जंगली, पड़ोसन, विक्टोरिया नंबर 203 यानी हंसी, रोमांस और रोमांच की त्रिवेणी - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 15 दिसंबर 2019

जंगली, पड़ोसन, विक्टोरिया नंबर 203 यानी हंसी, रोमांस और रोमांच की त्रिवेणी

सायरा बानो विशेष (दो)

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–113



जंगली प्योर रोमांस थी, पड़ोसन थी रोमांस में हंसी का पिटारा, और विक्टोरिया नंबर 203 थी क्राइम थ्रिलर, हंसी और रोमांस की त्रिवेणी

जंगली के बाद अपनी तीन शुरुआती फ़िल्मों शादी, ब्लफ़ मास्टर, और आई मिलन की बेला (बरखा) के आते आते सायरा बानो बॉलीवुड पर छा गई थी। दर्शकों को मोहने के लिए उसने दीं लगातार आओ प्यार करें, एप्रिल फूल, दूर की आवाज़, यह जिंदगी कितनी हसीन है (प्रिंसेस सरिता), प्यार मोहब्बत, शागिर्द, दीवाना, अमन, पड़ोसन (बिंदु), झुक गया आसमान (प्रिया खन्ना), आदमी और इनसान, और गोपी जैसी कई फ़िल्म। इसके बाद मेरी राय में उसकी महत्वपूर्ण फ़िल्म थी मनोज कुमार की पूरब और पश्चिम (पश्चिम में पली बढ़ी इंग्लिस्तानी तौर तरीक़ों वाली हसीना के भारतीय आदर्श नारी बनने की जटिल प्रक्रिया)। 1972 की विक्टोरिया नंबर 203 (रेखा), ज्वार भाटा, रेशम की डोरी, इंटरनेशनल क्रुक के बाद वह दिखाई दी पति दिलीप कुमार के साथ उत्तर-पूर्व के चायबाग़ान वाली सगीना में। अब नाम गिनाने को बचती हैं पॉकेटमार, आरोप और पैसे की गुड़िया। सन् 1975 में ज़मीर, साज़िश, चैताली और आख़री दाव तक कुल मिला कर तीस फ़िल्मों पर उनका सिनेमाई सफ़रपूरा हुआ।
इन सब में से मैं सायरा की तीन बेहद मज़ेदार जंगली, पड़ोसन और विक्टोरिया नंबर 203 पर ही विस्तार से लिखूंगा। ये तीनों हमारा हिंदुस्तान हो, हिमालय-पार अरबी-फ़ारसी देश हों, पश्चिम में पूरा यूरोप हो या ऐटलांटिक-पार बसे प्रवासियों का अमरीका – हर जगह अनगिनत नर नारी का और हर उम्र के बच्चे, बूढ़े और जवान का मनोरंजन करती आई हैं। तो सब से पहले
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जंगली /1960
शम्मी कपूर और सायरा बानो
सुपर डुपर हिट जंगली के निर्माता-निर्देशक थे सुप्रसिद्ध सुबोध मुखर्जी, जो बाद में बंबई में मेरी पसंद के फ़िल्मकार मित्र रहे। जंगली को चोटी तक पहुंचाने में शंकर-जयकिशन के साथ शैलेंद्र और हसरत जयपुरी का मेल गज़ब का था। मेरा छोटा भाई सुबोध हमारे बेटे सुमीत को अईअईया करूं मैं क्या सूकू सूकू सुना कर उछाला करता था। और प्रेम का तोहफ़ा मिल जाने पर हीरो की ख़ुशी का तूफ़ानी ऐलानयाहू! / चाहे कोई मुझे जंगली कहे/ कहने दो जी कहता रहे/ हम प्यार के तूफ़ानों में घिरे हैं/ हम क्या करें/ याहू! तो हर जगह गूंजता रहता था। इतना मस्ताना ख़ुशी का दमदार बखान परदे पर कोई शम्मी कपूर ही कर सकता था। और जिस नाज़ुक परी (सायरा बानो) से उसे मोहब्बत हो गई थी उस का कहना था काश्मीर की कली हूं मैं/ मुझसे ना रुठो बाबूजी/ मुरझा गई तो फिर ना खिलूंगी/ कभी नहीं, कभी नहीं1938 की वचन से फ़िल्म लेखन में आने वाले हुमायूं, अनमोल घड़ी और लव इन शिमला आदि लिखने वाले आग़ा जानी कश्मीरी काभी जंगली की सफलता में कम योगदान नहीँ था। 1966 की लव इन टोकियो के लेखक भी वही थे।
जंगली मूर्तिमान सुकुमार रोमांस की प्रतीक है। यह सब संभव हो पाया सभी प्रमुख पात्रों की सुनिश्चित परिभाषा से। मां (ललिता पवार) को परिवार की परंपरा पर अहंकार है। उसकी राय में गंभीरता ही मानव मात्र का एकमात्र गुण है। बेटे का जो रिश्ता स्वर्गीय पति तय कर गए हैं उससे रत्ती भर हटा नहीं जा सकता। जीवन में रोमांस की कोई जगह नहीं है। तीन साल परदेश में पढ़ कर आया हीरो बेटा शेखर (शम्मी कपूर) भी मां के आदर्शों पर चलता है। कभी हंसता नहीं। चेहरा क्रोध की प्रतिमा है। बात करने के नाम पर भौंकता है। कुछ ऐसा ही भूमिका के तौर पर कथावाचक हमें यह सब बता रहा है।
पहले ही दिन वह दफ़्तर गया तो कर्मचारियों की समझ में आ गया कि यह कोई कटखना कुत्ता है। एक कर्मचारी दस सैकंड लेट आया तो नौकरी से निकाल दिया गया। प्राइवेट सेक्रेटरी ने अस्पताल से फ़ोन किया कि प्रेमी की दुर्घटना के कारण आज नहीं आ सकूंगी, तो दफ़्तर बुला कर बताया गया – या तो नौकरी छोड़ो या छोड़ो रोमांस।
एक शेखर की बहन माला (शशिकला) ही है ख़ानदान में सब से अलग -वह कंपनी के मैनेजर के बेटे दफ़्तर में क्लर्क जीवन (अनूप कुमार) से चोरी छिपे प्रेम करती है। दोनों जानते हैं कि भेद खुल गया तो भारी तूफ़ान बरपा होने वाला है।
शेखर के लौटते ही मां ने बताया कि उसे आमगढ़ जाना होगा क्योंकि वहां की राजकुमारी (अज़रा) से स्वर्गीय पिताजी उसका रिश्ता पक्का कर गए हैं। शेखर सहमत हो गया – पिताजी की बात तो रखनी ही है। आमगढ़ संदेश भेज दिया गया कि शेखर आ गया है। संदेश पा कर वहाँ का राजकुमार आया तो उपहार स्वरूप शेखर के लिए ख़ानदानी तलवार लाया। शेखर की मां ने होने वाले साले को दस हज़ार नक़द तो दिए ही राजकुमारी के लिए बेशक़ीमत नैकलेस भी भेजा। राजकुमार शादी तत्काल कराने की ज़िद कर रहा है। लेकिन मां ने साफ़ साफ़ कह दिया - शेखर को ज़रूरी काम से कश्मीर जाना है, लौटने पर ही शादी हो सकती है।

