क्या मीना कुमारी साहब बीबी और गुलाम की ‘छोटी बहू’ जैसी कामोन्माद ग्रस्त थी? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 1 मार्च 2020

क्या मीना कुमारी साहब बीबी और गुलाम की ‘छोटी बहू’ जैसी कामोन्माद ग्रस्त थी?

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–124

नया नज़रिया - विद्रोहिणी मीना

मीना के अस्पताल और दफ़्न का ख़र्च नरगिस ने उठाया था। उससे इश्क़ का दावा करने वाले धर्मेंद्र और कमाल ने एक भी पैसा नहीं निकाला।
-मीना कुमारी के अनेक अफ़ेअरों के कारण कुछ लोग उसे अनियंत्रणीय कामोन्माद से ग्रस्त निंफोमैनिएक (nymphomaniac) कहते हैं।

मीना कुमारी
-पंडित केदार शर्मा की फ़िल्म जोगन में गीत था सुंदरता के सभी शिकारी। उसके आधार पर मीना को कामुक शिकारियों का शिकार भी माना जाता रहा है। वह सुंदर थी, चोटी की अभिनेत्री थी, रूमानी आकांक्षाओं से छली गई थी। शिकारी आते रहे, उसका तन भोग कर जाते रहे। लेकिन वह थी सच्चे प्यार की प्यासी। तन मन के प्यार की प्यासी। यह प्यास कभी बुझ नहीं पाई। उस की अमिट प्यास की बेहतरीन तस्वीर थी – गुरुदत्त निर्मित फ़िल्म साहब बीबी ग़ुलाम की छोटी बहु।
-एक और नज़रिया हो सकता है मीना कुमारी की अमिट लोकप्रियता को समझने का – तमाम पाबंदियों को तोड़ कर जीने वाली विद्रोहिणी नारी का।
अभिनेत्री दीपिका पडुकोण ने कहा था, शरीर मेरा है, जैसे चाहूं, उसका वैसा इस्तेमाल करने का अधिकार है मुझे।
अंतरराष्ट्रीय स्तर देखें तो मीना मुझे इंग्लैंड की उस प्रिंसेस डायना जैसी लगती है जिसने शाही नियमों को तोड़ कर प्रेम प्रसंग किए।  
स्वच्छंद सेक्स वाली डी.ऐच. लारेंस के उपन्यास की लेडी चटर्ली के प्रसंग चोरी छिपे वर्णित किए गए हैं। 
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-मीना कुमारी का पहला विद्रोह था अब्बा अल्लाबख़्श की पाबंदियों के ख़िलाफ़। तब वह सोलह साल की थी। चोरी छिपे निकाह कर के अब्बा के घर न जा कर पति कमाल अमरोही के घर जाने की आज़ादी की जो ख़ुशी मिली, वह ज़्यादा दिन नहीं टिक पाई। कमाल ने जो पाबंदियाँ लगाईं वे पिंजरे में बंद पंछी की क़ैद से कम नहीं थीं। शाम को साढ़े छह बजने से पहले घर आ जाना। मेकअप रूम में किसी और के क़दम न पड़ने देना। कमाल की गाड़ी के अलावा किसी और की कार से सफ़र न करना।
जब भी मीना शाम को देर रात घर पहुंचती तो पिटती भी थी।
यह भावुक शादी कोई बराबरी की शादी नहीं निकली। अपने से दुगनी उम्र के पति की ग़ुलामी थी।
मीना का सितारा बढ़ रहा था, कमाल का गिर रहा था। ईर्ष्या के साथ अपनी कमतरी का अहसास कमाल को था। यह भी कहा जा सकता है सोने के अंडे देने वाली मुर्गी के हाथ से निकल जाने का डर भी था। इस तरह के अनेक परिवारों में ऐसा अकसर देखा गया है। अभिनेत्री बेटी हो तो उसके शादी कर के चले जाने का डर घर वालों को सताता रहता है। सुरैया की शादी न होना इसका एक उदाहरण है।

