“बंद आंखों से ऐसे काम करो कि आंख खुल जाए आंख वालों की” - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 19 जनवरी 2020

“बंद आंखों से ऐसे काम करो कि आंख खुल जाए आंख वालों की”

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–118

बंबई। दिसंबर 1969। चर्चगेट लोकल रेलवे स्टेशन के निकट आज़ाद मैदान में मेले के एक खंड में रंगमंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम में कुछ मित्र मुझे ले गए। लोकप्रिय फ़िल्म पत्रिका माधुरी के संपादक के रूप में मेरा परिचय कराया गया। सबकी निगाहें मेरी तरफ़ खिंच गईं। कुछ ही देर में मेरी निगाहों का आकर्षण बन गया एक गायक। बीसेक साल का नौजवान रवींद्र जैन - नेत्रहीन। उसने जो गाना शुरू किया तो रंगमंच से बाहर से भी लोग खिंचे खिंचे आने लगे। जादू था, माया थी, आकर्षण था- उसके खुले स्वर में। वाणी में घुला था आत्मविश्वास। उसने कई गीत गाए। एक था घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं...कभी इस पग में कभी उस पग में। मेरे मन में गूंजा एक शब्द – वाह! अपने जीवन का पहला और आख़िरी ऑटोग्राफ़ लेने से मैं अपने को रोक न पाया। जेब से काग़ज़ टुकड़ा निकाला और रवींद्र जैन से हस्ताक्षर कराए। खेद है कि सुबह वह काग़ज़ नहीं मिला।

रवींद्र जैन
उन दिनों रवींद्र जैन से संबंधित थे कलकत्ते के धनी मारवाड़ी कला प्रेमी मिठबोले राधेश्याम झुनझुनवाला। पता चला कि रवींद्र जैन उनकी छत्रछाया में था और उसकी गायकी के विकास में उनकी बड़ी भूमिका थी। उन्हीं के घर रह कर उसने पंडित जनार्दन शर्मा, नत्थूराम और पंडित जयचंद भट जैसे गुरुओं की देख रेख में संगीत साधना की। उल्लेखनीय है कि पंडित जयचंद भट की बेटी हेमलता बॉलीवुड की लोकप्रिय गायिका बनीं। हेमलता को इंट्रोड्यूस करने का श्रेय भी रवींद्र जैन को जाता है। कलकत्ते वाले गुरु पंडित जयचंद भट की बेटी होने के नाते रवींद्र उस पर अपना अधिकार समझता था और उसका संरक्षक बन गया था।
ऐसा आभास हो रहा था कि बंबई में रवींद्र की बिज़नेस के स्वामी झुनझुनवाला होंगे। रवींद्र कुलबुला रहा था। तनाव सा था माहौल में। उन्होंने एक फ़िल्म शुरू की लोरी, दो चार गीतों की रिकॉर्डिंग होते होते वह बंद हो गई।
उनसे मुक्त होने पर रवींद्र को फ़िल्म जगत और पत्रकारों से मिलवाने के लिए मैरीन ड्राइव पर नटराज होटल में पार्टी का निमंत्रण पत्र मेरे नाम से भेजा गया था। मुझे याद है उस पार्टी में नर्तक जोड़ी मनोहर दीपक और मधुमति बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। मनोहर कभी सितारा देवी के मंडल में थे। तो सितारा देवी भी मौजूद थीं, और मनोहर के कहने पर थोड़ा सा नाची भीं। उस पार्टी का समाचार कई पत्र पत्रिकाओं में छपा भी था।
जन्मांध रवींद्र का जन्म 28 फ़रवरी 1944 को अलीगढ़ में हुआ था। पिता इंद्रमणि संस्कृत भाषा के विद्वान थे। मां किरण घर संभालती थीं। सात भाइयों और एक बहन में वह तीसरा बच्चा था। मां बाप ने सोचा रवींद्र को भक्त सूरदास की तरह संगीत क्षेत्र में होना चाहिए। सही फ़ैसला लिया और हारमोनियम दिलवा दिया। जल्दी ही वह गाना बजाना सीख गया, मंदिरों में भजन गा-गा कर लोकप्रिय होने लगा। इधर-उधर से बुलावा आता, रवींद्र गाने बजाने जाता। ऐसे ही किसी कार्यक्रम में सुन कर मुग्ध हो रहे थे कलकत्ते के धनी मारवाड़ी राधेश्याम झुनझुनवाला। अंधे गायक की कमियां और क्षमताएं पहचानने में उन्हें देर न लगी। वे रवींद्र को अपने साथ कलकत्ते ले गए।
रवींद्र अपने को पहचानता था। विकलांगता ​पर विजय पाने का पक्का फ़ैसला कर लिया था उसने और एक कविता गुनगुनाता, “बंद आंखों से ऐसे काम करो आंख खुल जाए आंख वालों की।
राधेश्याम झुनझुनवाला की लोरी बंद हुई, तो उसके संगीत वाली एन.सी. सिप्पी की सिलसिला है प्यार का भी शुरू हो कर बंद हो गई। इस तरह सन् 1972 की कांच और हीरा उसकी पहली फ़िल्म सिद्ध हुई। तीनों गीत लिखे और संगीतबद्ध किए थे रवींद्र जैन ने। इसका नायक भी अंधा था। नज़र आती नहीं मंज़िल गीत नायक और गीत-संगीतकार की आंतरिक कशमकश का प्रतीक था। इसके लिए रवींद्र ने मोहम्मद रफ़ी के साथ गाने के लिए चंद्रानी मुखर्जी को ब्रेक दिया था। पूरा गीत इस प्रकार था: “नज़र आती नहीं मंज़िल, तड़पने से भी क्या हासिल/ तक़दीर में ऐ मेरे दिल, अंधेरे ही अंधेरे हैं/ मजबूरी ने जिसको मारा, उसका कौन सहारा/ मांझी तो मिल जाते हैं पर मिलता नहीं किनारा/ नैनों से यूं छिन गई ज्योति सीप से जैसे मोती/ एक जान और सौ दुश्मन हैं, काश ये जान न होती।
अगले साल 1973 की सौदागर ने उसे जमा दिया। ताड़ का रस चुआने वाले मोती (अमिताभ बच्चन), रस से ताड़गुड़ बनाने वाली मीजूबेन (नूतन) और सुंदरी फूलबानो (पद्मा खन्ना) की राजश्री प्रोडक्शंस निर्मित अजीब कहानी के अपने लिखे सभी गीतों को संगीत रवींद्र ने ही दिया था: हर हसीन चीज़ का तलबगार हूं मैं (किशोर कुमार) (दो संस्करण), तेरा मेरा साथ रहे (लता मंगेशकर), क्यों लाया सजन पान (आशा भोंसले), मैं हूं फूलबानो (लता मंगेशकर), दूर है किनारा (मन्ना डे), हुस्न है या कोई क़यामत (मोहम्मद रफ़ी) और सजना है मुझे साजन के लिए (आशा भोंसले) के बाद कोई उसे रोकने वाला नहीं था।

रवींद्र जैन और दिव्या की जोड़ी
सौदागर रवींद्र जैन के जीवन में प्रेम का उपहार भी लाई। उसकी रिलीज़ पर दिल्ली में गैट-टुगैदर में रवींद्र से मिलीं प्रसिद्ध लेखिका-प्राध्यापिका निर्मला जैन और उनकी बेटी दिव्या। दिव्या ने ठान लिया शादी करेगी तो रवींद्र से। दोनों की शादी हो कर ही रही। दोनों को आदर्श दंपती कहा जा सकता है। उनके बेटे का नाम है आयुष्मान जैन। आज भी पति की स्मृति के लिए बंबई के संगीत समाज में दिव्या सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
