शोले के पीछे शोले... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

शोले के पीछे शोले...



-वीर विनोद छाबड़ा
उस दिन शायद चालीसवीं दफ़े देखी शोले। आज भी तरो-ताज़ा है, एक-एक शॉट और अंदाज़-ए-बयां, कुछ भी बासी नहीं है।
क्यों है ऐसा? कुछ भी तो बेवज़ह नहीं। स्पॉट बॉय से लेकर टॉप स्टार्स तक का टोटल इन्वॉल्वमेंट। बड़े से छोटे तक एक-दूसरे के लिए और फ़िल्म के लिए कुछ भी करने को तैयार दिखता है। वरना आमतौर पर शॉट ओके। पैक-अप। सब अपने अपने रस्ते। तू कौन और मैं कौन?  
तीन साल और तीन करोड़। 1972 से 1975 के दौरान की सबसे महंगी फ़िल्म। जन्म लेने के दिन से चर्चा में थी। फिर हम ठहरे पिक्चरबाज़। फ़िल्म को परदे पर देखते हुए परदे के पीछे की पढ़ी कहानी भी मिक्स-अप करते चलते हैं।
दो लाईन की कहानी। जेलर ठाकुर बलदेव सिंह के हाथ डाकू गब्बर सिंह ने काट दिए। बदला लेने के लिए उसने जय और वीरू नामक दो सज़ायाफ्ता गुंडों का सहारा लिया। सलीम-जावेद पहले 'खोया-पाया' फॉर्मूले में सिद्ध मनमोहन देसाई के पास गए। चाचा-भतीजा ने व्यस्तता के बहाने मना कर दिया। अच्छा ही हुआ। वरना वे 'खोया-पाया' फॉर्मूला घुसेड़ कर बेड़ा ग़र्क़ कर देते।


इतने से अफ़साने को सलीम-जावेद ने किस्सागोई के अंदाज़ में फ़साना बना कर रमेश सिप्पी को सुनाया। वो उछल पड़े। किरदार जुड़ने लगे। बसंती तांगेवालीचल धन्नो आज तेरी बसंती की इज़्ज़त का सवाल है। हिटलरनुमा जेलर असरानीहम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं। सांभापूरे पचास हज़ार। सिर्फ़ इतना बोलने के लिए उन्हें पच्चीस मरतबे बंबई से बंगलौर तक सफ़र का सफ़र तय करना पड़ा। जावेद को भोपाल प्रवास के दौरान सूरमा भोपाली नाम के एक फारेस्ट रेंजर से दिलचस्प मुलाक़ात याद आई। उसे उन्होंने परदे जगदीप के माध्यम से उतार दिया।  
सिर्फ़ नज़रों से बात करती ठाकुर की विधवा बहु राधा जो सिर्फ़ संध्या होते ही लालटेन जलाती नज़र आती है। कालिया, मौसी, तमाम किरदार जुड़ते गए। इन्हें गढ़ने को लेकर कई कहानियां गढ़ी गयीं, किस्सागोई हुई। सीन शूट हुए। और फिर इन सबको सिलसिले वार पिरो दिया गया।
ठाकुर बलदेव सिंह में प्राण साहब बिलकुल फिट बैठ रहे थे। लेकिन जाने क्या हुआ कि सीता-गीता में काम कर चुके संजीव कुमार जंच गए। यह आदमी हर किरदार चैलेंज की तरह स्वीकारता है। जान डाल देगा। वैसे सलीम-जावेद का कहना था कि ये किरदार लिखने वक़्त ज़हन में दिलीप कुमार थे। मगर वो तैयार नहीं हुए। सुना, कालांतर में दिलीप कुमार पछताए भी थे, हाय न क्यों की।  


