गांधी एक ऐसी शख्सियत जिन्हें निर्देशकों ने अपने-अपने हिसाब से फिल्मी पर्दे पर उतारा है - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 9 फ़रवरी 2020

गांधी एक ऐसी शख्सियत जिन्हें निर्देशकों ने अपने-अपने हिसाब से फिल्मी पर्दे पर उतारा है

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–121

गांधी की शख्सियत को केंद्र में रखकर बनी फिल्मों का विश्लेषण, भाग-3
फिल्मों में गांधी के विभिन्न रूप
ऐट फ़ाइव पास्ट फ़ाइव
ऐट फ़ाइव पास्ट फ़ाइव से मेरी कई यादें जुड़ी हैं। फ़िल्म का आधार था सरिता के ज़माने से नई दिल्ली के काफ़ी हाउस में मिलते रहने वाले ललित सहगल का एक नाटक हत्या एक आकार की। यह नाटक तब से अब तक दिल्ली के मंच पर खेला जाता है। ललित केवल वही करते थे जो उन्हें सही लगता था। जब मैंने सर्वोत्तम शुरू किया तो उन्हें सहायक संपादक बनाया था। सर्वोत्तम की भाषा को संस्कार देना एक हद तक ललित की देन था।

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1969 में अभिनेता विमल आहूजा ने रिलीज़ की अपनी निर्माण कंपनी से बनी ललित के नाटक पर आधारित ऐट फ़ाइव पास्ट फ़ाइव। उसकी चर्चा संसद तक जा पहुंची थी। विरोधी पार्टी के नेता थे लालकृष्ण आडवाणी। उन्हीं दिनों आडवाणी जी बंबई आए थे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में काम करने वाले एक अधिकारी की पत्नी (अब नाम याद नहीं) ने मुझसे कहा उनसे मिलने के लिए। मैं इस तलाश में था ही। तो एक दिन उनकी और मेरी लंबी बातें हुईं – लगभग एक घंटे। माधुरी संपादक की हैसियत से मैंने उनसे कहा कि आप की पार्टी के सांसद जिन मुद्दों पर उस फ़िल्म का विरोध कर रहे हैं वे सही नहीं हैं। कुछ और बातें हैं फ़िल्म में जिनका विरोध किया जा सकता है। मैंने सुझाव दिया कि फ़िल्मों के बारे में बोलने वाले आप के सांसदों की एक टीम बनाई जाए जो फ़िल्मों के बारे में सही जानकारी कलेक्ट कर के साधिकार विचार संसद में रखें। वे बोले, मैं स्वयं फ़िल्म समीक्षक रहा हूं। मैं यह टीम बनाने के सुझाव का स्वागत करता हूं। आप उसके संचालक बनें। मैंने कहा,मैं आप से सहायता मांगने आया हूं, आपकी सहायता करने नहीं। मैं बस पत्रकार रहना चाहता हूं। तबसे आडवाणी जी और मेरे बीच परस्पर समझ का रिश्ता बन गया। उसी के आधार पर उन्होंने पहली ग़ैर-कांग्रेस सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बनने पर मुझे फ़िल्म फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन में निदेशक मंडल का एक सदस्य मनोनीत कर दिया। तब तक मैं माधुरी छोड़ चुका था। उस कॉरपोरेशन का एक निदेशक होने के नाते मंडल की मीटिंगों में हर दूसरे तीसरे महीने बंबई जाता रहा।
ऐट फ़ाइव पास्ट फ़ाइव बनी, पर चल नहीं पाई।
फ़िल्म में उस की हत्या से पहले टीम के सदस्य जानना चाहते हैं कि वे हत्या क्यों कर रहे हैं। इसके लिए तय होता है कि जो मारेगा बाक़ी लोग उस पर मुक़दमा चलाएंगे और सवाल जवाब करेंगे। मारने वाला है अभिनेता इफ़्तख़ार। चुस्त दुरुस्त, सिर पर काली टोपी, निकर कमीज़। तमाम तर्क वितर्क के बाद वह निर्दोष सिद्ध होता है, लेकिन न्यायाधीश आदेश देता है कि हत्या तत्काल कर दी जाए। वे सब जानते हैं हत्या केवल आकार की होगी, विचार की नहीं।
इस के बारे में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने लिखा है:
हत्या एक आकार की’— यह नाम है ललित सहगल के नाटक का, जो उन्होंने शायद गांधी जन्म शताब्दी के बरस 1969 में या उसके दो एक साल बाद लिखा था। इस पर एक फ़िल्म भी बनी थी, ‘एट फ़ाइव पास्ट फ़ाइव। नाटक में चार लोग हैं, जो उसकी हत्या करना चाहते हैं, जिसके सत्य, अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव के फ़ालतू’, बल्कि ख़तरनाकनारों ने हिंदू राष्ट्र को कमज़ोर कर दिया है, जो क्रांतिकारियोंकी आलोचना करता रहा है; जिसने मौत के डर पर विजय पा ली है, जनता पर ऐसा जादू कर दिया है कि उसे जान से मार कर ही चुप किया जा सकता है।