शम्मी कपूर और सायरा बानो
दृश्य बदलता है। आमगढ़। वहां के हालात से साफ़ हो जाता है राजकुमार शादी तत्काल कराने की ज़िद का कारण। आमगढ़ के राजमहल की हालत ख़स्ता है। तमाम तरह के लेनदार एक दिन भी देरी के लिए तैयार नहीं हैं। ख़ुशकिस्मती से अब राजा साहब के पास दस हज़ार रुपए हैं। वही लेनदारों को बांट कर जान छुड़ा ली गई।
बंबई। शेखर और मां को पता चलता है कि माला जब तब कहीँ चली जाती है। मां को दाल में काला नज़र आता है। मैनेजर बाबू भी कुछ ऐसा ही इशारा करते हैं। तो तय किया जाता है हवा बदलने के लिए माला को भी शेखर के साथ कश्मीर भेज दिया जाए।
कश्मीर। स्कीइंग के मज़े लेने में मशग़ूल है शेखर। बाग़ों की सैर कर रहा है। और एक दिन बर्फीले ढलान से उतरते उस की मुठभेड़ हो गई कश्मीर की कली जैसी कोमल हीरोइन राजकुमारी (सायरा बानो) से। वह सब से खुले दिल से मिलती जुलती है, सबकी मदद करना चाहती है। उसका बचपन जा रहा है। डॉक्टर बाप की चुलबुली नटखट बेटी पर शेखर का क्रोधी चेहरा बेअसर है। कभी कभार वे यहां वहां टकराते रहते हैं।
ऐसे ही दिन बीत रहे थे। शेखर घर पर नहीं था। माला की तबीअत नासाज़ थी। डॉक्टर साहब के क्लीनिक क्या पहुँची मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। जल्दी ही वह मां बनने वाली है पता चलते ही वह चल दी पहाड़ की चोटी से कूदने। कूदने ही वाली थी कि डॉक्टर साहब की बेटी राज कुमारी ने देख लिया और बचा लिया। वापस घर ले आई। क्लीनिक में दाख़िल किया। माला ने अपना संकट बताया कि भैया को पता चलेगा तो उसकी ख़ैर नहीं होगी। राजकुमारी कोई ऐसी वैसी लड़की नहीँ थी। उसने कहा शेखर से वह निपट लेगी।
क्या कुछ नहीं किया उस ने शेखर को सताने के लिए। वह ग़ुस्सा होता तो गाती - काश्मीर की कली हूं मैं/ मुझ से ना रुठो बाबूजी/ मुरझा गई तो फिर ना खिलूंगी/ कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं। कभी वह जलधारा में गिर पड़ता, जूते चोरी हो जाते, उसकी मोटर बोट भटकती रह जाती। आख़िर एक दिन वह लाया बीमार बहन के लिए फूलों का गुच्छा।
माला के प्रसव का दिन आता जा रहा है। शेखर को रास्ते से हटाया जाना बेहद ज़रूरी है। कथा लेखक उस ज़माने की फ़िल्मों का लोकप्रिय लटका अपनाता है। साधु बना कर राजकुमारी को बैठा देता है। साधु महाराज फ़रमाते हैं, बच्चा, तुझे एक लड़की परेशान किए जा रही है। जा, शेषनाग मंदिर जा कर पूरे पंद्रह दिन पूजा पाठ कर!” शेखर तैयार हो गया और चला गया।
अपनी तरक़ीब पर ख़ुश होती राजकुमारी घर लौटी। तभी पता चला कि मंदिर की भयानक बर्फ़ीले तूफ़ान में कई यात्री मर गए हैं। वह निकल पड़ी शेखर को रोकने। पता चलते ही शेखर के ग़ुस्से का वारापार नहीं रहा। तूफ़ान में भटकते दोनों को मिली एक ख़ाली झोंपड़ी – हर तरह के सामान से लैस। दोनों ने उस में शरण ली। उसी में दोनों बंद रहे अगले पूरे दिन और रात। राजकुमारी का नटखटपन चालू है। शेखर परेशान है। आज को कोई निर्माता होता तो उस झोँपड़ी में कुछ करा कर ही रहता। पर कुछ तो हो ही रहा था वहाँ। सुबह हुई। शेखर जागा। सोई राजकुमारी को देखा, देखता ही रह गया –खटिया पर सोई थी रूप की राशि भोली भाली राजकुमारी - दीन दुनिया से बेख़बर, शांत।
उसे देखते न रहना अब शेखर के बस की बात नहीं थी। मानसिक उत्तेजना से बचने तूफ़ानी बर्फ़ में लकड़ियां चीरने लगा आग जलाने के लिए। लौटा तो राजकुमारी देखती रही। उसे नहीं पता था शेखर के मन में कैसा तूफ़ान मचल रहा है। आख़िर मन ही मन वह महसूस कर पाई शेखर के मन का तूफ़ान। बाहर बर्फ़ीला तूफ़ान रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। धीरे धीरे थम ही गया। एक और नई सुबह हुई – धूप खिली। और बहुत कुछ बदल गया था शेखर। इतना बदल गया था कि...अचानक मिले प्रेम के तोहफ़े पर ख़ुशी का तूफ़ानी ऐलान करने निकल पड़ा:‘याहू! चाहे कोई मुझे जंगली कहे/ कहने दो जी कहता रहे/ हम प्यार के तूफ़ानों में घिरे हैं/ हम क्या करें/ याहू!
अब शेखर वह नहीं है जो हुआ करता था। वह राजकुमारी से दिल की बात कर सकता है। कह रहा है, मैं पत्थर दिल नहीं हूं, मेरे सीने में भी दिल है!”
शेखर और राजकुमारी श्रीनगर लौटे तो माला मां बन चुकी थी। राजकुमारी ने बेबी के बारे में पूछा तो शेखर ने पूछा, किस का बेबी?” राजकुमारी ने बात टाल दी, अस्पताल में रोगी का बेबी। माला ने भाई का नया रूप देखा। राजकुमारी के पिता डॉक्टर साहब को पसंद नहीं आया बेटी का शेखर के साथ इतने दिन बाहर रहना। शेखर ने भरोसा दिलाया, जल्दी हम शादी कर लेंगे!”
तभी बंबई से आ गया मां का तार - भाई बहन तत्काल घर लौटो। नवजात बेटे को डॉक्टर साहब के पास छोड़ कर माला भाई शेखर के साथ घर पहुंची। और तभी शेखर के मनोनीत ससुर राजा साहब का तार मिला। होने वाले दामाद को बुलाया है। मां को सब बताने की हिम्मत शेखर नहीं जुटा पा रहा। माला को बेबी की याद सता रही है। बेबी का पिता जीवन कुछ पूछ नहीं पा रहा। दोनों चुप रहने का वादा कर लेते हैं। मां ने शेखर को आमगढ़ भेजने का आदेश सुना दिया। लेनदारों से निपटने का साधन समझ कर राजा साहब ने वहां उस के सम्मान में दावत का और नाच-गान का कार्यक्रम रखा है। शेखर को बच निकलने की एक ही राह समझ में आ रही है - अपने को पागल साबित करने की। सूकू नाम की अभिनेत्री (हेलेन) नाच शुरू करती है। उसे हटा कर शेखर गाने नाचने लगता है: अईअईया करूं मैं क्या सूकू सूकू– खो गया दिल मेरा सूकू सूकू - कोई मस्ताना कहे - कोई दीवाना कहे - कोई परवाना कहे जलने को बेक़रार। सब को भरोसा हो गया होने वाला दामाद पागल है। बात बंबई पहुंची। मां ने पगलाए बेटे का इलाज कराना शुरू किया। तमाम हास्य दृश्य होने लगे।
शेखर समझा - वह बच गया। क्लाईमैक्स का हर तत्व एक साथ उपस्थित हो गया। पहले तो कश्मीर से राजकुमारी आ पहुंची डॉक्टर पिता के साथ। आमगढ़ राजकुमारी भी दलबल के साथ आ गई। अजब गड़बड़ घोटाला था।
क्लाईमैक्स को लंबा नहीं खीँचा गया। जल्दी ही सब कुछ निपट गया। दुष्टों को जेल हुई, माला को पति और बेटा मिले। मां को मिली प्यारे बेटे की सायरा बानो जैसी बहू राजकुमारी।
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पड़ोसन / 1968
सामने वाली खिड़की में एक चांद का टुकड़ा रहता है...
जितनी बार भी मैं पड़ोसन देखता हूं हंसी से लोटपोट होता रहता हूं। मैं ही नहीं दुनिया भर के लोग पड़ोसन के दीवाने थे और हैं। अमरीका के न्यू जर्सी राज्य में रहता है मेरा छोटा भाई विनोद – पेशे से रिटायर्ड इंजीनियर। हम लोग वाट्सैप पर फ़िल्मों की बात कर रहे थे। मैंने बताया, पिक्चर प्लस पर माधुरी वार्ता में पड़ोसन पर लिखने वाला हूं। वह बोला, वाह, क्या फ़िल्म थी! क्या बात थी! भोला (सुनील दत्त), गुरु विद्यापति (किशोर कुमार) - और सामने वाली खिड़की में रहने वाली बिंदु (सायरा) का तमिलियन संगीत मास्टर पिल्लई (महमूद)। हंसी शुरू हो तो रुके ही नहीं। उधर से गाए महमूद तो इधर से हो सुनील दत्त की प्ले बैक सिंगिंग! क्या कल्पना थी, क्या सुरीली उड़ान थी...। सामने वाली खिड़की में चांद का टुकड़ा!’ वाह!!!