1973 की ही हाथी के दांत के दो गीत चल चल कहीं दूर - जहा एक नया संसार बस सके, जहाँ प्यार का दिया जल सके और मन का मेरे तन का सिंगार तुम्हीं हो प्रियतम अब मेरा सिंगार तुम्हीं हो तथा शतरंज के मोहरे के जा री हवा छेड़ तेरी मोहे नहीं भाए, जन्नत है देखनी तो किसी दिल में बना आशियां, चलती को हवा कहते हैं और लोग तो लूटें अंधेरे में हम उजाले में बहुत पसंद किए गए, जबकि दोनों फ़िल्म बाक्स ऑफ़िस पर फ़ेल रहीँ।
1975 में वह राज कपूर और राजेंद्र कुमार की दो जासूस तक पहुंच गया। नरेश कुमार द्वारा निर्मित-निर्देशित फ़िल्म में गीत संगीतकार रवींद्र जैन के साथ हसरत जयपुरी ने लिखे थे। दो जासूस गाने में दोनों की लिखी कुछ पंक्तियां थीं:
दो जासूस करें महसूस दुनिया बड़ी ख़राब है, कौन है सच्चा, कौन है झूठा हर चेहरे पे नक़ाब है
प्यास लगे तो दूध पियो दूध में पानी मिलता है/ मंदिर में भी आज दिया नक़ली घी का मिलता है
ज़हर दवा में शामिल है /ज़हर दवा से बेहतर है/ ज़हर भी नक़ली मिलता है, मरना भी अब दूभर है।
चोर मचाए शोर नाम से दो फ़िल्म बनी हैं। रवींद्र जैन वाली थी 1974 की एन.एन. सिप्पी द्वारा निर्मित और अशोक राय द्वारा निर्देशित शशि कपूर, मुमताज़, डैनी डैनज़ोंग्पा के साथ असरानी वाली सुपर हिट फ़िल्म। इस में छह गीत थे रवींद्र जैन के और दो इंद्रजीत सिंह तुलसी के।रवींद्र जैन का पुराना प्यारा गीत घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं तो इस में था ही पांव में डोरी, डोरी में घुंघरू, आगरे से घुंघरू मंगा दे रसिया और ये मेरा जादू थे, तोइंद्रजीत सिंह तुलसी के एक डाल पर तोता बोले एक डाल पर मैना था और सब से मशहूर गीत ले जायंगे दिल वाले दुल्हनियाँ ले जायंगे। कई कई साल बाद यश चोपड़ा की एक फ़िल्म का तो नाम ही थादिल वाले दुल्हनियाँ ले जायंगे!’
इस की लोकप्रियता से उत्साहित हो कर एन.एन. सिप्पी ने बनाई 1976 की फ़कीरा’ - दो जुड़वाँ भाइयों के बिछड़ने और मिलने की कहानी। इस बार निर्देशन कराया सी.पी. दीक्षित से। मुख्य कलाकार थे शशि कपूर, शबाना आज़मी, असरानी, अरुणा ईरानी, डैनी डैनज़ोंग्पा।इस ने सफलता के कई झंडे गाड़ दिए। तेलुगु में इस का रीमेक हुआ। गीतकार-संगीतकार रवींद्र जैन के सभी गीत लोकप्रिय हुए:
दिल में तुझे बिठा के कर लूंगी आँखें (लतामंगेशकर),
फ़कीरा चल चला चल (महेंद्र कपूर),
तोता मैना की कहानी तो पुरानी हो गई(लता मंगेशकर और किशोर कुमार),
अकेले चल रे हो फ़कीरा चल रे (हेमलता),
आधी सच्ची आधी झूठी तेरी प्रेम कहानी (लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी),
हम तो झुक कर सलाम करते हैं (महेंद्र कपूर, किशोर कुमार. अज़ीज़ नाज़ाँ),और
ये मेरा जादू चोर हो के साधु (आशा भोंसले)।
-सन 1975 उस के लिए चमत्कारों से भरा था। एक के बाद म्यूज़िकल हिट! रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी अतिथि पर आधारित राजश्री प्रोडक्शंस की हीरेन नाग द्वारा निर्देशित नवयुवा शचिन की गीत गाता चल सुपर हिटहुई। इस में नायक को जूझना पड़ता है कुछ मूल प्रश्नों से – प्रसन्नता क्या है, स्वतंत्रता क्या है, क्या है प्रेम बंधन?
फोटो
सादी सी कहानी थी। जहाँ जाता है श्याम गीत गाता है। वह आज़ाद पंछी है,यहां वहां गीत गाता चलता रहता है। कोई घर नहीं है, किसी से लगाव नहीं है। कोई चिंता नहीं है। कोई साथी है तो बांसुरी है। लोग उसे चाहने लगते हैं, वह निर्विकार रहता है। एक बार नौटंकी की बाई को दीदी कहा, वह उस पर निछावर हो गई। एक परिवार ने उसे अपने घर रख लिया। उस की बेटी राधा से दोस्ती बढ़ती गई। परिवार वालों ने दोनों की शादी की बात की तो उसे लगा वह पिंजरे का पंछी बन जाएगा। वह वहाँ से चल दिया। नौटंकी वाली दीदी को सब कुछ बताया, कहा वह कहीं बंधना नहीं चाहता। दीदी ने समझाया तो वह लौट आया। राधा का हाथ थाम लिया। यहाँ फ़िल्म समाप्त होती है – यह बात साफ़ नहीं होती कि श्याम सांसारिक बंधनों में बंधना चाहता है या यह राधा के सच्चे प्रेम की अस्थायी स्वीकृति है।
फ़िल्म के सभी गीत संगीतकार रवींद्र जैन ने लिखे थे:
गीत गाता चल ओ साथी (जसपाल सिंह)
श्याम तेरी बंसी पुकारेराधा नाम(जसपाल सिंह और आरती मुखर्जी)
बचपन हर ग़म से बेगाना होता है (किशोर कुमार)
कर गया कान्हा (आरती मुखर्जी)
मैं वो ही दर्पण वो ही(आरती मुखर्जी)
श्याम अभिमानी (मोहम्मद रफ़ी आशा भोंसले)
धरती मेरी माता(जसपाल सिंह)
मंगल भवन अमंगल हारी(जसपाल सिंह)
चौपाइयाँ रामायण(जसपाल सिंह)
मोहे छोटा मिला भरतार(जसपाल सिंह हेमलता चेतन)
गीत गाता चल में रवींद्र ने जसपाल सिंह को ब्रेक दिया था। मुझे याद आ रही हैं दोएक घटनाएं। टाइम्स आफ़ इंडिया के परसोनल मैनेजर श्री वी. जी. कर्णिक चाहते थे कि मैं उन के गायन के शौक़ीन बेटे को फ़िल्मों मॆं गाने का चांस दिलवाऊँ। उस ले कर मैं रवींद्र जैन की कार्यशाला मॆं गया। तब जसपाल भी अपनी आवाज़ सुनाने आया था। जसपाल को सुन कर कर्णिक के बेटे की समझ में आ गया कि वह फ़िल्मी गायकों के पासंग बराबर नहीं है, अपनी आवाज़ सुनाए बिना लौट आया।
ऐसा ही एक संस्मरण मेरे बेटे सुमित का है। मैंने देखा कि फ़िल्मों में साजिंदों का बहुत महत्व होता है। सोचा क्यों न सुमित को तबलची बनवाया जाए। ले गया रवींद्र के पास। उसकी देखरेख में तबला सीखने के लिए। तबला जोड़ी मैंने रवींद्र की पसंद की ख़रीदी। कुछ दिन सुमित गया भी सीखने। पर उस का मन उचट गया। वह तबला जोड़ी लगभग दस साल पहले मैं ने एक संगीत विद्यालय को दान कर दी।

रवींद्र जैन के पांव छूकर आशीर्वाद लेती अभिनेत्री रेखा

राजश्री प्रोडक्शंस के लिए रवींद्र जैन के संगीत मॆं हिट फ़िल्मों का सिलसिला चल रहा था। शायद आप को याद हो भाभी की उंगली में हीरे का छल्ला और उस की लाइन भैया मक्खन हैं भाभी मलाई। यह तथा अन्य गीत लिखे थे हशमत ने राजश्री की अनिल गांगुली निर्देशित तपस्या में। यह गाया था हेमलता और चंद्राणी मुखर्जी ने। इसी में किशोर कुमार ने गाया था जो राह चुनी तुम ने