नाटक में 'वह'
ये चारों लोग अपने मिशन पर निकलने ही वाले हैं कि उनमें से एक को संदेह होने लगता है कि मिशन सही है या ग़लत? उसे मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम हैं क्योंकि वह चाहता है कि किसी को प्राणदंड देने के पहले अपराध और दंड पर गंभीर विचार हो। आख़िरकार तय होता है कि एक मुक़दमे का अभिनय किया जाए। जिसे संदेह है, वह उस अभियुक्तके वकील की भूमिका करे, जिसे गोली चलानी है वह सरकारी वकीलकी, तीसरा साथी जज बने, और चौथा बाक़ी बचे सारे रोल निभाए।
31 जनवरी को एम.के. रैना द्वारा यह नाटक देखने का सुअवसर मिला। निर्देशकीय कल्पना और अभिनेताओं की प्रतिभा ने प्रस्तुति को बहुत मार्मिक बना दिया। मेरी पुरज़ोर सिफ़ारिश है, जब भी मौक़ा मिले, एम.के. रैना का यह नाटक ज़रूर देखें। एक अपील भी कि इस टिप्पणी के किसी भी पाठक के पास यदि ललित सहगल और उनके परिवार से संबंधित कोई सूचना हो, तो प्लीज ज़रूर शेयर करें।
-डीयर फ़्रैंड हिटलर
मेरे लिए सन् 2011 की डीयर फ़्रैंड हिटलर का महत्व इस बात का है एक भारतीय ने विदेशी ज़मीन पर सभी विदेशी पात्रों को भारतीय कलाकारों के द्वारा हिटलर के नाम गांधी जी के दो पत्रों के बहाने द्वितीय महायुद्ध का नाज़ी जर्मनी दिखाने की कोशिश की। अगर नाइन अवर्स टु रामा में गोडसे सहित अधिकांश पात्र जर्मन और अमरीकन हो सकते हैं, तो हमारी फ़िल्म में हिटलर सहित सभी विदेशी पात्र भारतीय क्यों नहीँ! विदेशी समाचार पत्रों ने फ़िल्म की निंदा की, भारतीय समीक्षक भी पीछे नहीं रहे। निर्माता थे राकेश रंजन कुमार, पटकथा भी उन्होंने लिखी थी। दो साल गहन रिसर्च करके कहानी लिखी थी नलिन सिंह और राकेश रंजन कुमार ने, निर्देशन भी किया था राकेश रंजन कुमार ने। इस तरह पूरी फ़िल्म के पीछे राकेश रंजन ही थे। पत्र लिखने वाले गांधी की भूमिका की अभिजित दत्त ने और पत्र पाने वाला हिटलर बनाया गया था रघुवीर यादव को।
पहला पत्र लिखा गया था महायुद्ध के आरंभिक दिनों में सन् 1939 को और दूसरा सन् 1945 में जब अपने अंत की ओर हिटलर का पतन हो रहा था। इस का लाभ उठा कर फ़िल्म ने हमें लगभग पूरा युद्धकाल दिखा दिया। बीच में नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी दिखाए गए हैं जो हिटलर की सहायता के इंग्लैंड को हरवा कर भारत को स्वतंत्र करने का सपना देख रहे हैं। हम गोबल्स से भी मिलते हैं और हिटलर की प्रेयसी ईवा ब्रौन (नेहा धूपिया) से भी। फ़िल्म का उद्देश्य है गांधीवाद और नाज़ीवाद का अंतर समझाना। 

-वेल्कम बैक गांधी
अगर 2011 की गांधी माई फ़ादर बाप बेटे के बिगड़े संबंधों की मार्मिक कहानी थी तो सन् 2014 की वैल्कम बैक गांधी सामायिक राजनीतिक टिप्पणी थी। 


मृत्यु के साठ साल बाद गांधीजी (एस. कनकराज) वापस आते हैं। तबसे अब तक देश बदल गया है, ऊंची-ऊंची इमारते हैं, स्त्रियों की वेशभूषा तो बिल्कुल ही बदल गई है। लोग पैसा कमाने में लगे हैं। निर्देशक बालकृष्णन का कहना है,“स्कूली किताबों, डॉक्यूमेंटरियों में गांधी समाया हुआ है। देखना यह है कि उथलपुथल भरे हमारे समय में सत्य और अहिंसा के सिद्धांत कैसे लागू हो सकते हैँ। आज वह होते तो समस्याओं के क्या समाधान निकालते, किस तरह उसे सार्थक बनाते?”
शायद जवाब में निर्देशक पेश करता है एक प्रदेश का मुख्यमंत्री (अनुपम खेर)। वह अपने प्रदेश में गांधी जी के सपनों का रामराज्य लाना चाहता है। हम कह सकते हैं कि वह मोदी जी का प्रतीक है।
तीन करोड़ में बनी फ़िल्म की शूटिंग चेन्नई में चालीस दिन में पूरी की गई थी। द हिंदू ने लिखा,“अपनी तमाम कमियों के बावजूद यह अनकुरणीय सद्प्रयास है, इसकी सफलता से प्रेरित हो कर अन्य लोग भी ऐसी फ़िल्में बनाना चाहेंगे।
वैल्कम बैक गांधी के दो दृश्य$

सवाल: “क्या गांधी को ऐसे सुरक्षा कवर में चलना फिरना होता?”
-कन्नड़ फ़िल्म 5G’
हिन्दी में अगर वैल्कम बैक गांधी बनी तो कन्नड़ में बनी 5G’मैंने फ़िल्म 5जी (5G) पर जानकारी हासिल करने की कोशिश की तो इंटरनेट पर 99.9 प्रतिशत साइटें टेलिफ़ोन और फ़िल्म प्रदर्शन की नई पीढ़ी 5G से भरी थीँ। तो इस 5जी फ़िल्म पर जानकारी छानना लगभग असंभव हो गया। जो कुछ जानकारी थी भी, वह कन्नड़ में थी। एक साइट पर कन्नड़ से इंग्लिश में अनुवाद की सुविधा थी। पर इस अधकचरे (कहें तो 90 प्रतिशत कचरे) से और फ़िल्म का ट्रेलर तथा एक गाना देख कर नई तरह के नाम वाली इस नई तरह की फ़िल्म पर जो भी जानकारी मुझे मिली उस के आधार पर प्रस्तुत है:
5जी (5G) का संबंध न तो 5G टेलिफ़ोनों है, न ही फ़िल्म प्रदर्शन की नई तकनीक 5G से । इसका संबंध आज़ादी के बाद की पांचवीं पीढ़ी से है और इस बात से है कि वह गांधी को क्या समझती है और समाज से क्या चाहती है। इस पीढ़ी के लिए गांधी नोट पर छपी तस्वीर हैं या कोई किंवदंती।
नोटबंदी ने जो धक्के लगाए फ़िल्म में उसका प्रतीक है पांच सौ रुपए और वह नोट पाने की कठिनाई से। यह नोट फ़िल्म में प्रधान भूमिका निभाता है। गांधी जी भी उसी में से निकलते हैं। कहानी का ब्योरा पढ़ने से वह बात उजागर नहीं होती कि उस में ऐसा क्या था कि सैंसर बोर्ड ने cuts/mutes/changes/alterations का फर्रा सात पेजों में आया। स्पष्ट है कि आपत्तिजनक तत्व संवादों में भरी व्यंग्योक्तियों में रहे होंगे। तीन बार रीजेक्ट होने के बाद ही फ़िल्म पास हो पाई। अंततः जो फ़िल्म आई उस में अनेक दृश्य या तो ध्वनिहीन हैं, या धुंधले और बहुत सारे परिवर्तित।

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आधुनिक बेंगलूरु और उसके आसपास का ग्रामांचल। नायक प्रवीन (अभिनेता) है बेरोज़गार चुस्त चालाक व्यवहारकुशल बंदा जिसका काम है नायिका का कहा बजा लाना। उसे अपना मक़सद काम पूरे करने से काम है, नैतिकता से नहीं। नायिका की भूमिका निभाई है हिन्दी की ओ माई गॉड तथा अजब गज़ब लवनिधि सुब्बैया ने जिसे कन्नड़ की पंचरंगी और कृष्णन मैरिज स्टोरी के लिए दक्षिण फ़िल्मफ़ेअर अवॉर्ड मिल चुके हैं। 5जी में वह पत्रकार है जिसका जन्म स्वतंत्रता-संग्रामियों के परिवार में हुआ है। उसका उद्देश्य है समाज सुधार।
संगीतकार श्रीधर संब्रम के निर्देशन में बने दो गीत मैंने सुने हैं 1) मधुर गीत हिदियश्टे इरुवा नान्न हृदया (गायिका अंकिता कुंडु) और 2) खुली आवाज़ वाला मस्त गीतबापू बापू एल्लिड्डिया (गायक विजय प्रकाश)।
निर्देशक गुरुवेंद्र शेट्टी की इस पहली फ़िल्म ने उन्हें सफल निर्देशकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया है।
निर्देशक गुरुवेंद्र शेट्टी की इस पहली फ़िल्म ने उन्हें सफल निर्देशकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया है।
  
-कन्नड़ फ़िल्म मोहनदास– बच्चे मोनिया की कहानी
निर्माता कंपनी मित्र चित्र के लिए निर्देशन है पी. शेषाद्रि का। कथानक की आधार पुस्तकें हैं – बोलवार महम्मद कुन्ही की पापू गांधी बापू गांधी आद कथे: महात्मा गांधी की कहानी और स्वयंगांधी जी की द स्टोरी आफ़ माई ऐक्सपैरिमैंट्स विद ट्रुथ। मुख्य कलाकार हैं: परम स्वामी, समर्थ होमबाई, श्रुति, अनंत महादेवन। संगीत है प्रवीण गौड्खिंडी का।
यह फ़िल्म गांधी जी का 6 से 14 साल तक का बचपन दर्शाती है। कन्नड़ के अतिरिक्त यह हिन्दी और इंग्लिश में भी बन रही है।

मोहनदास को बचपन में सब प्यार से मोनिया कहते थे। उसके पिता करमचंद राज्य में मंत्री थे। मां को परंपराओं से लगाव था। देश में अंग्रेजी राज में क्या हो रहा है – मोनिया इस से बेख़बर था। उसे तो श्रवणकुमार और सत्यवादी हरिश्चंद्र की कथाएं पसंद थीं। सत्य पर अडिग रहना उसे बापू से मिला तो भक्तिभाव मां। मोनिया बड़ा होने लगा। कई ऐब उस ने पाल लिए। सिगरेट पीने का चस्का लगा। चोरी चोरी मांस खाता। पैसे चुराता। मां बाप से झूट बोलता। मन ही मन क्लेश पाता रहता। आख़िर एक दिन निर्णय का पल आ ही गया – बड़े भाई करसनदास के कारण। अपने सभी दुष्कर्मों का चिट्ठा उसने बापू को चिट्ठी में लिख दिया। पढ़ कर बापू ने उसे जो सिखाया – उसी से वह महात्मा बन पाया।
निर्देशक पी. शेषाद्रि ने कहा है, मुझे यह खलता रहता था कि पाठ्य पुस्तकों में गांधी जी के बचपन के बारे कुछ ख़ास नहीं लिखा होता। मैंने सोचा कि बच्चों को वह सब बताने के लिए फ़िल्म बेहतर माध्यम होगी।
फ़िल्म की अधिकांश शूटिंग पोरबंदर और राजकोट में की गई थी – उनके पैतृक मकान के अतिरिक्त अन्य आवश्यक स्थलों पर। कुछ अंश बेंगलूरु शहर में और आसपास की जगहों पर किए गए।
-वाइसराय हाउस
माउंटबैटन को छह सप्ताह में हिंदुस्तान के टुकड़े करने थे
(वाइसराय हाउस (Viceroy's House) में संकेत किया गया है: भारत के विभाजन के पीछे भारत और सोवियत यूनियन के बीच पाकिस्तान नाम की बफ़र स्टेट (मध्यवर्ती राज्य) स्थापित करने कीसोची समझी चाल थी। 
इसकी तैयारी कर रहा था लार्ड इस्मे (General Hastings Lionel Ismay, 1st BaronIsmay KGGCBCHDSOPCDL - 21 June 1887 – 17 December 1965)।)

