 1939 में प्रभात फ़िल्म कंपनी में और बंबई में सन् 1980 तक चला। 1979 की नौकर और 1980 की सौ दिन सास केके बाद सन् 1980 में सिने संसार से संन्यास ले कर वे मेरठ के थापर नगर में अपने घर वरदान में रहने आ गए। मुझे याद हैं बंबई में उनका ठेठ देसी पहनावा और दोस्तों में ज़ोरदार ठहाके।


पंडित जी ने मेरठ में थापर नगर में अपना तीन-मंज़िला घर बना रखा था। इसी घर में 25 अप्रैल सन् 2000 में 92 वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हुआ।

उन का जन्म (29 मई1909) अवश्य पूठी में हुआ था, पर पालन पोषण मेरठ में ही हुआ। इस तरह मेरठ ही उनका घर था। यहीं उन्होंने संस्कृत भाषा में विशेज्ञता प्राप्त की। यहीं वे हिंदी और संस्कृत पढ़ाते थे। यहीं वे मुखराम शर्मा अशांत नाम से कविता कहानी लिखते थे जो स्थानीय पत्र पत्रिकाओं में छपती थीँ। उनकी पसंद का उपनाम बताता है उनकी बेचैनी। यह बेचैनी उनकी रचनाओं की पहचान थी। यही अशांति वे दोस्तों की गोष्ठियों में पढ़ते सुनाते थे। एक मित्र ने सलाह दी बंबई जा कर फ़िल्मों में कोशिश करो। वहां कुछ बात बन नहीं रही थी तो सपरिवार पुणे की प्रभात फ़िल्म कंपनी में शामिल हो गए। वेतन था चालीस रुपए प्रति मास। आरंभिक काम फ़िल्म लेखन नहीं, मराठी कलाकारों को हिंदी संवादों का सही उच्चारण सिखाना था।

दस बजे 1942

प्रभात में उन्हें सुअवसर मिला हिंदी-मराठी भाषाओं में बनी दस बजे के हिंदी संवाद और गीत लिखने का। निर्देशक थे राजा नेने। हिंदी संवाद और सभी गीत मुखराम शर्मा अशांत के थे। पंडित जी का कहानी से कोई संबंध नहीं था। फिर भी मैं संक्षेप में कहानी लिख रहा हूं – सिर्फ़ इसलिए कि इस कहानी के कई अंश अनेक हिंदी फ़िल्मों में आते रहे हैं।
कालिज में सहपाठी आशा (उर्मिला) और दिलीप (परेश बनर्जी) एक दूसरे से प्यार करते हैं। उर्मिला के धनी पिता उसकी शादी धनी डॉक्टर रमेश (वसंत थेगडी) से कराना चाहते हैं। पिता के प्रबल आग्रह और बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण वह डॉक्टर रमेश से शादी के लिए तैयार हो जाती है। शादी के बीच ही उर्मिला बेहोश हो गई। शादी स्थगित हो गई। डॉक्टर के इलाज से उर्मिला ठीक तो हो गई पर उसने उन्हें अपने प्यार की कहानी बता दी और अपने पिता से भी कह दिया कि वह दिलीप से ही शादी करेगी। वे सहमत हो गए। कार दुर्घटना में घायल दिलीप का ऑपरेशन डॉक्टर रमेश को करना है। वह असमंजस में रहता है – दिलीप को बचाए या अपनी पसंदीदा आशा से शादी करे। अंततः उसकी अंतरात्मा की आवाज़ कहती है कि उसका कर्तव्य है बीमार को चंगा करना। ऑपरेशन सफल होता है।
प्रभात में पंडित जी की धाक संस्कृत साहित्य और पुराणों के पंडित के रूप में थी तो राजा नेने उनके साथ
पौराणिक राजा हरिश्चंद्र और तारामती के प्रसंग पर तारामती में काम किया। तारामती की भूमिका शोभना समर्थ ने की थी। ऐसी ही कुछ और फ़िल्म थीं विष्णु भगवान और नल दमयंती
लेकिन पंडित जी का मन मचल रहा था सामयिक काल की सामाजिक समस्याओं से उपजी भावुक कहानियों में।
-
औरत तेरी यही कहानी 1952
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी
जिस युग में मैथिलीशरण गुप्त के प्रबंध काव्य 'यशोधरा' की उक्ति अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी घर घर गूंज रही थी तब पंडित जी ने लिखी थी कहानी आज का सवाल। उस पर मराठी फ़िल्मकार दत्ता धर्माधिकारी ने बनाई 1952 में स्‍त्रीजन्मा ही तुझी कहाणी। उस का एक मराठी गीत था हृदयी अमृत नयनी पाणी तुझिया पोटी अवतरती नर अन्यायच ते करिती तुझ्यावर दासी म्हणुनि जिस पर गुप्त जी की पंक्तियों का प्रभाव साफ़ नज़र आता है।