1976 की दीवानगी के निर्माता थे सुबोध मुखर्जी, निर्देशक समीर गांगुली, मुख्य कलाकार थे शशि कपूर और ज़ीनत अमान। संगीतकारदादा शचिन देव बर्मन। रवींद्र जैन के लिए वह संगीत के भगवान थे। दुर्भाग्य से एक गीत चल सपनों के शहर मेंरिकार्ड करवा के दादा का देहांत हो गया। अब लाया गया उन्हीं की शैली में शेष गीतों को संगीत देने के लिए रवींद्र को। उस के लिए यह परीक्षा की घड़ी थी। वह सफल भी हुआ:
-पूजा की विधि ना जानूँ, ना जानूँ महाराज, मैं तज के सब संसार तेरे चरणों मे आई आज (लता मंगेशकर और रवींद्र जैन)
-हसीनों के चक्कर में पड़ना नहीं, बेवफ़ाओं की ख़ातिर बिगड़ना नहीँ (अमित कुमार, किशोर कुमार और रवींद्र जैन)
-मेरी जवानी करे इशारे, तुझे बुलाए तुझे बुलाए (आशा भोंसले और रवींद्र जैन)
-प्यार जब तेरा मेरा हुआ, ज़माना मुँह देखता रह गया, ओ, जल के हाथों को मलता रहा (किशोर कुमार, लता मंगेशकर और रवींद्र जैन)
-वोह भी मुझ से करने लगा है ज़रा ज़रा सा प्यार, उन का दिल भी रहने लगा है थोड़ा थोड़ा बेक़रार (आशा भोंसले और रवींद्र जैन)
और 1976 की ही राजश्री के लिए बासु चटर्जी निर्देशित चितचोर के संगीत के ज़रिए रवींद्र जैन ने सब का चित चुरा लिया। छोटे से गाँव माधोपुर में स्कूल के हैड मास्टर की बेटी गीता (ज़रीना वहाब) और गाँव के पास ही बन रहे डैम के कर्मचारी विनोद (अमोल पालेकर) की प्रेम कहानी। विनोद है शास्त्रीय संगीत का प्रेमी। फ़िल्म में कुल मिला कर चार गीत थे। एक से बढ़ कर एक मधुर गीत। जैसे –
-गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा(येसुदास)
-तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले(येसुदास हेमलता)
-जब दीप जले जब शाम ढले आना (येसुदास हेमलता)
-आज से पहले, आज से ज़्यादाखुशी आज तक नहीं मिली(येसुदास)
मुझे बेहद अच्छी लगी थी सन 1978 की दिल को छू जाने और आँखों में आँसू लाने वालीअँखियों के झरोखे से। राजश्री प्रोडक्शंस के लिए हीरेन नाग के निर्देशन में रवींद्र जैन के गीत भी फ़िल्म की अपार सफलता का कारण थे। धनी परिवार के होनहार और आत्ममहिमा से मंडित बेटे अरुण (शचिन) को परीक्षा में निर्धन नर्स की बेटी लिली फ़रनांडेस (रंजीता) के मुक़ाबले दूसरे नंबर पर आना अपमानजनक लगा। वह उस से बदला लेने के लिए तमाम हरक़तें करता है, पर लिली जवाब नहीं देती। धीरे धीरे दोनों एक दूसरे को पसंद आने लगी। दोनों की शादी तय हो गई। ल्यूकीमिया (श्वेतरक्तता) नाम का कैंसर हो जाता है। वह अरुण के हाथों में प्राण त्यागती है।
हेमलता का गाया अखियों के झरोखों से मैं ने देखा जो साँवरे - तुम दूर नज़र आये, बड़ी दूर नज़र आये - बंद कर के झरोखों को ज़रा बैठी जो सोचने - मन में तुम ही मुस्काए, मन में तुम ही मुस्काएआज भी सुनता हूँ तो आँखें नम हो जाती हैं।
इसी में हेमलता और शैलेंद्र का गाया हिंदी इंग्लिश लाइनों वाला गीत बिल्कुल अनोखा था:एक दिन, तुम बहुत बड़े बनोगे एक दिन - चाँद से चमक उठोगे एक दिन - will you forget me then?’ - How I can, tell me how I can?’