इधर धरम गरम हो गए। ठाकुर का किरदार हम करेंगे। रमेश सिप्पी ने समझाया। क्या कर रहे हो? हेमा दूर हो जायेगी। संजीव तब बनेंगे वीरू। हेमा पर फ़िदा हैं संजीव। उन्हें करीब होने का मौका मिलेगा। भले वो 'सीता-गीता' के दौरान उनका प्रणय निवेदन ठुकरा चुकी है। मगर औरत तो औरत होती है। संजीव एक बार फिर हेमा के समक्ष निवेदन करें और वो पिघल जाए। इस आशंका के मद्देनज़र धरम घबरा गए। नतीजा वो नरम हो गए, वीरू का किरदार ही ठीक है। उन्होंने लाइटमैन को कुछ ले-देके फिट कर लिया। वो बार-बार लाईट गड़बड़ कर देता। शॉट दोबारा होता। धरम को हेमा के क़रीब आने का मौका बार बार मिलता।
जय का क़िरदार शत्रुघ्न सिन्हा के लिए रिज़र्व था। लेकिन अमिताभ बच्चन ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया। राधा में उनकी जया थी। वो भला उससे कैसे दूर रहते। शूटिंग शुरू होने से पहले दोनों की शादी भी हो गयी। तब बेटी श्वेता गर्भ में थी और जब शूटिंग ख़त्म हुई तो बेटा अभिषेक गर्भ में था।
फ़िरोज़ खान की 'धर्मात्मा' में व्यस्त न होते तो गब्बर के किरदार में डैनी दिखते। अमजद खान को ले आये सलीम-जावेद। पहली नज़र में रमेश सिप्पी को नहीं भाये। लेकिन सलीम-जावेद को इत्मीनान था। बाकी तो हिस्ट्री है। सिर्फ़ नौ सीन में दिखे गब्बर का ख़ौफ़ पूरी फ़िल्म पर छाया रहा.कितने आदमी थे.तेरा क्या होगा रे कालियाई हाथ हमका देय दो ठाकुरअरे सांबा कित्ता ईनाम रखे है सरकार हम पर.जो डर गया समझो मर गया.यहां से पचास कोस दूर गांव में बच्चा रोता है, तो मां कहती है, बेटे सो जा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जायेगाये रामगढ़ वाले अपनी बेटियों को कौन चक्की का पीसा आटा खिलाते हैं रे.क्या सोच कर आये थे, सरदार बहुत खुस होगा, साबासी देगा 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में शायद ऐसा पहली दफ़े हुआ कि डाकू ने बच्चे की हत्या की। यानी विलेन का किरदार इतना क्रूर लिखा गया कि उस पर लोग थूकें। मगर इसे क्रूर विडंबना ही कहेंगे कि इसका असर उल्टा हुआ। डाकू की इमेज समाज में महिमा-मंडित हो गयी। लोग बेतरह प्यार करने लगे। उसके संवादों की मिमक्री होने लगी। इसे कैश करने के लिए बाज़ार में संवादों के कैसेट उतारे गये।  
'शोले' पूरी होते ही इमर्जेंसी लागू हो गयी। खतरा मंडराने लगा। फ़िल्म परदे का मुंह देख पाएगी? इसमें तो हिंसा ही हिंसा है। निर्माता ने ज़मीन-आसमान एक कर डाला। कई सीन कटे, हिंसा का प्रभाव कम करने को। कुछ री-शूट हुए। गब्बर को ठाकुर के पैरों तले रौंदे जाने से ऐन पहले पुलिस लाई गयी। मगर एक सवाल अपनी जगह रहा और आज भी उठाया जाता है - बच्चे की हत्या हर दौर में क्रूर घटना मानी गयी है। उस दौर में सेंसर बोर्ड क्या कर रहा था?
बहरहाल, फ़िल्म रिलीज़ हुई।


लेकिन ट्रेन डकैती में फाईट सीन, घोड़े, रामगढ़, दोस्ती, गब्बर की एंट्री और क्रूर हंसी, पानी की टैंकी पर चढ़ा वीरू और मौसी, हेड-टेल, हेलेन का बैले, ढिश्क्यूं-ढिश्क्यूं, हेड-टेल, सूरमा भोपाली, धांसू डायलॉग...बसंती तेरा नाम क्या है... कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा...इन कुत्तों के सामने मत नाचना बसंती...चल धन्नो आज तेरी इज़्ज़त का सवाल है...ये आज इतना सन्नाटा क्यों है भाई.आदि बहुत कुछ ऐसा था जो भूलने वाला नहीं था यानी किवदंती बनने के पूरे गुण। मगर इतना सब कुछ होते हुए भी पहले अच्छा रिस्पांस नहीं मिला। खिड़की खुली है। आराम से टिकट ले लो। पहले दस दिन यही आलम रहा। क्रिटिक उबल पड़े - 'मेरा गांव मेरा देश' के पैरों से निकली सेकंड रेट नक़ल है.दूसरी 'खोटे सिक्केतमाम अंग्रेज़ी फ़िल्मों का कचरासमाज को हिंसा बर्दाश्त नहीवगैरह वगैरह।   
लेकिन माऊथ पब्लिसिटी ने गज़ब ढाया। दस दिन निकले नहीं कि ब्लैक में दस-बीस गुना ज्यादा रेट पर टिकट बिकने लगे। सर्वकालीन हिट का तमगा दे दिया गया। क्रिटिक के सुर बदल गए। शानदार। क्लासिक। कालजई। तीन करोड़ लगाये, तीन सौ.नहीं पांच सौ दे गयी।
लेखक 
लेकिन जब फिल्मफेयर ने ईनाम बांटे तो डंडी मार दी। सिर्फ एडिटिंग के लिए ईनाम दिया। तिस पर ट्रेजेडी देखिये। तीस बरस बाद 2005 में इसी फिल्मफेयर  अवार्ड चयन मंडल ने 'शोले' को पिछले पचास बरस की नंबर वन फिल्म घोषित किया। 'शोले' के साथ तो देर-सवेर इंसाफ हो गया, लेकिन 'मुगल-ए-आज़म' के साथ नहीं हुआ। इस शाहकार को सात श्रेणियों के लिए नामांकित किया गया मगर सिर्फ बेस्ट फिल्म, बेस्ट फोटोग्राफ़ी और बेस्ट डायलॉग से संतोष करना पड़ा।
शाहकार से प्रेरणा लेकर उससे बड़े शाहकार बनाये जाते हैं। नक़ल करने वाले औंधे मुंह गिरते हैं। राम गोपाल का यही हश्र हुआ। अमिताभ बाबू की मौजूदगी भी नहीं बचा पायी। गब्बर सिंह बन कर अपनी मट्टी पलीद करा बैठे।
(लेखक जाने माने फिल्म विशेषज्ञ हैं।)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad