पढ़ते रहिये ओ सिनेमा के यार...अभी बाकी है मीना कुमारी के किस्से हजार...भाग-दो - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 23 फ़रवरी 2020

पढ़ते रहिये ओ सिनेमा के यार...अभी बाकी है मीना कुमारी के किस्से हजार...भाग-दो


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–123

पाकीजा में मीना कुमारी

पिछले भाग में आपने पढ़ा:
परिणीता देखकर मेरे जीवन की पहली और आख़री फ़ैन मेल!
5 मार्च 1964. पिंजरे के पंछी फ़िल्म का महूरत पर बाक़र अली से तमाचा खाकर मीना कुमारी का पति कमाल अमरोही के घर न जाना...
महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी हेमसुंदरी ठाकुर का बाल विधवा होकर मेरठ जाना, ईसाई बन कर पत्रकार प्यारेलाल शंकरी मेरठी से शादी कर लेना – उनकी दूसरी बेटी) बंबई में नाटकों मेँ काम करने वाली प्रभावती (इक़बाल बेगम) की बेटी महज़बीं का जन्म होना
विजय भट्ट की ग्यारहवीं और भारत भूषण की पंद्रहवीं फ़िल्म बैजू बावरा ने मीना कुमारी को स्टार बना दिया
ख़्वाजा अहमद अब्बास की 1959 की चार दिल चार राहें में मीना कुमारी का काली कलूटी चावली बनना
नायक प्राण की फ़िल्म हलाकू में मीना कुमारी का विद्रोहिणी नीलोफ़र बनना
चिराग़ कहाँ रोशनी कहाँ में मीना कुमारी का कुँवारी माँ बनना
डेज़ी ईरानी की पहली फ़िल्म बंदिश में अशोक कुमार की प्रेमिका बनना और डेज़ी का कहना, अपनी मां से मुझे उतना प्यार कभी नहीं मिला जितना मीना कुमारी ने मुझे दिया
बी.आर. चोपड़ा ने बनाई पंडित मुखराम शर्मा की एक ही रास्ता-अजब असमंजस की कहानी। संदेश था विधवा विवाह।
अब आगे

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हलाकू (1956)
ईरान में कहीं अब्बा हकीम नादिर को परवेज़ पसंद नहीं है नीलोफ़र (मीना कुमारी) और परवेज़ (अजित) का रोमांस। एक लंबे सफ़र से लौटे, तो क़हवाख़ाने में बेटी के क़िस्से सुने। शुरूआती विरोध के बाद हकीम साहब ने परवेज़ को शादी के लिए ज़ेवरात ख़रीदने दूर शहर भेज दिया। तभी चंगेज़ ख़ाँ के पोते शक्तिशाली सुलतान हलाकू के बहादुर मंगोल बढ़ते चले आ रहे हैं। हकीम साहब मारे जाते हैं, नीलोफ़र पकड़ी गई, बेची जा रही है, परवेज़ ने ख़रीद ली, पर हलाकू के लिए सैनिकों ने हथिया ली। हलाकू उसे बेगम बनाना चाहता है, पहली बेगम को यह पसंद नहीं। अब परवेज़ और नीलोफ़र की जंग है हलाकू के ख़िलाफ़। नीलोफ़र बार बार उस की हत्या करना चाहती है, परवेज़ हलाकू के ख़िलाफ़ जंग कर रहा है। उन के प्रेम को देखते हुए हलाकू दोनों को माफ़ कर देता है। पहली बेगम का कहा मान कर ईरान को आज़ाद करके वापस चला जाता है।
हलाकू के लिए प्राण ने चेहरे को मंगोल बनाया और डायलौग डिलीवरी की ख़ास अदा विकसित की थी, तो आश्चर्य नहीं कि यह उस की दिलपसंद फ़िल्म रही। अकेली हलाकू के लिए ही नहीं, प्राण अपनी हर फ़िल्म की ज़रूरत के लिए एक नया अंदाज़ और नया लहज़ा ईजाद करता था।

दिल अपना और प्रीत पराई 1960
अजीब दास्ताँ है येवाली फ़िल्म दिल अपना और प्रीत पराई सचमुच विलक्षण थी। द हिंदू समाचार पत्र में लिखा गया था,“यह किशोर साहू की बाईस निर्देशित कृतियों में सर्वाधिक भावुक थी। बनाई थी महल मूवीज़ बैनर के अंतर्गत कमाल अमरोही ने। इस में सब से प्रभावशाली थी मीना कुमारी - आरंभ से अंत तक। मल्होत्रा अस्पताल में रैज़िडैंट सर्जन है सुशील (राज कुमार)। नई नई नर्स है करुणा (मीना कुमारी)। पहले ही दिन ऑपरेशन थिएटर में दोनों में प्यार हो जाता है। सागर तट पर घायल लड़की को देख करुणा उसे उस के घर तक ले गई। लड़की डॉक्टर सुशील की बहन थी। करुणा की करुण दास्तान सुन कर डाक्टर की माँ का दिल भर आया। अब करुणा और डाक्टर सुशील घर पर और अस्पताल में क़रीब और क़रीब आते गए। अस्पताल में रोगियों से सहृदय बरताव से करुणा सब की चहेती बन गई। माँ को पता नहीं था बेटे का करुणा के प्रति लगाव। उस ने परिवार के कश्मीरनिवासी हितैषी की बददिमाग़ बेटी कुसुम (नादिरा) से बेटे की शादी करवा दी।
फ़िल्म को प्रबल भावुकता मिलती है संगीतकार शंकर जयकिशन के लिए लिखे गए शैलेंद्र के पांच और हसरत जयपुरी के दो गीतों से। उन में भी शैलेंद्र लिखित लता मंगेशकर की आवाज़ में अजीब दास्ताँ है ये
इस का वर्णन शैलेंद्र के निर्देशक बेटे दिनेश ने इस प्रकार किया है:
फ़िल्म निर्देशन है ही क्या! बस परदे पर कहानी दिखाना। पर ऐसा है नहीं। निर्देशक का दायित्व मूलतः सामाजिक है। वह दर्शकों के प्रति जवाबदेह है। दर्शकों के दिल तक पहुँच कर ही वह सफल हो सकता है।
दिल अपना और प्रीत पराई कहानी है एक आदमी और एक औरत की प्रेम कहानी... और कुछ बाध्यता के कारण आदमी के किसी और से शादी हो जाने की। शादी का जश्न मनाया जा रहा है नाव पर... आदमी की प्रेमिका करुणा को कुछ गाने को मज़बूर किया जाता है। वह गाती है... सिचुएशन पेचीदा है। गीत ख़ुशी का होना चाहिए, लेकिन प्रेमी के दिल तक पहुँचना चाहिए।
शैलेंद्र ने एक एक शब्द, हर पंक्ति बड़े ध्यान से चुनी। गीत गाया लता जी ने। दर्शकों के दिलों को छूता गीत बहुप्रशंसित और कई अवार्ड जीतता रहा। किशोर साहू ने शूटिंग में कोई कलाबाज़ी नहीं की। बस मीना कुमारी और राज कुमार के भावों को पकड़ा और परिपूर्णता तक पहुँचा दिया।
गीत के परिचय के तौर पर कोरस में हवाई द्वीप की गिटार और अकौर्डियन और, हाँ, वायलिन
अजीब दास्ताँ है ये/ कहाँ शुरू कहाँ ख़तम
ये मंज़िलें हैं कौन सी/ ना वो समझ सके ना हम
मुखड़े के बाद अंतराल में शोकपूर्ण ट्रंपट, कोरस, अकौर्डियन और गिटार
यह रोशनी के साथ क्यों/ धुआ उठा चिराग़ सा
यह ख़्वाब देखती हूँ मैं/ के जग पड़ी हूं ख़्वाब से
मुबारकें तुम्हें कि तुम/ किसी के हो गए
किसी के इतने पास हो/ कि सब से दूर हो गए
किसी का प्यार ले के तुम/ नया जहाँ बसाओऽगे
यह शाम जब भी आएगी/तुम हम को याद आओगे
मीना कुमारी की आँखें नम हैं, पर रो नहीं रहीं... राज कुमार मुस्कराता है पर जानता है शब्दों के पीछे क्या है. नादिरा और बाक़ी सब बेख़बर है। सोचिए यह रोशनी के साथ क्यों दिया उठा चिराग़ से का मतलब!”