या हेमलता और शैलेंद्र का ही: ‘कई दिन से मुझे कोई सपनों में, आवाज़ देता था - हर पल बुलाता था - अच्छा तो वो तुम हो, तुम हो, तुम हो…’
फ़िल्म की सफलता में दोहावली ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी। पहला दोहा रहीम का था: ‘बड़े बड़ाई न करें बड़े न बोले बोल - हीरा मुख से न कहे लाख टका मेरा मोल।
सन 1978 की पति पत्नी और वोह में रवींद्र जैन पहली बार बी. आर. चोपड़ा के साथ आए। मुख्य कलाकार थे संजीव कुमार, विद्या सिन्हा और अँखियों के झरोखे से वाली रंजीता। गीतकार थे आनंद बख़्शी। इस का गीत ठंडे ठंडे पानी से नहाना चाहिए – गाना आए या ना आए गाना चाहिए सदाबहार है।
बी. आर. चोपड़ा की इनसाफ़ का तराज़ू में गीत साहिर लुधियानवी के थे और इस के तीन गीतों को संगीतबद्ध किया थारवींद्र जैन ने। इस का गीत लोग औरत को फ़क़त एक जिस्म समझ लेते हैं - रूह भी होती है उसमें ये कहाँ सोचते हैंरवींद्र जैन को प्रिय था।
राज कपूर की 1988 की राम तेरी गंगा मैली हो गई और 1991 की हिना का संगीत रवींद्र जैन का था।


राम तेरी गंगा मैली हो गई के लिए रवींद्र जैन को फ़िल्मफ़ेअर का श्रेष्ठ संगीत का अवार्ड भी मिला था। इस में एक गीत सुन साहबा सुन प्यार की धुन हसरत जयपुरी का था और एक मैं ही मैं हूँ अमर क़ज़लबाश का था। बाक़ी सभी गीत एक दुखियारी कहे,एक राधा एक मीरा, हुस्न पहाड़ों का, राम तेरी गंगा मैली हो गई (1), राम तेरी गंगा मैली हो गई (2), ‘‘तुझे बुलाए ये मेरी बहन, यारा ओ यारालिखे थे स्वयंरवींद्र जैन ने।
हिना के नौ के नौ गीत रवींद्र जैन ही लिखे थे और सब एक दूसरे से अलग तरह के थे:
बेदर्दी तेरे प्यार ने, वश मल्ले, अनारदाना, मरहबा सैयदी, मैं हूँ ख़ुशरंग हिना, मैं देर करता नहीं, चिट्ठिये नी दर्द फ़िराक़ वल्लिये, देर ना हो जाए कहीं, जाने वाले ओ जाने वाले
सन 2006 की विवाह राजश्री के साथ रवींद्र जैन की सातवीं फ़िल्म थी। कहानी और निर्देशन था सूरज बड़जात्या का। मुख्य कलाकार थे शाहिद कपूर और अमृता राव।आठों गीतरवींद्र जैन ने लिखे थे:
मुझे हक़ है, दो अनजाने अजनबी, मिलन भी आधा अधूरा, हमारी शादी में, ओ जीजी, तेरे द्वारे पे आई बारात, राधे कृष्ण की जोड़ी (सवैया), कल जिस ने जनम यहाँ पाया
इस सब से जुदा था उस काटीवी पर सीरियलों के लिए संगीत।
