मीना कुमारी ने ग़ज़ल में लिखा था-दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 29 दिसंबर 2019

मीना कुमारी ने ग़ज़ल में लिखा था-दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली!

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–115


अमरोहे वाले कमाल को लाहौर से बंबई लाने वाला कोई और नहीं स्वयं स्वर सम्राट कुंदन लाल सहगल थे।
आएगा, आएगा, आने वाला आएगा : कोई गा रही थी। आने वाले आकर ही रहे। एक नहीं कई आए। सन् 1949 वाली फ़िल्म महल आई, मधुबाला आई, लता मंगेशकर आई, खेमचंद्र प्रकाश आए। और आया कमाल अमरोही, जो पहली बार फ़िल्म निर्देशक बना था। मेरा मतलब है ये सब पहली बार पब्लिक की नज़र में आए।
कमाल अमरोही का जन्म हुआ था उत्तर प्रदेश के शहर अमरोहा में 17 जनवरी 1918 को। अब्बा को उसका फ़िल्मी जुनून पसंद नहीँ था। बग़ावत करके सोलह साल का कमाल लाहौर भाग आया। बीस साल का होते होते 1938 वहां कुंदन लाल सहगल जैसे पारखी ने उसे पहचान लिया। कैसे मिले, किस बात पर सहगल रीझे – पता नहीं। कोई ग़ज़ल थी, कहानी थी, या कहीं कोई कार्यक्रम था? – इसका ब्योरा कहीं नहीं मिलता। हां, यह पता है कि शैक्सपीयर से प्रभावित कमाल उस ज़माने में प्रचलित पारसी थिएटर की शैली में लिखता था। बंबई में सहगल ने उसे सौंप दिया सोहराब मोदी को – सोहराब मोदी जो अपने ज़माने का धुरंधर था। बाद में कमाल कारदार के संपर्क में आया। यह लाज़िमी भी था क्योंकि कारदार की फ़िल्म शाहजहां का नायक था सुहैल नाम का शायर यानी कुंदन लाल सहगल। इस शाहजहां की कहानी इसी कमाल ने लिखी थी।
ऐसों की संगत में रहना, उनके लिए काम करना – कितनों को मिलता है ऐसा मौक़ा! और कितने हैं जो अपने आप को घिसते मांजते रहते हैं, कामयाब होते हैं और चोटी तक पहुंचते हैं? ऐसा एक था कमाल।
कमाल का पूरा नाम बेहद लंबा था : सैयद अमीर हैदर कमाल नक़वी, जो कमाल अमरोही में सिमट गया।
जेलर 1938
सोहराब मोदी के लिए पहले ही साल बीस साल के कमाल ने लिख डाली बेहद पेचीदा मनोवैज्ञानिक मैलोड्रामा फ़िल्म जेलर (1938)। मैलोड्रामा को परिभाषित करें तो दर्शकों को उद्वेलित करने के लिए कथापात्रों की उत्तेजित भावनाओं को बढ़ाचढ़ा कर पेश करने वाली अतिनाटकीय फ़िल्म।
कहानी लिखने में उसके साथ नाम आया था अमीर हैदर का। पटकथा लिखी थी जे.के. नंदा ने। और ग्यारहों गीत लिखे थे कमाल अमरोही ने। इसी में पहली बार अमीर ख़ुसरो का बंद काहे को बियाही परदेस रे सुन बाबुल मोरा शामिल किया गया था। कुछ और गीत थे: यह माया आनीजानी है यह माया बहता पानी है, प्रेम का इक संसार बसा ले, जहां में काश पैदा ही न होते।
मुख्य कलाकार थे सोहराब मोदी, लीला चिटणीस, सादिक़ अली ईरुक़ तारापुर, अबु बक़र, बेबी कमला और कुसुम देशपांडे।