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साहब बीबी और ग़ुलाम 1962
छोटे बाबू (रहमान) और छोटी बहू (मीना कुमारी): साहब बीबी और ग़ुलाम का पारिभाषिक चित्र
रहमान और मीना कुमारी
रईसों का जीवन अपना हर शौक़ पूरा करने का था। उदाहरण के तौर पर मँझले बाबू अपनी प्यारी बिल्ली के विवाह में दस हज़ार रुपए उड़ा देने में हाथ पीछे नहीं खींची। बिल्ली के साथ थे उन के प्यारे कबूतर, शाम को नाच रंग।
छोटे बाबू भी कुछ पीछे नहीं थे। सरेशाम घर से निकलते तो तवायफ़ों के कोठे पर रात गुज़ार कर पौ फटे घर लौटते। नशे में धुत। छोटी बहू रात भर उन की राह देखती, दुखड़ा गाती रहती। भूतनाथ उन का एकाकी ग़मभरा दूर से देखता रहता।
छोटी बहू पति को लुभाने की तरक़ीबें तलाशती रहती। अख़बार में उस की नज़र पड़ी मोहिनी सिंदूर के विज्ञापन पर। दावा किया गया था कि यह सिंदूर लगाने से बिछड़े प्रीतम वापस मिल जाते हैं। छोटी बहू को मालूम हुआ कि भूतनाथ उसी कंपनी में काम करता है। बस, यह जादुई सिंदूर मँगाने के लिए छोटी बहू ने भेजा अपने भरोसेमंद चाकर बंसी (धूमल) को भूतनाथ के पास। किसी परपुरुष का किसी बहू के कक्ष में पाया जाना भयानक अपराध माना जाता था। इसलिए बंसी भूतनाथ को चोरी छिपे ले गया उन के पास।
छोटी बहू के सौदर्य से पराभूत भूतनाथ के मुँह से बोल ही नहीं निकल रहा था। उस की हिचक मिटाने के लिए छोटी बहू ने बात शुरू की उस की कंपनी के बारे में, वहाँ के लोगोँ के बारे में। अब तो भूतनाथ ने जवा के बारे में और उस के प्रति अपने आकर्षण के बारे में एक साँस में सब कुछ बता डाला। अब छोटी बहू ने सिंदूर के बारे में पूछा:“कुछ काम का है या नहीं?” भूतनाथ ने कहा था कि असरदार है।
अगली शाम सिंदूर पहुंचाने वह गया छोटी बहू के पास। अब क्या था! सारा दिन छोटी बहू ने बिताया सिंगारपट्टी में। गाती रही पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे। उसे भरोसा था कि सिंदूर का असर होगा, होगा। बंसी से संदेश भिजवाया छोटे बाबू के पास कि बहूरानी बीमार हैं। शायद इस बहाने वे उसे देखने आ जाएँ। पर वे कुछ कम नहीं थे। औरतों की बीमारी से विचलित होना मर्दों का काम नहीं था। नहीं आना था, नहीं आए।
आख़िर एक दिन छोटी बहू ने विनती कर ही दी मैं क्या करूँ आप को ख़ुश करने के लिए?” छोटे बाबू ने चुनौती फेंकी,“तुम वह सब करोगी जो तवायफ़ करती हैं गाओगी, नाचोगी, पियोगी?”
...
जाने से पहले वह छोटी बहू से भी विदा लेने गया था। वह पूरी पियक्कड़ हो चुकी थीं। उन के हाथ से बोतल छीनने की कोशिश में उस का हाथ उन के हाथ से छू गया तो वे नाराज़ हो गई थीं। ऐसा अभद्र व्यवहार! उसे फिर कभी उन के पास न आने का आदेश दिया था। जाते जाते भूतनाथ को बड़ी शान से बताया था कि अब पति से उनका मिलाप संपूर्ण हो गया है।
... वक़्त बीत रहा था। कोई दोएक साल बाद मुंगेर से लौटा भूतनाथ। चौधरी परिवार के पैसा धेला कुछ नहीं बचा था। हवेली ख़स्ताहाल थी। छोटे बाबू फ़ालिज़ के मारे बिस्तर में पड़े थे। छोटी बहू नशे में रहती थी। अब छोटे बाबू समझा उन का नशा छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे। छोटी बहू ने सुन रखा है कि नदी किनारे कोई चमत्कारी संत पघारे हैं। हर रोग के इलाज की औषध देते हैं। भूतनाथ मिला तो बहूरानी ने विनती की कि उन महात्मा के पास ले चले।