पड़ोसन महमूद की अपनी कंपनी की पहली फ़िल्म थी। सहनिर्माता थे एन.सी. सिप्पी, निर्देशक थे ज्योति स्वरूप (संदर्भवश महमूद की बहन ख़ैरुन्निसा के पति)। कभी बहुत पहले सन् 1952 में बनी थी बांग्ला फ़िल्म पाशेर बाड़ी। सीधा सादा लड़का पास वाली लड़की से प्रेम करने लगता है। उसे रिझाने की हर कोशिश नाकाम रहती है क्योंकि लड़की को नृत्यगीत पसंद है और लड़के को न गाना आता है न नाचना। अंततः लड़का अपने गायक मित्र की सहायता से सफल हो ही जाता है। उस पर आधारित या उससे प्रेरित हो कर तेलुगु में बनी 1953 की पक्का इंति अम्मयी (Pakka Inti Ammayi), 1960 की तमिल अदुथा वीट्टु पेण्ण (Adutha Veettu Penn), हिंदी की 1968 की पड़ोसन के बाद 1981 की एक और पक्का इंति अम्मयी (Pakka Inti Ammayi) और सन 2004 की कन्नड़ पककादामन्ने हुडिगे (Pakkadamane Hudige)।
कहने को बना बनाया नक़्शा सामने था, पर सही प्रभाव के लिए चाहिए था सशक्त लेखक। बड़ी सोच समझ के बाद महमूद ने राजेंद्र क्रिशन को चुना। सन 1919 को अविभाजित पंजाब के गुजरात ज़िले के जलालपर-जट्टां में दुग्गल परिवार में जन्मे राजेंद्र क्रिशन को आठवीं क्लास से पढ़ने लिखने का चस्का लग गया था। 1942 तक वह शिमला की म्यूनिसपल्टी में क्लर्क रहा। फ़िराक़ गोरखपुरी और अहसान दानिश की शायरी के साथ साथ पंत और निराला के काव्य से प्रभावित था। अनेक कविता प्रतियोगिताओं में रचनाएं भेजता रहता। उस का पहला स्क्रीन प्ले था 1947 की फ़िल्म जनता का। 1947 की ही ज़ंजीर में उसके गीत थे, 1948 की मोतीलाल-सुरैया वाली आज की रात के गीत और स्क्रीनप्ले भी उसके थे। आज के लोगों शायद याद हो गांधी जी की हत्या के बाद मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में सुपरहिट गीत सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो बापू की यह अमर कहानी।वह भी राजेंद्र क्रिशन ने लिखा था। पड़ोसन का सारा लेखन पक्ष (पटकथा, संवाद और गीत) उसी का था। 

संगीतकार राहुलदेव बर्मन के निर्देशन में गीत गाए थे आशा भोँसले, लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मन्ना डे, महमूद और राहुल देव बर्मन ने। गीत संगीत पक्ष पर मेरा इतना ज़ोर देना स्वाभाविक है – क्योंकि कथा का और फ़िल्म का विषय और विशाल सफलता का आधार गीत और संगीत भी थे। इनके साथ था हर एक कलाकार का पात्रानुकूल अभिनय। मेरे लिए देवदास में सहगल का अभिनय शब्दों में बताना आसान था, लेकिन चार्ली चैपलिन जैसे हास्य कलाकार का वर्णन करना बहुत कठिन होता है– क्योंकि चालढाल, भावभंगिमा बोलने का लहज़ा शब्दों में बताए नहीं जा सकते। पड़ोसन में तो एक नहीं कई कलाकार हैं -महमूद (मास्टर पिल्लई), सुनील दत्त (भोला) की हिम्मत बढ़ाने वाले किशोर कुमार (विद्यापति गुरु), मुकरी (बनारसी), केश्टो मुखर्जी (कलकतिया), राजकिशोर (लाहौरी)। इनका क्रियाकलाप देखने से संबंध रखता है बताने या पढ़वाने से नहीँ। बस, कुछ तस्वीरें दिखा सकता हूं और संक्षेप में कहानी बता सकता हूं।
पंडित (सुंदर) बड़े मकान में जाता है। कुंवर प्रताप सिंह (ओमप्रकाश) के कराहने की आवाज़ें सुन कर लोगों को इकट्ठा कर लेता है – कोई कुंवर जी को मार रहा है। ये आवाज़ें पहलवान से मालिश करवाते कुंवर जी की हैं। शांति होती है। पंडित लाया है सोलह सत्रह साल की कुंवारी का रिश्ता। कुंवर जी कहते हैं,“ज़रा आहिस्ता बोल। भीतर मेरा भानजा है। उसे बाहर भेज कर आता हूं।
यह भानजा है भोला (सुनील दत्त)। भोला सचमुच भोला है। जीवन के आश्रम बताने वाली किताब बोल बोल कर पढ़ रहा है। एक से पच्चीस बरस तक आदमी को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, छब्बीस से पचास साल तक गृहस्थाश्रम भोगना चाहिए, उस के बाद...मामा जी (कुंवर जी) बोले, भोला, जा, जा बाग़ों की सैर कर!” यही बड़ी ग़लती वह कर बैठे।
बेमन से भोला ने किताब उठाई, मछली पकड़ने की बंसी थामी और चल दिया। सड़क पर साइकिल-सवार सहेलियां इतराती इठलाती सैर कर रही हैं। फिर झील में किलोल कत रही हैं। झील-किनारे बैठा भोला किताब पढ़ रहा है, एक से पच्चीस बरस तक आदमी को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, छब्बीस से पचास साल तक गृहस्थाश्रम भोगना चाहिए, उस के बाद...। मछली पकड़ने का कांटा झील में पड़ा है। पानी में हलचल हुई। यह मछली नहीं थी, झील में नहाती बिंदु (सायरा बानो) थी– वही लड़की जिसका रिश्ता ले कर पंडित मामा के पास आया था। सुंदरियों से छुटकारा पा कर भोला फिर पढ़ने लगा,एक से पच्चीस बरस तक आदमी को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, छब्बीस...।छब्बीस पर आ कर भोला अटक गया। अरे! मैं तो छब्बीसवें साल के आधे में हूं। मेरे छह महीने बरबाद हो गए!” वह घर आया। मामाजी पर बिगड़ने लगा। इतनी उम्र हो गई और आप अपने लिए एक और रिश्ता ढूंढ़ रहे हैं। मैं यहां नही रहूंगा। जाता हूं मामी जी के पास।

मामी के घर में हमेशा की तरह उसने बिस्तर जमाया ऊपर वाली मंज़िल पर। यह क्या! सामने वाली खिड़की में दिखी वही लड़की जो झील में उस के कांटे में फंस गई थी। देखा तो देखता रह गया! सीधा गया वहां जहां गुरु विद्यापति के पंचरत्न नाटक मंडल का लैला मजनूं नाटक हो रहा था। सीधे मंच पर जा धमका और बता दिया अपने दिल का हाल। सब के सब आ गए उस के कमरे पर।
भोला बार बार देखता रहता सामने वाली खिड़की को। दिखाने को बिंदु को पसंद नहीं आई भोला की ताका झांकी। पर वह न दिखता तो भी बिंदु को बुरा लगता। गली में भोला उससे बात करने की कोशिश करता तो झिड़क देती। मित्र मंडली बिंदु के हर पहलू को परख रही थी। उसे संगीत सिखाने आते थे मास्टर पिल्लई (महमूद)। गुरु विद्यापति के नेतृत्व में सब जा पहुंचे बाग़ में जहां मास्टर पिल्लई ले गए थे बिंदु को। दोनों की हर हरक़त पर नज़र रख कर गुरु विद्यापति ने विश्लेषण किया कि बिंदु को मास्टर पिल्लई पसंद नहीं हैं, उनका संगीत पसंद है।
अब रास्ता साफ़ था। भोला को संगीत सिखाओ। भोला संगीत सीखने के क़ाबिल ही नहीं था। अब गुरु विद्यापति को बड़ी दूर की सूझी – भोला से प्लेबैक सिंगिंग कराओ। बिंदु ख़ुश, भोला ख़ुश। मित्र मंडली ख़ुश। मास्टर पिल्लई परेशान।
लेकिन प्यार की डगर सीधी कहां चलती है! भोला की गायकी का भेद खुलना ही था, खुल गया। भोला परेशान। मित्र मंडली परेशान। मास्टर पिल्लई ख़ुश। बिंदु आगबगूला, क्रोध में आपे से बाहर! लाल पीली! भोला शादी से बाहर, मामा कुंवर प्रताप अंदर। मित्र मंडली पहुंची मामा जी के पास। समझाया मनाया। बिंदु से शादी का इनकार कराया। बिंदु का पारा और ऊपर! उसने तय कर लिया मास्टर पिल्लई से शादी कर के रहेगी।
अब क्या करें
? गुरु विद्यापति को सूझी एक नई जुगत। एक ही रास्ता है – भोला की आत्महत्या का नाटक रचाया जाए। भोला की मौत पर रोना धोना और कुहराम मचने लगा। बिंदु भी सदमे में आ गई। दौड़ी दौड़ी आई भोला के घर। लगी भोला को होश में लाने। विद्यापति ने उसे समझाया,“तेरा प्यार ही भोला को जिला सकता है!” बेचारी बिंदु कोशिश पर कोशिश करती रही। आख़िर भोला कराहा। रोया, बिंदु को गले लगा लिया। भोला के मामा मामी भी मान गए। शादी हो रही है। दरवाज़े पर आंसू बहाता मास्टर पिल्लई शहनाई बजा रहा है।
अभिनय बताया नहीं जा सकता तो न सही पात्र तो दिखाए जा सकते हैं$