शुरू में सोहराब मोदी बड़ा नरमदिल शख़्स था। हर आदमी, हर क़ैदी, उसे चाहता था। जो नहीं चाहती थी तो वह थी पत्नी कंवल (लीला चिटणीस)। एक दिन कंवल जेल के डॉक्टर के साथ भाग गई। अब जेलर निर्मम अत्याचारी बन गया। कहा जाता है कि संगदिल इंसान की ज़ालिमाना जल्लादी भूमिका में सोहराब मोदी ने कमाल कर दिखाया था। हर कोई उससे कांपता है। हालात ऐसे हुए कि दुर्घटना में डॉक्टर अंधा हो गया। पत्नी कंवल पकड़ी गई। जेलर ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया। इतने ज़ुल्म ढहाए, इतने ज़ुल्म ढहाए कि उसने आत्महत्या कर ली। अब जेलर के मन में दया ममता जागी एक अंधी लड़की के लिए। धीरे-धीरे वह तानाशाह से सामान्य कोमलहृदय इंसान बन गया। अब हुआ यह कि यह लड़की उसी अंधे डॉक्टर को चाहती है जिसके साथ उसकी पत्नी कंवल भागी थी। अब जेलर का एक ही उद्देश्य है – अंधे प्रेमियों को मिलवाना। इस कोशिश में उसे अपने प्राण गंवाने पड़ते हैं।
बीस साल बाद फिर मोदी ने इसी कहानी पर जेलर नाम की फ़िल्म बनाई। जेलर वही बना, बाक़ी कलाकार भिन्न थे।
पुकार 1939
जेलर के बाद अगले साल मोदी ने बनाई 1939 की पुकार – कहानी-पटकथा कमाल अमरोही की थी। अपने बचपन से मुझे याद हैं इसकी कहानी के कुछ सुनेसुनाए क़िस्से। लोककथाओं के अनुसार अकबर का बेटा बादशाह जहांगीर (चंद्रमोहन) अपनी न्यायप्रियता के लिए मशहूर था। जिस किसी के भी साथ अन्याय हुआ हो, वह महल के बाहर लटकी घंटी बजा सकता था। बादशाह स्वयं उसकी फ़रियाद सुनकर न्याय किया करता था। सुपरहिट पुकार की मुख्य कहानी थी राजपूत मंगल सिंह और राजपूतानी कंवर के प्रेम की। दोनों के परिवारों के बीच पुरानी दुश्मनी चली आ रही थी। झगड़ा हुआ तो कंवर के भाई और पिता मंगल के हाथों मारे गए। बेटे की करनी पर नाराज़ हो कर पिता संग्राम सिंह (सोहराब मोदी) ने मंगल को पकड़ कर बादशाह के सामने पेश किया...
पुकार का एक उपांग थी - बेगम नूरजहां के हाथों एक धोबी की मौत की कहानी। क़िले की दीवार से नूरजहां ने जो तीर चलाया वह घाट पर कपड़े धोते धोबी को लगा।
फोटो
घंटी बजा कर धोबिन ने इंसाफ़ की मांग की। क़ानूनन उसका हक़ था कि हत्यारन बेगम नूरजहां के पति बादशाह जहांगीर की मौत मांग ले! और यही मांग उसने की भी। अंत क्या होता है – यह दीगर बात है, पर फ़िल्म बेहद लोकप्रिय थी और उसका यह अंश बार बार न्याय की पराकाष्ठा के तौर पर पेश किया जाता था। बच्चे भी इसे खेला करते थे। इसका एक उदाहरण मैंने पेश किया था अपने संस्मरणों के भाग 92 – प्राण – 14 जुलाई 2019में।
हीरो के रूप में बीस साल के प्राण की पहली हिंदी फ़िल्म थी - पंचोली की 1942 की सुपरहिट ख़ानदान। ...फ़िल्म शुरू होती है। 1939 की पुकार के इसी सीन को नाटक के रूप में पेश कर रहे हैं बचपन में जहांगीर और नूरजहां बने (प्राण और ज़ीनत)। सामने से अनवर की छोटी बहन निर्धन धोबी के रूप में आ रही है। वह नूरजहां के हाथों मारी जाती है
शाहजहां 1946
अपने ज़माने के मूवी किंग अब्दुल रशीद कारदार के शाहजहां की कहानी कमाल अमरोही की थी। एक अजोबोग़रीब मनोकल्पना। शाहजहां (रहमान) के दरबार में फ़रियाद लेकर हाज़िर हुआ राजपूत सरदार ज्वाला सिंह। शिकायत यह है कि उसकी पालिता बेटी रूही (रागिनी) अपनी ख़ूबसूरती के लिए मुश्किल में है। पड़ोसी शायर सुहैल (कुंदन लाल सहगल) ने उसकी एक झलक क्या देखी, दीवानावार उस पर क़सीदे लिखने और गाने लगा। उसके बखान से लड़की और परिवार का जीना मुश्किल हो गया है। हवेली के बाहर भीड़ लगी रहती है - रूही की एक झलक पाने को उतावले आशिक़ों की। कब कौन उसे उड़ा ले जाएगा – यही संकट सिर पर मंडराता रहता है। बादशाह सलामत से दुआ है कि उसकी सलामती के लिए कुछ करें। बेगम मुमताज महल (नसरीन) से सलाह मश्विरा करके बादशाह शाहजहां ने हुक्म दिया कि रूही को शाही मेहमान बना लिया जाए और जल्द से जल्द कोई अच्छा रिश्ता तलाश कर शादी कर दी जाए।