गुरुदत्त और वहीदा रहमान

परंपरावादी चौधरी परिवार की बहूओं का परपुरुष के साथ जाना भ्रष्ट और अक्षम्य अपराध था। मँझले बाबू ने देखा छोटी बहू किसी के साथ बग्घी में जा रही है। उनके पहलवान चारक जल्दी ही वे बग्घी के पास पहुंच गए। भूतनाथ की इतनी पिटाई हुई कि उस की आँखें खुली अस्पताल में। छोटी बहू कहाँ गई किसी को पता नहीं था। भूतनाथ को होश आया तो बंसी ने बताया छोटी बहू के विलुप्त होने के बाद छोटे बाबू भी जाते रहे थे। कौड़ी कौड़ी के मोहताज मँझले बाबू हवेली छोड़ कर कहीं चले गए थे। इस सर्वनाश के साथ समाप्त होता है फ़्लैश बैक।
अब-
हवेली तोड़ी जा रही है। खंडहर के नीचे खोदते खोदते मज़दूरों को मिली छिपी क़ब्र। भूतनाथ को बुलाया गया। क़ब्र में बची हैं कुछ हड्डियाँ। एक हाथ में वही कड़ा है जो अंतिम दिन छोटी बहू ने पहना था। दुखी मन से वह अपनी बग्घी से घर पहुँचता है। घर में पत्नी जवा और बच्चे हैं। स्पष्ट है कि भूतनाथ वही अज्ञात बच्चा था जिस से एक साल की जवा का विवाह हुआ था।

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पाकीज़ा
[बारहबानी सोना थी बड़े बड़े सैटों वाली भावप्रवणपाकीज़ा’]

मीना कुमारी और कमाल अमरोही

 तवायफ़ कहो या वेश्या - हिन्दी फ़िल्मों में आकर्षण का विषय रही हैं। देवदास की चंद्रमुखी (बरुआ की चंद्रवती, बिमल राय की वैजयंती माला, संजय लीला भंसाली की माधुरी दीक्षित), सोहराब मोदी की मिर्ज़ा गालिब की मोती बेगम (चौदहवीं) सुरैया, केदार शर्मा की पुरानी चित्रलेखा की महताब और नई की मीना कुमारी, लेख टंडन की आम्रपाली की वैजयंती माला, शक्ति सामंत के अमर प्रेम की पुष्पा शर्मीला टैगोर, मुज़फ़्फ़र अली की उमराव जानकी रेखा और जे.पी. दत्ता की उमराव जान ऐशवर्या बच्चन से बिल्कुल अलग हैं - कमाल अमरोही की पाकीज़ा की माँ नरगिस (मीना कुमारी) और बेटी साहिबजान (मीना कुमारी)।
कहानी किसी भी फ़िल्म की बुनियाद होती है। ऊपर गिनाई गई फ़िल्मों की भी है। लेकिन असली परख होती है उस बुनियाद पर खड़ी इमारत से, उस के मूड से। फ़िल्म की माउंटिंग, सैटिंग से जिसे इंग्लिश में Mis-en-scene (मिज़-आँ-सीन) कहते हैं। उस के रंगढंग, टोन, आवाज़, संगीत, वेशभूषा, कैमरा वर्ग, प्रकाश व्यवस्था से।
कुछ है जो पाकीज़ा के मूड को दीगर हिंदी फ़िल्मों के मूड से जुदा करता है। जिस तरह वह माउंट की गई है वह मुग़ले आज़म जैसी ईपिक फ़िल्मों जैसा है – विशाल, भव्य, स्पैक्टेक्यूलर, अद्भुत होने के साथ साथ मानव की गहनतम भावनाओं को छूने वाला। पाकीज़ा कहानी है तवायफ़ माँ नरगिस (मीना कुमारी) और तवायफ़ बेटी साहिबजान (मीना कुमारी) की। शहर लखनऊ के कोठों में है एक नरगिस। हर तवायफ़ की तरह उस के लिए भी इश्क़ करना मना है। वह नाचने वाली है, किसी के घर की शोभा नहीं बन सकती। लेकिन कोई है जो उस के साथ घर बसाना चाहता है और वह उसी के साथ बस जाना चाहती है। यह है शहर लखनऊ की कमाल अमरोही की पाकीज़ा। उस के साथ घर बसाना चाहता है नवाब शहाबुद्दीन (अशोक कुमार)।