विक्टोरिया नंबर 203 / 1972

एक ऐसी फ़िल्म जिसे चरित्र अभिनेता अशोक कुमार और प्राण ले उड़े!

जंगली प्योर रोमांस थी और पड़ोसन थी हंसी का रोमांटिक पिटारा, तो विक्टोरिया नंबर 203 थी क्राइम थ्रिलर-हंसी-रोमांस की त्रिवेणी। गीत गाया पत्थरों ने, ज्वैल थीफ़, जानी मेरा नाम जैसी नामचीन फ़िल्मों के कथाकार के. ए. नारायण ने लिखी थी विक्टोरिया नंबर 203।
जिसे हम मेरठ में बग्घी कहते थे, जो गिने चुने रईसों के पास होती थी, और बारातों की शान बढ़ाने के लिए उन से उधार मांगी जाती थी, सन 1963-64 में बंबई में वह विक्टोरिया कहलाती थी और किराए की सवारी के तौर पर चलती थी। हिंदी ब्लिट्ज़ के तत्कालीन संपादक कभी दिल्ली के माडल टाउन में मेरे मित्र और पड़ोसी थे। बंबई की सैर कराने का ज़िम्मा उन्होंने ले लिया था। मैरीन ड्राइव पर विक्टोरिया में सैर करना हम दोनों का शौक़ था। अक्सर मैं साईस के साथ ऊपर बैठ जाता। ऊपर बैठने का एक मज़ा था विक्टोरिया का लैंप पकड़ना। इस लैंप में ऊपर से नीचे तक एक पोला होल्डर हुआ करता था। लैंप का यह पोला भाग चोरी के हीरों को छिपाने की जगह हो सकता है – यही आधार था विक्टोरिया नंबर 203 की मज़ेदार कहानी का। 