रूही से शादी करने वालों में कंपीटीशन का ऐलान किया गया। क़िले के बाहर मजमा जमा हो गया। अब ऐलान किया गया क् दूल्हा वही बनेगा जो धरती पर बहिश्त ला सके। सब ग़ायब। बचा कुल एक – वही शायर सुहैल। सुहैल ने बहिश्त का जो लफ़्ज़ी ख़ाक़ा खीँचा उस से शाहजहां क़ायल हो गए। वह चुन लिया गया। शादी कुछ समय बाद होगी। बेगम की राज़दान सहेली जाफ़िज़ा (सुलोचना चटर्जी) को चिंता है कि कहीं बादशाह सलामत उस पर फ़िदा न हो जाएं। लेकिन बादशाह सलामत का कोई ऐसा इरादा है ही नहीं। इस बीच मुमताज महल जन्नतनशीन हो गईँ। शाहजहां ने वादा किया उसकी याद में मक़बरा बनवाएगा। मक़बरा बनाने वाले के लिए शर्त रखी गई कि जो संगसाज़ महल की ख़्वातीनों के हाथ परख कर सब से हाथ वाली को देखे
बग़ैर उस मुजस्समा बना पाएगा वही मक़बरा बनाएगा, और उस का शौहर भी बनेगा। जो उसे पसंद आई और जिस का सही मुजस्समा उसने बनाया वह निकली वही रूही! वह ईरानी संगसाज़ था शीराज़ी (पी. जयराज)। इधर रूही दिल से पूरी तरह सुहेल पर फ़िदा हो चुकी है। अब क्या हो?
यह सहगल की अंतिम फ़िल्म थी, और मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों वाली पहली फ़िल्म। संगीत निर्देशक थे नौशाद। सहगल के गीत जब दिल ही टूट गया, ग़म दिए मुस्तक़िल यह ना जाना, चाह बरबाद करेगी हमें मालूम न था, कर लीजिए चल कर मेरी जन्नत का नज़ारा, मेरे सपनों की रानी रूही अब तक याद किए जाते हैं।
कमाल ने तीन निकाह किए – पहला बिल्कीस बानो से, दूसरा मेहमूदी से, और तीसरा सन् 1952 में मीना कुमारी से। तब वह अठारह साल की थी और कमाल था चौंतीस साल का।

बात सन् 1951 की है। फणि मजूमदार के निर्देशन में मीना कुमारी, देव आनंद और अशोक कुमार की फ़िल्म तमाशा की शूटिंग हो रही थी। महल की ही तरह इस के निर्माता थे अशोक कुमार और सावक वाचा। किसी कारण वहां कमाल अमरोही का आना हुआ। अशोक कुमार ने उसका परिचय कराया सतरह साल की मीना कुमारी से। कुछ ही दिन बाद कमाल ने अपनी आने वाली फ़िल्म अनारकली में रोल ऑफ़र किया। 13 मार्च 1951 को मीना कुमारी ने उस में काम करने के कांट्रैक्ट पर दस्तख़त कर दिए। दो महीने बाद 21 मई को महाबलेश्वर में शूटिंग कर के मीना कुमारी लौट रही थी। रास्ते में कार का ऐक्सीडैंट हुआ, मीना को पुणें के सैसून अस्पताल में दाख़िल किया गया। बायां हाथ घायल हुआ था। डर था कि अब उस हाथ से वह कुछ नहीं कर पाएगी। उस पर डिप्रैशन के भयानक दौरे पड़ने लगी। उदासी के उन दिनों कमाल लगातार उससे मिलने आता रहा और हिम्मत बंधाता रहा। कभी मिल न पाते तो ख़तोकिताबत करते रहते। एक बार मीना ने डायरेक्टर कमाल से पूछा- क्या अब भी मैं अनारकली बन सकूंगी?” कमाल ने कहा, ना का सवाल ही नहीं उठता और पैन उठा कर हाथ पर लिखा अनारकली – मेरी
अनारकली की शूटिंग चलने लगी। निर्माता माखनलालजी को भारी घाटा हुआ। फ़िल्म बंद हो गई।
कमाल और मीना के निकाह की रसम एक काज़ी ने कराई। गवाह थी मीना की छोटी बहन मधु। निकाह के दस्तावेज़ पर दस्तख़त किए कमाल के दोस्त बाक़र ने और काज़ी के दो बेटों ने। दुल्हन का नाम था महज़बीन बानो (मीना का असली नाम)। दूल्हेन का नाम था सैयद अमीन हैदर। निकाह के बाद कमाल ने दुल्हन का माथा चूमा। कमाल अपने घर सायन चला गया और मीना व मधु घर आ गईं।
मीना की सहेली नादिरा ने कहा, मीना अपने पति की दीवानी है। उस की तारीफ़ करते नहीं थकती, उस की इज्जत करती है, उस से डरती है। वह कमाल को या तो चंदन कहती है या कमाल साहब और कमाल उसे मंजु कह कर पुकारता है।