शहाबुद्दीन ले गया उसे अपने नवाबी घर। यह जो घर है सिनेमा के परदे पर मर्द औरतों से भरा पूरा एक क़ुनबा, एक पूरा माहौल है। क़ुनबे के सदर शहाबुद्दीन के पिता को बेटे से नरगिस का रिश्ता मंज़ूर नहीं है। हवेली से निकल कर अपमानित नरगिस ने पालकी वाले से कहा, मुझे क़ब्रिस्तान तक छोड़ दो। वहीं वह बस गई। दीन दुनिया के रस्मोरिवाज से दूर, अकेली, बेसहारा। यहीं उस की बच्ची का जन्म हुआ, यहीं बीते उस के जीवन के आख़िरी दस महीने। नरगिस की बुरी ख़बर मिली तो बड़ी बहन नवाबजान (वीना) बच्ची को ले गई।
सतरह साल बीत गए। ग़मज़दा शहाबुद्दीन को मिला एक ख़त। मरने से पहले यह ख़त लिखा था नरगिस ने, पर भेज नहीं पाई थी। उस के टूटेफूटे संदूक़ में किसी किताब में रखा था। संदूक़ कबाड़ी बाज़ार पहुँचा, तो किसी भले मानस को मिला, उस ने शहाबुद्दीन के पास भेज दिया। पता लगाता शहाबुद्दीन पहुँचा नवाबजान के कोठे पर। सतरह साल की साहिबजान (नरगिस) बिल्कुल अपनी माँ पर गई है। उस का मुजरा चल रहा है। नवाबजान ने कहा – कल आना!”


और रातोंरात आशियाना छोड़ रवाना हो गई रेलगाड़ी से। निचली बर्थ पर साहिब सोई है, ऊपर वाली पर ख़ाला नवाब। रास्ते के किसी स्टेशन पर एक नौजवान चढ़ा। डिब्बा जनाना था, पर गाड़ी चल पड़ी थी। मज़बूरन अगले स्टेशन तक वहीं रुका रहा। साहिबजान का महावर से लाल तलवा और मेहंदी से रचा पैर देख कर दिलफेंक नौजवान मुग्ध हो गया। अपने को रोक न पाया, एक रुक्का लिखा- आप के पाँव देखे, बहुत हसीन हैं। इन्हें ज़मीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएँगे। रुक्का साहिब की खुली किताब में रखा और उस में से बहुरंगी पंख ले लिया। स्टेशन आ रहा था, उतर गया। साहिबजान के जागने तक वह जा चुका था। वह उस का रुक्का देर तक पढ़ती रही।
[फ़िल्म देखते समय, और अब भी, मुझे याद आई कमाल अमरोही के गुरु सोहराब मोदी की फ़िल्म पृथ्वीवल्लभ (1953) (कहानी कन्हैयालाल मुंशी, संवाद लेखक पंडित सुदर्शन)। उज्जैन का राजा मुंज (सोहराब मोदी) तैलप की क़ैद में है। राजकुमारी हीरोइन मृणालवती (दुर्गा खोटे) उसे ठोकर मारती है। मुंज कहता है, आहिस्ता! आप के नाज़ुक पैर में मोच आ जाएगी!” मुझे अभी तक याद है पृथ्वीवल्लभ की लोकप्रियता। मेरठ में एक पागल घूमा करता था, कहता रहता, मैं पृथ्वीवल्लभ हूँ!” वह फ़िल्म मैं ने बाद मॆं दिल्ली में सुबह की शो में दो बार देखी थी। तैलप की नगरी में गाना नहीं है, बजाना नहीं है – उस का एक गीत था।]
नवाबजान ने बड़ी हवेली ख़रीदी। शामों के गौहरजान (नादिरा) की देखरेख में साहिबजान के मुजरों की महफ़िल जमती। रातों में दूर मैदान के पार कोई ट्रेन गुज़रती तो साहिबजान को याद आता वह दीवाना जिसने वह रुक्का लिखा होगा। सोचती - वह कौन था, कैसा होगा।
अकसर महफ़िल में होता एक नवाब (कमल कपूर)। गौहर ने उसे चुन लिया है साहिबजान के लिए। नवाब साहब ने अपने बजरे पर मुजरा रखा। अचानक गुस्साए हाथियों ने बजरे पर हल्ला बोल दिया। नवाब साहब मारे गए। बहती साहिबजान कहीं किनारे लगी। वहाँ एक तंबू लगा है। तंबू में जो ठहरा है वह आसपास कहीं नहीं है। किसी ने बताया, अकसर साहब जंगलों में घूमघाम कर दो तीन दिन में आते हैं। इधर उधर टहलती साहिबजान तंबू में गई। बिस्तर बिछा था। इधर उधर देखा। तंबू वाले की डायरी के फड़फड़ाते पन्नों में वह रंगीन पंख भी रखा था जो रेल के डिब्बे में साहिबा की किताब में लगा था। तअज्जुब की मारी वह पन्ने पलटने लगी। यह क्या! डायरी में रेल के डिब्बे में लेटी साहिबा के बारे में भी लिखा था, और लिखने वाले ने लिखा था- वह हसीना मेरे दिल से उतरती नहीँ!’
साहिबा के जीवन में पहली बार रोमांस ने जन्म लिया। सारा मौसम उसे आशिक़ाना लगने लगा। वह उस का इंतज़ार कर रही है - वह कौन है, कैसा है।

पाकीजा में मीना कुमारी

और अचानक घोड़े पर सवार वह लिखने वाला भी आ गया। वह आशिक़ जिस के बारे में वह सोचा करती थी। वह है घोड़े पर सवार फ़ौरेस्ट रेंजर फबीला जवान सलीम (राज कुमार)। किसी भी लड़की के सपनों का राजकुमार। दोनों मिले। प्यार की दोचार घड़ी बीतीं। पर साहिब ने याददाश्त खो जाने का बहाना कर के अपना नाम धाम काम कुछ नहीं बताया। साँझ ढलने से पहले खोजी दस्ता साथ लिए नवाबजान आ पहुँची। साहिब को ले तो गई पर साहिब दिल में सलीम को बसा कर ले गई। उस की ज़िंदगी में प्रेम का बिरवा जम गया था। साहिब का कोठा फिर आबाद हो गया। बार बार साहिब को याद आते उस तंबू में गुज़ारे पल।
और कभी एक बार फिर मिले साहिब और सलीम – बीच बाज़ार। भीड़ इकट्ठा हो गई। अब दोनों एक दूसरे से पूरी तरह वाकिफ़ हैं। साहिब को ले कर वह पहुँचा अपने घर।
यह वही घर है जहाँ बरसों पहले शहाबुद्दीन ले गया था नरगिस को। जिन हकीम साहब ने नरगिस और शहाबुद्दीन का रिश्ता नामंज़ूर कर दिया था वही इस बार भी अड़े हैं। सलीम के चचा शहाबुद्दीन भी मौजूद हैं। हकीम साहब को इस अनजान बेनाम हसीना के साथ सलीम का रिश्ता नामंज़ूर कर दिया। सलीम ने घर छोड़ दिया, साथ ले चला साहिबजान को। जहाँ भी वे जाते साहिबा पहचानी जाती। दंगे फ़साद की नौबत आ जाती। भीड़ के पूछने पर एक जगह सलीम ने उस का नाम बताया – पाकीज़ा और बाक़ायदा निकाह करने लगा। सताई साहिबा उसे छोड़ कर फिर अपने कोठे पर पहुँच गई।
शिकिस्ता दिल सलीम शादी के लिए तैयार हो गया। खुन्नस में आ कर उस ने साहिबजान को ही शादी की एक दावत में मुजरे के लिए बुलवाया – वह राज़ी हो गई। मुजरा हो रहा है। यह एक तरह से फ़िल्म का क्लाईमैक्स है। साहिब नाच रही है। थक गई है। कांच के गिलास टूट जाते हैं। काँच के टुकड़े फ़र्श पर बिखर गए हैं। साहिब नाच रही है। तलवे लहूलुहान हो गए हैं। साहिब नाच रही है। ख़ास घरवालों में है शहाबुद्दीन। नवाबजान ने पहचान लिया। बुलंद आवाज़ में बोली, शहाबुद्दीन, देख, अपनी बेटी का जलवा देख!
शहाबुद्दीन के अब्बा ने नवाबजान पर जो गोली चलाई वह लगी शहाबुद्दीन को। सन्नाटा छा गया। मरते मरते शहाबुद्दीन ने सलीम से कहा, मेरी बेटी को अपनी बना ले, सलीम।
बारात। डोली में है सलीम। सब की अनसुनी करते सलीम ने डोली का रुख़ साहिबजान के कोठे की तरफ़ कर दिया।