अजायबघर में गोलकुंडा की ख़ान के हीरों की नुमाइश हो रही है। इनकी क़ीमत तीन करोड़ आंकी गई है। शहर के जाने माने रईस सेठ दुर्गादास (अनवर) की नज़र में वे गड़ गए। बंबइया फ़िल्मों में अकसर सेठ चोरों के सरदार होते हैं। ये लोग अजायबघरों में से हीरे चुरवाते हैं। अकसर फ़िल्मों में हीरे चुरवाने का रास्ता होता है सड़क के बीच के मैनहोल से होते हुए हीरों के शोकेस तक पहुंचना। सेठ जी ने एक मशहूर चोर को दस लाख रुपए का लालच दे कर हीरे चुरवा लिए। चोर की नीयत बदल गई। वह हीरे ले कर भागा। उसे पकड़ने के लिए जो भेजा गए चोर ने उसे 203 नंबर की विक्टोरिया के पास मार दिया। उस के ख़ून का इल्ज़ाम विक्टोरिया के साईस पर लगा और उम्र क़ैद की सज़ा भी हो गई। जिस ने पिछले चोर को मारा था उसके भी पीछे लगे थे सेठ के आदमी। बचते बचते उसने हीरे विक्टोरिया के लैंप में छिपा दिए थे। भागमभाग उसने एक पर्चे पर लिखा विक्टोरिया नंबर 203 और रेलवे स्टेशन के लॉकर में रख दिया। उस की चाभी अपने विग मॆं छिपा ली।
अब आगे...
जेल में दो उठाईगीरे हैं। राजा (अशोक कुमार) और राना (प्राण)। राना दीवार पर बच्चों की प्राम की तस्वीर बना कर उस में एक बच्चा बैठाता रहता है। ऐसी ही प्राम से उस का बेटा चोरी हो गया था। अच्छे बर्ताव के लिए राजा और राना दोनों को दो महीने पहले रिहा कर दिया जाता है। दोनों सड़कों पर इघर उधर कुछ कमाने की जुगत में भटक रहे हैँ। घटनावश एक दुर्घटना में उन्हें मिल जाती है उस हीरे छिपाने वाले की लाश। उसे गड्ढे में डालने के लिए घसीटते हैं तो विग के नीचे से चाभी मिल जाती है। राना को यह समझने में देर न लगी कि ज़रूर इस के ताले में कोई रहस्य बंद है। अब तलाश है बिन चाभी के ताले की। शुरू होता है फ़िल्म का सब से रोचक प्रकरण और गीत।
राजा और राना गली गली सड़क सड़क घूम रहे हैं। आदत से मज़बूर राजा औरतों की तरफ़ मुड़ता है, राना रोकता है। दोनों गा रहे हैं:

दो बेचारे बिना सहारे देखो पूछपूछ कर हारे / बिन ताले की चाभी लेकर / फिरते मारे मारे/ मैं हूं राजा ये है राना / मैं दीवाना ये मस्ताना / दोनों मिलके गाएं गाना / ओ हसीना / ज़रा रुक जाना / तू बता दे इसका प्रीतम कहां पे छुपा है / कुछ पता दे - वो तो निकला बड़ा बेवफ़ा है / कुछ बोल - बोल ओ रानी / बोलो, कुछ बोल बोल ओ रानी/ ओ कहां इसका रूठ गया जानी / ओ मस्तानी/ कोई निशानी या ज़ुबानी/ बोलो रानी मेहरबानी / ओ हसीना आ / ओ कुछ बोलो ना // ‘मुझे कुछ नहीं पता’ // ‘कुछ नहीं पता’/ चल राजा / अब यहां भी बज गया बाजा

इस के बीच उन्हें पता चलता है कि चाभी किसी लॉकर की है....