25 जनवरी 1987 से दूरदर्शन पर रामानंद सागर के सीरियल रामायण का शुभारंभ हुआ। हिंदी भाषी भारत में हर रविवार सुबह ग्यारह बजे लोगबाग अपनी जान पहचान वालों के घरों में या सड़क पर रामायण देखने जमा हो जाते। सारे कामकाज मुल्तवी हो जाते। गूँजने लगते सीरियल के मधुर स्वर हम कथा सुनाते राम सकल-गुणग्राम की।
पहली क़िस्त शुरू हुई राम दरबार में महर्षि वाल्मीकि के शिष्य लव कुश के आगमन के दृश्य पर  मंगलाचरण ​से:
ओम श्रीगणेशायऋद्धि-सिद्धिसहितायनमः
ओमसत्यम्शिवम्सुंदरम्शिवानीसहितायनमः
पितृमातृ नमः पूज्यगुरुवरनमः
राजागुरुजनप्रजासर्वेसादरनमः
वीणावादिनीशारदेरखोहमाराध्यान
सम्यक्वाणीशुद्धकरहम कोकरोप्रदान
सबकोविनयप्रणामकरसब सेअनुमतिमांग
लवकुशनेछेड़ासरसरामकथाकाराग:
हमकथासुनातेरामसकल-गुणग्रामकी
हमकथासुनातेरामसकल-गुणग्रामकी
रामायण की अंतिम क़िस्त 31 जुलाई 1988 को देखी गई थी।
रामानंद सागर द्वारा स्थापित सागर फ़िल्म्स प्रा.लि. से रवींद्र जैन का संबंध इक्कीसवीं सदी के पहले दशक तक चलता रहा। मतलब उन्होंने अलिफ़ लैला, श्रीकृष्ण, इतिहास की प्रेम कहानियाँ, जय गंगा मैयास जय महालक्ष्मी, श्री ब्रह्मा विष्णु महेश, साईं बाबा, और जय माँ दुर्गा सीरियलों को भी संगीत दिया।

अरविंद कुमार
-और अंत में: बहुत कम लोग जानते हैं कि कभी रवींद्र जैन कि सुभाष घई की 1976 की शत्रुघ्न सिन्हा वाली कालीकालीचरण में संगीतकारकल्याणजी आनंदजी के लिए दो गीत रवींद्र जैन ने लिखे थे। मुझे उस का यह गीत इतना पसंद है कि पूरा उद्धृत कर रहा हूं :
क्यों चलती है पवन
क्यों झूमे है गगन
क्यों मचलता है मन
ना तुम जानो ना हम
क्यों आती है बहार
क्यों लुटता है क़रार
क्यों होता है प्यार
ना तुम जानो ना हम
ये मदहोशियाँ ये तन्हाइयाँ
तसव्वुर में हैं किसकी परछाइयां
ये भीगा समां उमंगें जवां
मुझे इश्क़ ले जा रहा है कहाँ
क्यों ग़ुम है हर दिशा
क्यों होता है नशा
क्यों आता है मज़ा
ना तुम जानो ना हम
धडकता भी है तड़पता भी है
ये दिल क्यों अचानक बहकता भी है
महकता भी है चहकता भी है
ये दिल क्या वफ़ा को समझता भी है
क्यों मिलती है नज़र।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ीअगले रविवार
संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

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