बाद में उसी कहानी पर चतुर्भुज दोषी ने 1954 में बनाई औरत तेरी यही कहानी। मुख्य कलाकार थे भारतभूषण, सुलोचना लाटकर और निरूपा राय।औरत तेरी यही कहानीशीर्षक बहुत ही चुनौतीपूर्ण सिद्ध हुआ, तभी तो बाद में इस नाम की कई फ़िल्में बनीं। 1988 वाली में राज बब्बर हीरो था। भोजपुरी में भी इसी नाम की फ़िल्म बनी।
अब पंडितजी की ज़मीन पक्की थी। उनकी अगली औलाद ने धमाका कर दिया - श्रेष्ठ कहानी का फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड।
-
औलाद 1954
मोहन सहगल निर्देशित इस फ़िल्म के बारे में 1954 में सिने प्लॉट ने जो लिखा उस के कुछ अंश इस प्रकार हैं:


9 अप्रैल 1954 में आपेरा हाउस तथा अन्य सिनेमाघरों में प्रदर्शित औलाद विचारोत्तेजक सामाजिक संदेश वाली अच्छी फ़िल्म है। यह विवादग्रस्त सीमित परिवार जैसे विषय को बड़ी सावधानी से पूर्ण संयम और सुरुचि ​से संवार कर पेश करती है एक रोचक पारिवारिक कथा के रूप में। कुलदीप सहगल द्वारा निर्मित और मोहन सहगल के निर्देशन में पंडित मुखराम शर्मा ने कहानी के साथ साथ सुगठित पटकथा और संवाद लिख कर कमाल कर दिखाया है। निर्देशक ने बड़ी सावधानी से दो बीघा ज़मीन के निरूपा राय, बलराज साहनी और उषा किरण जैसे कुशल कलाकारों को चुना। तीन विवाहित परिवार हैं। धनी व्यापारी मोहन लाल और पत्नी सुशीला को संतान चाहिए। सुशीला का भाई बर्थ कंट्रोल का कट्टर समर्थक है। वह और उसकी पत्नी संतान नहीं चाहते। मोहन लाल का नौकर है रामदीन (बलराज साहनी)। उसकी सुंदर पत्नी धनिया (निरूपा राय) सुशीला के लिए जान देने को तैयार है। तीनों की ज़िंदगी में भूचाल आता है – बेटे और वारिस के लिए मनोहर लाल दूसरी शादी करना चाहता है। सुशीला पर दुख का पहाड़ टूट पड़ता है। वफ़ादार रामदीन से उसका दुख देखा नहीं जाता। सुशीला और रामदीन ने मिल कर षड्यंत्र रचा कि धनिया के होने वाले बच्चे को सुशीला अपने बच्चे के तौर पर जनेगी। नवजात बेटे की जुदाई से मां धनिया दुखी है। एक दिन वह चोरी छिपे बेटे को दूध पिला रही थी। इस पर उसे निकाल दिया गया। रोती झींकती घर से निकली और कार से टकरा कर मर गई। त्रासदी गहराने लगती है। अब सुशीला को अपना बेटा भी पैदा हो गया। दोनों भाई एक दूसरे पर जान छिड़कते हैं। लेकिन मां को अब अपना बेटा ज़्यादा प्यारा लगता है। पराया बेटा निष्कासित हो गया। उससे बिछड़ कर अपना बेटा दुखी और बीमार रहने लगा। सुखांत के लिए निष्कासित बच्चे को बुलाया जाता है।
समीक्षक ने रामदीन की भूमिका में अभिनय की तारीफ़ के पुल बांध दिए थे। धनिया के अभिनय को ऐतिहासिक रत्न बताया था। सुशीला के रूप में उषा किरण की मानवीय प्रतिक्रियाओं की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि वह उन पलों में भी अच्छी लगती है जब सहानुभूतिहीन अभिनय करना होता है।
-
वचन 1955

औलाद के तत्काल बाद आई वचन। अब मुखराम शर्मा का नाम बड़ा ब्रांड बन चुका था। उसके पोस्टर में उन का नाम भी लिखा गया था। निर्माता थे देवेंद्र गोयल और निर्देशक राज ऋषि।
संक्षेप में कहें तो वचन पूरी तरह कमला की कहानी और उसी की फ़िल्म है। कमला कोई मनगढ़ंत पात्र नहीं है। जीती जागती लड़की है। बेसहारा परिवार के गुज़र बसर के लिए शादी न करके काम कर के घर चलाती है। बाद में अपने बड़े हुए छोटे भाई किशोर और उस की पत्नी द्वारा निष्कासित कर दी जाती है। मैंने मेरठ के अपने बृहद् परिवार की एक लड़की को देखा था। उसके साथ वैसा ही हुआ जैसा वचन की कमला के साथ हुआ।
एक पल के लिए मान लें वह कमला नहीं कमल होती। तो? मैं दावे के साथ कह सकता हूं उसके साथ भी वही होता जो राज खोसला की दो रास्ते के नवेंदु गुप्ता (बलराज साहनी) के साथ हुआ। परिवार को पालने वाला कम पढ़ा लिखा बड़ा भाई मज़दूर रह गया और उसका पालित पढ़ा लिखा छोटा भाई बिरजू (प्रेम चोपड़ा) बन गया बड़ा अफ़सर। बिरजू और उस की पत्नी नीता (बिंदु) अपने घर पार्टी में उसे बुलाना अपमान समझते हैं।
वचन बेहद लोकप्रिय हुई पर पाकिस्तान द्वारा भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगा देने पर इसी कहानी पर वहां दो फ़िल्में साथ साथ बनीं। एक बहुत सफल हुई तो दूसरी पिट गई। उनके बारे में संक्षिप्त जानकारी बाद में पहले पढिए वचन की कहानी...

उत्तर प्रदेश। कोई छोटा शहर। चंचल हंसमुख कमला की मां बहुत पहले चली गई थी। डैडी दीनानाथ (एस.के. प्रेम) हिसाब किताब का काम करते हैं। उनकी आंखें कमज़ोर हैं। कई बार बड़ी ग़लतियां कर बैठते हैं। निर्धन परिवार की कमला (गीता बाली) और धनी परिवार का प्रेम (बलराज साहनी) प्रेमी हैं। प्रेमी की विधवा मां (परवीन पाल) को हाई ब्लड प्रैशर रहता है, अफ़ीमची मुनीम घासीराम (राधाकृष्ण) पर चीख़ती रहती है। घासीराम नौकर ही नहीं है घरके कामकाज देखता है और मालकिन को सलाह मशविरा देता रहता है।
कमला के बहुत होशियार छोटे भाई कुमार (ब्रिज) ने हाल ही में बीए का इम्तहान दिया है। अच्छे नंबरों से पास हो कर रहेगा। कुमार एमए करना चाहता है। उसे आगरा की सैर पर जाने के लिए पैसा चाहिए। पैसे न होने पर भी डैडी उसकी इच्छा पूरी करना चाहते हैं। कुछ और मेहनत कर के कुछ और कमा लेंगे। दूसरा भाई किशोर (बड़ा हो कर राजेंद्र कुमार) स्कूल में है।

एक बार हिसाब किताब में इतनी ग़लतियां हो गईं कि डैडी की नौकरी जाती रही। सेठ लक्ष्मीदास (मदन पुरी) के आगे हर अनुनय विनय बेकार गई। उनकी जगह बेटे किशोर को काम पर रखने के लिए सेठ जी राज़ी हो गए। शर्त थी कि बीए में पास होने पर ही कुमार को काम मिलेगा। मन मार कर कुमार नौकरी के लिए राज़ी हो गया। चलो शाम के समय पढ़ कर एमए कर लूंगा!’ डैडी ख़ुश हैं। अब बस बेटी कमला के हाथ पीले करने हैं। वह जाते हैं प्रेम की मां के पास...वह राज़ी हैं। कमला और प्रेम मंदिर में हैं। शादी पक्की हो ही गई है!तो प्रेम कमला को अंगूठी पहना देता है।
मुसीबतों ने एक साथ कष्टों का पहाड़ परिवार पर ढा दिया। बीए का रिज़ल्ट अख़बार में छपा है। कुमार नंबर एक आया है। डैडी को शुभ समाचार देने के लिए साइकिल उठाई और भागा घर की तरफ़ – और, और...उधर... डैडी को समाचार मिला तो वे भागे बेटे से मिलने...और, और.... कुमार से टकरा गया एक ट्रक, और, और... इधर से भागे डैडी रास्ते में किसी से टकराए तो चश्मा टूट गया। कोई बात नहीं, कोई बात नहीं कहते घर पहुंचे तो बेटे का शव रखा था। स्यापा मचा था। कमला रो रही थी, किशोर और पड़ोसी रो रहे थे...डैडी ने अपना सिर पत्थर पर दे मारा और बेहोश हो गए...
कई सप्ताह बाद... कमला की शादी को दस दिन बचे हैं। डॉक्टर साहब डैडी की आंखों से पट्टी उतारने वाले हैं। वे ख़ुश हैं: बेटी की शादी देख सकेंगे... लेकिन अब वे दृष्टिहीन हैं!
दुर्भाग्य साथ नहीं छोड़ रहा। डैडी की आंखें जाती रहीं, कुमार चला गया, जल्दी ही कमला विदा हो जाएगी। गुज़र बसर कैसे होगी? कम उम्र किशोर डैडी की हिम्मत बंधा रहा है –स्कूल छोड़ दूंगा, कुछ न कुछ काम कर ही लूंगा!’ कमला धक् से रह गई। तभी दिखाई दिए गीत गाकर भीख मांगते अंधा भिखारी और उसका बच्चा ओ बाबू, ओ जाने वाले बाबू, एक पैसा दे दे...कमला ने तय कर लिया शादी सात साल बाद करेगी - इस बीच परिवार की मदद करेगी। यही वह प्रेम से चाहती है। प्रेम का कहना है कि शादी के बाद भी वह डैडी और किशोर की मदद करता रहेगा। कमला सहमत नहीं है - क्योंकि डैडी इस के लिए तैयार नहीं होंगे।
प्रेम की मां को होने वाले समधी के दुर्भाग्य की ख़बर मिली तो सन्न रह गईं। घासीराम ने आग में घी डाला। शादी के बाद समधी और किशोर यहां रहने आ गए तो कैसा लगेगा? और सात साल तक शादी टालने की बात प्रेम सोच ही कैसे सकता है!’ मां ने तय कर लिया–‘यह सब नहीं चलेगा। शादी होगी, अभी होगी!’ रोती है, बिसूरती है, सिर पटकती है, छत पर जा कर कूदने को दौड़ती है। प्रेम को झुकना ही पड़ता है। उसकी शादी हो जाती है श्यामा (नीरू) से। श्यामा को पता चला प्रेम-कमला का प्रेम प्रकरण तो आग बबूला हो गई। यह थी प्रेम की शादी की अप्रिय शुरूआत।
इधर कमला टाइपिस्ट बन गई है। घरबार ठीक चल रही है। कई साल बीत गए हैं। अब किशोर (राजेंद्र कुमार)
बड़ा हो गया है। अच्छी नौकरी मिल गई है। प्रेम के दोस्त काशीराम की भतीजी तारा (नीलिमा) से शादी हो गई है। नवदंपती के लिए कमला बोझ है। वे कमला पर आरोप लगाते हैं चोरी का। कमला और डैडी घर छोड़ते हैं। कमला नर्स बन गई है। उसके वार्ड में दाख़िल है बीमार श्यामा। कमला नहीं जानती यह प्रेम की पत्नी है।

पाकिस्तान सरकार ने हिंदुस्तानी फ़िल्मों के आयात पर रोक लगा दी। वचन पाकिस्तान में नहीं दिखाई जा सकती, पर उसकी सफलता की कहानी घर घर में सुनी जा रही है। कमाई का अच्छा मौक़ा है। तो एक साथ दो वचन बनने लगीं –हमीदा और लख़्ते जिगर। दोनों में प्रेम का रोल संतोष कुमार ने किया। दोनों में नए ऐक्टर लिए गए- छोटे भाई किशोर की भूमिका में ऐजाज़ हमीदा में और हबीब लख़्ते जिगर में। दोनों में होड़ थी पहले कौन सी रिलीज़ होगी। एक हफ़्ते पहले रिलीज़ हुई हमीदा 10 फ़रवरी 1956 को। इस पहल का फ़ायदा भी उसे मिला। चली तो ख़ूब चली, हालांकि समीक्षकों की नज़र में दूसरी लख़्ते जिगर बेहतर थी।

एक ही रास्ता 1956

 बी. आर. चोपड़ा ने बनाई पंडित जी की सीधी सादी एक ही रास्ता- अजब असमंजस की कहानी। संदेश था विधवा विवाह।
कहानी थी चार मुख्य पात्रों की - बड़े सरकारी ठेकेदार कुंवारे प्रकाश मेहता (अशोक कुमार) की और उनके कर्मचारी अमर (सुनील दत्त) की, अमर की पत्नी मालती (मीना कुमारी) की और बेटे राजा (डेज़ी ईरानी) की। अमर और मालती दोनों अनाथालयों में पले हैं। उनके साथ का बच्चा राजा भी अनाथालय से लिया गया है। उन के लिए कहने को कोई अपना नहीं है। कोई है तो प्रकाश मेहता है। वह अमर का मालिक कम और दोस्त ज़्यादा है। अमर और मालती के घर जब तब आता रहता है। मालती के लिए वह घर का सदस्य ही है। वह बड़े से बंगले में रहता है। कुंवारेपन की बात करो तो कहता है कि जैसी सर्वांग संपूर्ण पत्नी उसे चाहिए वह शायद ही कभी मिले।
फ़िल्म शुरू होती है एक सुबह। अमर और राजा व्यायाम कर रहे हैं। मालती नाच का रियाज़ कर रही है। तीनों में जो घनिष्ठ अपनापन है वह हम देखते हैं उन के खेल कूद से, आंख मिचौनी से। राजा बन जाता है डकैत और वे उस के शिकार। साथ साथ पिकनिक पर जाते हैं, मस्ती करते हैं।
कंपनी का मुंशी है बिहारी (जीवन)। वह ट्रक वाले से मिलाजुला है। जितना सीमैंट ट्रक में भेजा जाता है, उस से कम किताबों में लिखवाया जाता है। मुनाफ़ा दोनों बांट लेते हैं।
एक दिन - स्विंग पूल पर अमर, मालती और राजा खेल कूद रहे थे। अमर ने देखा कि बिहारी ट्रक से सीमैंट किसी को बेच रहा है। अमर ने दोनों को रंगे हाथ पकड़ लिया और तत्काल कार्रवाई की। ट्रक वाला जेल गया। बिहारी को भी नौकरी से हाथ धोकर जेल की हवा खानी पड़ी थी। अब जेल से छूट कर खोमचे पर मिठाई बेच रहा है। अमर ने देखा तो उसे सुधरने की सीख देने लगा। ट्रक वाला भी आ निकला। कहासुनी मारपीट में बदल गई। ड्राइवर और अमर कभी सड़क पर, कभी कीचड़ में भिड़ते गारे से लथपथ हो गए। ट्रक वाला भाग निकला। और – कुछ दिन बाद मौक़ा देखकर ड्राइवर उस अमर को कुचल कर भाग लिया।
जो कभी हंसती खेलती छोटी सी गृहस्थी थी अब निराधार घर बन गई। बेटा राजा पूछता, पिताजी कहां हैं तो उसे कठोर सच बताने की हिम्मत न मालती को होती न प्रकाश को। कह देते, वे अस्पताल में हैं। वह पूछता, कब आएंगे तो कह देते, जल्दी ही। यह जो झूठ था उसे बनाए रखने के लिए अमर की तरफ़ से राजा को खिलौने दे देते। कहते, अच्छे बच्चे बनोगे, स्कूल जाओगे, दोनों जून खाना खाओगे तो पिताजी और जल्दी आ जाएंगे

अरविंद कुमार 
मालती का उत्साह बढ़ाने के लिए प्रकाश ने सलाह दी, डांसिंग का स्कूल खोल लो। मन बहला रहेगा और आमदनी भी होगी। उसका बार-बार मालती से मिलने आना पड़ोसियों मे कानाफूसी का विषय बन गया। ऊपर से बिहारी अफ़वाहें फैलाने लगा – मालती और प्रकाश के बारे में। कभी कभी वह मालती से मिलने भी आ धमकने लगा।
एक दिन प्रकाश घर आया तो देखा बिहारी मालती को पकड़ने की कोशिश कर रहा है। उस ने बिहारी को एक दो जड़ दिए। अब बिहारी पड़ोसियों को और भी भड़काने लगा। एक दिन बिहारी के गुंडों से लड़ते लड़ते प्रकाश के सिर से ख़ून बहने लगा। लोगों को शांत करने के लिए प्रकाश ने अपने ख़ून से मालती की मांग भर दी। शादी के बाद जीवन आसान नहीं था। यह एक ही रास्ता था लोगों के मुंह बंद करने का। यही नहीं उन दिनों के दस्तूर से किसी विधवा से विवाह भी कोई आसान नहीं था। आजकल का ज़माना होता तो शादी किए बिना भी साथ रह सकते थे – कोई उंगली भी न उठाता।
अगले रविवार पंडित मुखराम शर्मा की कुछ और फ़िल्में...
(सभी फोटो नेट से साभार)
 सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ीअगले रविवार
संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस) 

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Bottom Ad