अरविंद कुमार
-अंत में - मीना और कमाल
जहाँ तक मीना कुमारी का सवाल है कमाल ने उन्हें ले कर कुल दो फ़िल्में बनाईं। ज़्यादा क्यों नहीं?’ का एक जवाब यह हो सकता है कि मीना कुमारी चमचमाते हीरों की खदान बन गई थीं। कमाल ख़ुद दूसरों की फ़िल्म लिखता रहा और अपने सहायक बाक़र अली को लगा दिया पूरे दिन मीना पर नज़र रखने के लिए - और साथ साथ प्रोड्यूसरों से पैसे वसूलने के लिए।यह वही बाक़र अली है जिस ने 5 मार्च 1964 कोपिंजरे के पंछी फ़िल्म के मुहूरत पर सब के सामने मीना के मुँह पर तमाचा जड़ दिया था और पट पट आँसू बहाती, रोती, बिसूरती मीना ने खुले आम कहा था, कमाल साहब से कह देना आज मैं घर नहीं आऊँगी!”मतलब यह कमाल का पूरा तंत्र सफल अभिनेत्री मीना के एजेंट का काम कर रहा था और मीना को भुनाने पर लगा था। पाकीज़ा बनाने की बारी आई तो मीना को फिर से मना कर कमाल महल में बुला लिया गया। पर वहाँ भी कमाल तलाक़ तलाक़ तलाक़ कहने से नहीं चूका। अफ़वाह यह थी कि पछतावा होने पर अपने भरोसे के बाक़र अली से उन का निकाह करा दिया। मीना ने उस के साथ हलाला करने से इनकार कर दिया। कहा नहीं जा सकता कि अंत में मीना ब्याहता थीं या नहीं। मैं ने कमाल परिवार की तरफ़ से प्रचारित ऐसी बातें देखी हैं कि पूरे प्रकरण को सम्मानजनक बनाने के इरादे से हलाला के लिए मीना का निकाह एक अभिनेत्री के पिता के साथ कराया गया था जो कमाल का दोस्त था। मीना ने उस के साथ हलाला किया और एक बार फिर कमाल की पत्नी बन गईं।
किन हालात में आदमी कब क्या करता है – इस का असर उस आदमी के काम की समीक्षा पर नहीं पड़ना चाहिए। निस्संदेह कमाल अमरोही शीर्ष व्यक्ति थे। हिंदी फ़िल्म इतिहास में महल और पाकीज़ा जैसी फ़िल्म बनाने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

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अत्यधिक शराब पीने से जिगर की रोगी मीना अंतिम समय मेरे घर की सड़क नेपियन सी रोड के अंत में एलिज़ाबेथ नर्सिंग होम में थीं। वह सुन्नी थीं या शिया – मृत्यु पर इस पर भी विवाद हुआ था। दफ़न की रसम के लिए यह जानना ज़रूरी समझा गया था। मुझे याद है देर रात, शायद दो बजे तक, ग़मज़दा भीड़ के साथ मैं  भी कमाल महल के बाहर खड़ा था। तब बहस चल रही थी, क़ानूनी दस्तावेज तलाशे जा रहे थे...।
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भाग 124-विद्रोहिणी मीना कुमारी अगले हफ्ते
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ीअगले रविवार
संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)



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