तू बता दे इसका मिलता नहीं हमको लॉकर/ कुछ पता दे - तेरे बन जायेंगे हम नौकर/ ओ ससुराल से देखो हम आये/ हां, ससुराल से देखो हम आये/ चाभी लेकर चकराये/ हैं घबराये/ आके तुमसे ही टकराये/ धक्के खाये/ समझ ना आये/ ओ पापे हय/ ओ कुछ बोलो ना//’ओय मुझे कुछ नहीं पता’/ चल राजा/ पापे ने भी बजा दिया बाजा
ए स्वामी/ ए अन्तर्यामी/ अरे दीनबन्धू/ ‘हे जगद्पती की जय’// ओ स्वामी तूने कैसा किया है घोटाला/ अन्तर्यामी, तूने कैसा किया है घोटाला/ ओ दे दी चाभी - पर दिया है नहीं हमको ताला/ गर माल मिलेगा ज़्यादा/ ओ तुझको दे देंगे आधा/ ये है वादा/ क्या इरादा/ कोई काम नहीं है ज़्यादा/ ले के जाना आधा-आधा/ ओ बाबा हाँ/ ओ बिनती सुन लो आ/ ओ स्वामी जी/ ओ अन्तर्यामी जी/ कुछ बोलो…”

पूरी फ़िल्म का सब से रोचक और महत्वपूर्ण तथा कथानक को आगे बढ़ाने तत्व है – अशोक कुमार और प्राण की हंसी से लोटपोट करने वाली जुगलबंदी।


इसका मतलब यह नहीं है हीरोइन रेखा (सायरा बानो) और हीरो कुमार (नवीन निश्चल) की भूमिका नज़र अंदाज़ हो जाती है। लॉकर मिल गया। उसमें बस एक पर्ची हैः विक्टोरिया नंबर 203। अब रास्ता साफ़ है। हो न हो हीरे उसी में हैं। वे पहुंचते हैं विक्टोरिया नंबर 203 के अस्तबल। बग्घी अब एक चलाता है। मसें भीँज रही हैँ। वास्तव में वह रेखा (सायरा बानो) है – साईस की बेटी। यह भेद बाद में खुलता है। दोनों उस के पास आते हैं। कहते हैं, कई साल बाद आए हैं। बग्घी वाले के रिश्तेदार हैं, तुम्हारे चाचा। अब आ गए हैं, तो तुम्हारा सहारा बनेंगे। रात के अंधेरे में बग्घी का एक एक हिस्सा टटोलते।
दिन में लड़का बग्घी चलाता। सवारियां ढोने के साथ साथ वह जासूसी भी कर रहा है। उसे पता है कि पिता निर्दोष है। सवाल यह है कि किन लोगों के कारण वह जेल गया। उसका एक गाहक है रंगीन मिज़ाज कुमार – सेठ दुर्गादास का लाड़ला बिगड़ा बेटा कुमार (नवीन निश्चल)। कुमार हर रोज़ नई लड़की के साथ आता है।
एक दिन राजा राना ने देखा कि यह लड़का नहीं लड़की है – रेखा (सायरा बानो)। बेचारी छोटी बहन के साथ जैसे तैसे घर चला रही है। राजा राना के भीतर सोया इंसान जागता है। वे रेखा को सारा सच बता देते हैं। अब इन तीनों का एक लक्ष्य है हीरे खोजना और असली अपराधियों को पकड़वाना। धीरे धीरे रेखा और कुमार एक दूसरे को चाहने लगते हैं।
हर अपराथ फ़िल्म में पेच के बाद पेच होते हैं, एक के बाद एक नया मोड़ आता है। प्रेम कथा और जासूसी कथा साथ साथ चलती हैं।
अंत में सब ठीक हो जाता है। पता चलता है कुमार वास्तव मे राना का बेटा है। निस्संतान सेठ दुर्गादास को अथाह संपत्ति तभी मिल सकती थी जब कोई बेटा हो। इसलिए उसने पार्क में से नन्हे कुमार को उठवा लिया था। सेठ पकड़ा जाता है। राना को बेटा बहु मिल जाते हैं। राजा उनके साथ रहने लगता है।
समीक्षा के तौर पर मैं इतना ही कहूंगा कि यह फ़ॉर्मूला फ़िल्म अपने पैमाने पर सही उतरती है। शुरू से आख़िर तक देखने वालों को बांधे रखती है। ऐसे दर्शकों में मैं भी एक था और आज तक उस का प्रशंसक हूं।
अंत में याद रहती है अशोक कुमार और प्राण की ज़िंदादिल जोड़ी और गीत

दो बेचारे बिना सहारे
देखो पूछपूछ कर हारे
बिन ताले कीचाभी लेकर
फिरते मारेमारे
मैं हूँ राजा ये है राना
मैं दीवाना ये मस्ताना
दोनों मिलके गाएं गाना....

अरविंद कुमार

सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ीअगले रविवार
संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

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