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भारतीय हाथों में सत्तांतरण की देखरेख के लिए भेजा गया था अंतिम वायसराय के पद पर लार्ड माउंटबैटन (ह्यूग बौनेविल) को। उन के साथ थीं पत्नी ऐडविना (जिलियन ऐंडरसन) और बेटी पामेला। तब वहां क्या हुआ यह दर्शाने के लिए इंग्लैंड में रहने वाले गुरिंदर चड्ढा ने चुनी वायसराय हाउस में काम करने वालेअपने नाना हिंदू जीत कुमार (मनीश दयाल) और नानी मुसलमान आलिया (हुमा क़ुरैशी) की प्रेम कहानी। इस कहानी के साथ-साथ वायसराय हाउस के भीतर और बाहर घटित हो रहा है वह इतिहास इसका विषय है। हिंदू मुस्लिम दंगे भड़क रहे हैं। खेल हाथ से निकला जा रहा है। ब्रिटिश सरकार जल्दी से जल्दी भारत से रुख़सत होना चाहती है। जो काम अगले साल होना था वह इसी साल पंद्रह अगस्त तक पूरा हो जाना है। कुल छह हफ़्तों में ही यह सरअंजाम हो जाना चाहिए। अंदरख़ाने लार्ड इस्मे कर रहा है भारत और सोवियत यूनियन के बीच पाकिस्तान नाम की बफ़र स्टेट खड़ी करने की कामयाब साज़िश। (इस का साफ़ मतलब निकलता है कि उन दिनों के हमारे नेता कुछ करते या न करते – देश का बंटवारा कर के ही जाते अंग्रेज।) नए राज्य के सीमांकन का ज़िम्मा दिया गया है अनुभवहीन अंग्रेज वकील साइरिल रैडक्लिफ़ को। उस ने नक़्शे पर जो लकीर खीँची वह रैडक्लिफ़ लाइन नाम से कुख्यात है।
जीत का पता चलता है कि पंजाब के दंगों में उस का पूरा परिवार मार डाला गया है। नानी आलिया अपने मंगेतर कोधता बता कर अब्बा के साथ पाकिस्तान की ट्रेन में सवार हो गई। कई दिन बाद जीत को पता चला कि ट्रेन सभी सवार मौत के घाट उतार दिए गए हैं। जीत के शोक और क्रोध की सीमा नहीँ थी। त्यागपत्र देने से पहले वह माउंटबैटन पर चाक़ू से हमला कर बैठा।
पंजाब से शरणार्थियों के ठठ पर ठठ आ रहे हैँ। उनकी सेवा में जुटा है जीत। उन्हीं में कहीँ है बुरी तरह घायल आलिया – ट्रेन में वह अकेली ही बच पाई थी और भारत आने वाली भीड़ में शामिल हो गई थी। उसने जीत को देखा तो ज़ोर से पुकार उठी। दोनों का मिलन हुआ।


मैंने फ़िल्म नहीँ देखी है इस लिए इस की दो समीक्षाओं से कुछ अंश पेश कर रहा हूं। पहली है द रैप(the Wrap) पत्रिका से:
फ़िल्म शुरू होती है। 300 कमरों वाले औपनिवेशिक महल वायसराय हाउस में चुपचाप काम कर रहे हैं कर्मचारी। कोई दीवार झाड़ रहा है, तो कोई तस्वीरों के फ़्रेम पोंछ रहा है। इन्हीं में से दो (हिंदू जीत और मुस्लिम आलिया) की प्रेम कहानी है यह फ़िल्म। साथ साथ चल रही है लार्ड लुई और लेडी ऐडविना के प्यार की कहानी। दोनों ही कहानियां फीकी और बेजान हैं। बैंड इट लाइक बैकहैम और भाजी ऑन द बीच के बाद यह गुरिंदर की जितने बड़े स्केल पर बनी फ़िल्म है, उतनी अच्छी है नहीं। अंग्रेजी राज के अंतिम दिनों में ब्रिटिश शासन के केंद्र वैस्टमिंस्टर में चोरी छिपे षड्यंत्र का जो कुटिल खेल खेला जा रहा था उसका यह फ़िल्मांकन रूखा और प्रभावहीन है। माउंटबैटन दंपती के नीरस प्रसंग, लुई की होमो (समलैंगिक) प्रवृत्ति और नेहरू (तनवीर ग़नी) के प्रति ऐडविना के आकर्षण का रंचमात्र उल्लेख भी देखने को नहीं मिलता। पटकथा भारी भरकम गति से लस्तपस्त चलती प्रतीत होती है।
दूसरी तेज़तर्रार समीक्षा है पाकिस्तान के भुट्टो परिवार की फ़ातिमा भुट्टो की:
फ़िल्म का निम्न कोटि का पैंटोमाइम देखकर मैं आंसू न रोक सकी। शुरू में ही पढ़ने को मिलता है –इतिहास लिखते हैं विजेता!’ साम्राज्य और उस के वंशजों की उंगलियों के निशान पूरी कहानी पर मिलते हैं।
आख़िरी वायसराय लार्ड लुई माउंटबैटन सपरिवार पधार रहे हैं। उन के स्वागत की और उपमहाद्वीप के विभाजन की तैयारी में देसी ख़िदमतगार झुक झुक कर सलाम कर रहे हैं, घास के लानों से बीन बीन कर गंद निकाल रहे हैं, क़ालीनों को बुरुशों से साफ़ किया जा रहा है, संगमरमरी फ़र्श घिसे जा रहे हैँ। एक सीन में माउंटबैटन कहता है, मुझे कपड़े पहनाने में दो से ज़्यादा मिनट नहीं लगने चाहिए। सुस्त हिंदुस्तानी हैं जो इस में तेरह मिनट लगाते हैँ! वे नहीं जानते यह शख़्स जल्दी में है, छह से भी सप्ताह में इसे हिंदुस्तान के टुकड़े करने हैं। माउंटबैटनों और उनके कारिंदों की बंदानवाज़ी की मिसालों से गुरिंदर चड्ढा की फ़िल्म लबरेज़ है। हमें बताया जाता है हिंदुस्तानियों ने ब्रिटिशरों को थका मारा था, इसी लिए वे इंडिया छोड़ रहे हैं। कहीँ भी आज़ादी की लड़ाई का ज़िक्र, गाँधी की सिविल नाफ़रमानी की और उन टकरावों की बात नहीं की जाती जिस ने उन्हें भारत छोड़ने पर मज़बूर कर दिया। न कोई ज़िक्र है उन के ज़ुल्मो सितमका, न लीडरों की गिरफ़्तारियों का। न कोई चर्चा है औद्योगिक ब्रिटेन के माल के बहिष्कार आंदोलनों की, न उन की वहशियाना ज़्यादतियों की। याद नहीं दिलाई जाती वह साम्राजी लूट जिस के चलते बंगाल के अकाल में तीस लाख हिंदुस्तानी भूख से तड़प कर मर गए थे। बस, बताया जाता है कि ब्रिटिश थक गए थे – जरमनी से लड़ते लड़ते!

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फ़िल्म की नज़र में ख़िदमतगार जीत कुमार (मनीष दयाल) हिंदु है। वाइसराय का स्टाफ़ आंकड़ों की भाषा जानता है हिंदुस्तान में कई धर्मों को मानने वाले रहते हैं। एक यही तरीक़ा है इंडिया को समझने का। किस की संख्या कितनी है, उस के हिसाब से किस का कितना महत्व है और किस से कितना ख़तरा है! बताया जा रहा है:“ाउंटबैटन साहब पहले पुलिस में थे, वे बड़े वीर हैं, उन्हीं ने बरमा को आज़ाद किया और अब इंडिया को आज़ाद करने पधार रहे हैं!” आज़ादी के लिए लड़ाइयाँ नहीं लड़ी गई थीं। यह तो ाउंटबैटन साहब और ब्रिटिश सरकार का तोहफ़ा है!
लाटसाहब माउंटबैटन हवाई जहाज़ की ऊंचाई से हिंदुस्तान का नज़ारा कर रहे हैँ। बेटी पामेला कहती है, आप एक नेशन अता करने जा रहे हैं इंडिया के लोगों को!” मानों पिछले तीन सौ सालों से कोई और राज कर रहा था देश पर!
ऐडविना माउंटबैटन(जिलियन ऐंडरसन) फुसफुसाती हैं, हम इंडिया को आज़ादी देने आए हैं, उस के टुकड़े करने नहीँ!” तब तक शायद नाज़ी यहां राज कर रहे थे! ऐडविना का कहना है: “हमारे होते इस की हालत बदतर कैसे हो सकती है?” इस के पीछे छिपी है यह भावना: ‘इंडिया ही अपने सब दुखों की वज़ह है।

अरविंद कुमार
देश के क्रांतिकारी और नेता बड़े निरादर भाव से पूरे कौमिक रूप में दरशाए गए हैं। उन से शिष्ट वार्तालाप किया ही नहीं जा सकता! पूरी फ़िल्म में नेहरू जैसे बड़े क़द के नेताओं से माउंटबैटन ऐसे बात करता है जैसेमेहरबानी कर रहा हो। नेहरू ही नहीं, जिन्ना के प्रति भी उस का यही बरताव है। और महात्मा गाँधी को तो बकरी का दूध पीने वाले सठियाए अंकल जैसा पेश किया गया है!
बताया जाता है ब्रिटेन ने हमें रेलगाडी बख़्शी, कटलरी दी। हमें ब्रिटेन का अहसानमंद होना चाहिए। माउंटबेटन ही नहीं तमाम साम्राज्यवादी तत्व दंगों की बात ऐसे करते हैं जैसे उन्हें अपनी डिवाइड ऐंड रूल नीति का पता ही न हो। तीस करोड़ हिंदू और सिख अखंड भारत चाहते हैं। इस के खिलाफ़ हैं तो बस दस करोड़ मुसलमान! ऐसा नक़्शा खींचा गया है कि औपनिवेशिक राज्य ने इंडिया की सुखी और समृद्ध बनाया, लोगों को खुशहाली दी। ब्रिटिश शासक दूध के धुले हैं, अमन के फ़रिश्ते हैं, लोगों को आगे बढ़ने के मौक़े देते हैं, ग़ुस्सैल, वहशियाना, लड़ाकू इनसानों को सभ्य बनाने का भारी बोझ उन्हीं के मजबूत कंधों पर है। वायसराय के ख़िदमतगार आपस में इतना लड़ते हैं कि लाटसाहब को शांत करने के लिए मीटिंग बुलानी पड़ती है।

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सब से बुरा है वह सीन जिस में एक हिंदुस्तानी देश के टुकड़े करने के आरोप में नेहरू के गालपर तमाचा जड़ता है। मुल्क को उजाड़ने वाले अंगरेजों की हर ग़लती नज़रअंदाज़ की गई है। उन के क़सीदे पढ़े गए हैं। वाइसराय हाउस हम लोगों के इनफ़ीरियरिटी कंप्लैक्स की तस्वीर है।

सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

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