मीना कुमारी और कमाल अमरोही
इन दोनों की शादी कई अच्छे बुरे दौरों से गुज़री। मैं सुचित्रा (माधुरी) का संपादक बन कर बंबई 1963 के सितंबर में आ गया था। हमारे पहले कवर पेज पर विराजमान थी मीना कुमारी।
5 मार्च 1964 की बात है। पिंजरे के पंछी फ़िल्म का महूरत था। मीना ने नवोदित गीतकार गुलज़ार को अपने मेकप रूम में बुलाया। कमाल के सहायक बाक़र अली का एक काम था मीना पर नज़र रखना। वह किस से मिलती है, कैसा बरताव करती है। मीना ने गुलज़ार को अपने कमरे में क्या बुलाया बाक़िर अली ने सब के सामने मीना के मुंह पर तमाचा जड़ दिया। पट पट आंसू बहाती, रोती, बिसूरती मीना ने खुलेआम कहा, कमाल साहब से कह देना आज मैं घर नहीं आऊंगी!” पिंजरे का पंछी उड़ गया था। उस के बाद वह अपने पाली नाका वाले घर कभी नहीं गई। कुछ दिन वह बहन महलिक़ा (मधु) के साथ बहनोई अभिनेता महमूद के घर रही। फिर जुहू पर जानकी कुटीर में घर बसा कर रही। महमूद के घर जा कर मीना को मनाने की कमाल की हर कोशिश नाकाम रही।
अपनी एक ग़ज़ल में मीना ने लिखा है: “दिल-सा साथी जब पायाबेचैनी भी साथ मिली!”
अपने चौंतीस साल के फ़िल्म कैरियर में कमाल ने कुछ गिनती की ही फ़िल्मों का निर्देशन किया – उन में से कुछ ही अच्छी हैं। कहना चाहिए बेहतरीन हैं –महल, दायरा, पाकीज़ा और रज़िया सुल्तान। मेरी निजी राय में रज़िया उसके पतन काल की द्योतक है। तो बचती हैं कुल तीन -महल, दायरा, पाकीज़ा। इनमें से प्रयोगवादी दायरा को निकाल दें तो भी महल और पाकीज़ा कमाल को हिंदी के सब से बड़े निर्देशकों में गिनने के लिए काफ़ी हैं। वह जो भी था, जितना भी था, जैसा भी था वह अपने आप में सिनेमा की हस्ती था। उसका और पाकीज़ा का रुतबा इतना बड़ा था कि जब हमारे दूरदर्शन ने अमृतसर से पाकिस्तान को मुख़ातिब चैनल लांच किया तो पाकीज़ा दिखाई थी। पाकिस्तान के दूर दराज़ के कराची जैसे शहरों से ठठ के ठठ लोग लाहौर आ गए। वहां की सड़कों पर हुजूम जमा थे। धक्कमधक्का हो रही थी – पर सब पाक़ीज़ा देख रहे थे – सड़कों पर लगे टीवी सैटों से।

अरविंद कुमार
महल के बाद किसी अन्य निर्माता के लिए उस के कोई फ़िल्म डायरेक्ट करने का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। पर वह सक्रिय था। मुग़ले आज़म के संवाद उसी ने लिखे थे। मेरा दिल आप का हिंदोस्तान नहीं है-जैसा वन-लाइनर कोई बिरला ही लिख सकता था।
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अगले रविवार – कमाल अमरोही के निर्देशन की तीन फ़िल्म महल, दायरा और पाकीज़ा।
सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

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