-तो मीना विद्रोह कर रही थी अपने पति कमाल अमरोही के शक़्क़ी मिजाज से, अपने पर लगातार रखी जाती आँख से। वह आंख था कमाल का दोस्त कहो, जासूस कहो, स्ट्रौंगमैन कहो - बाक़र अली। उसी ने खुलेआम पिंजरे का पंछी के सैट पर मीना के गाल पर तमाचा जड़ा था पिंजरे के पंछी की शूटिंग के पहले दिन – मेकप रूम में कवि गुलज़ार को बुलाने पर।

याद कीजिए उर्दू के वे शेर:
ख़त कबूतर किस तरह - ले जाए बामे यार पर
पर कतरने को लगी हैं - कैंचियां दीवार पर
इस के जवाब का शेर हुआ करता था:
ख़त कबूतर इस तरह - ले जाए बामे यार पर
ख़त का मजमूं हो परों पर - पर कटें दीवार पर

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मीना स्वयं उर्दू शायरी में रमी थी। शराब हो या इश्क़ उर्दू सुख़न में बग़ावत के इज़हार की ऐसे तमाम मिसाल भरी हैँ। और मीना ने विद्रोह का वही रास्ता अख़्तियार किया।
-लेकिन इससे हट कर मैं उस के प्रेम प्रसंगों को नई नज़र से पेश करने की कोशिश कर रहा हूं-
दिल के मुआमलों में कच्ची रही कोमल रेशम जैसे तन वाली विद्रोहिणी बेचारी मीना। बात 1964 की पूर्णिमा फ़िल्म की शूटिंग से शुरू हुई। मैं बात करता हूं – बंबई में मेरे पहले फ़ोटो शूट की। तय हुआ था कि गोरेगांव के फ़िल्मिस्तान स्टूडियो मेँ निर्माणाधीन फ़िल्म पूर्णिमा के सैट पर शाम के आठ बजे मीना जी फ़ोटो लिए जाएंगे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के फ़ोटोग्राफ़र श्री महाजन के साथ मैँ भी गया था अपनी पत्रिका के पहले मुखपृष्ठ का फ़ोटो खिँचवाने, जैसा मेरे मन मेँ था। बिल्कुल नया अनुभव। मैँ आतंकित नहीँ था। पूरे आत्मविश्वास के साथ चल रहा था। उत्सुकता भी थी मीना जी को देखने की। मोबीन ने हमारा परिचय करवाया। रस्मी शुरुआती बातेँ हुईँ। महाजन से वह सुपरिचित थीँ। मैँने अपना नाम बताया। उन्होँने पूछा, कैसा फ़ोटो चाहिए?’ मैँने कहा, हमेँ एक आशावादी लुक चाहिए - भविष्य की ओर ऊपर देखते हुए जो हमारी पत्रिका के आशावादी चरित्र का परिचायक हो सके। महाजन से पूछा, फोटो मेँ मैँ कहां तक दिखूंगी?’ महाजन ने कहा, बस्ट तक। मीना जी आराम से बैठीँ, पोज़ बनाया। महाजन ने एक के बाद एक कई शॉट लिये।
विदा लेकर हम लोग बाहर आए।
-जल्दी ही उसी सन् 1964 में मीना ने कमाल अमरोही को तलाक़ दे दिया।
मीना का बहुत पीना चालू था। शायह यही बचा था अपने सारे ग़म भुलाने का नुस्ख़ा। 1968 तक उसकी हालत गिरती गई। बीमारी थी वही - जो अकसर फ़िल्म वालों को होती है। अतिशय अल्कोहल सेवन से जिगर का पथरा जाना – सिर्रोसिस ऑफ़ लिवर। डॉक्टरों की सलाह थी कि काम कम करे। ऐसा उस ने किया नहीँ।
धरम ने जब छोड़ा तो मीना भूखी हो चुकी थी उस गरमाहट की जो पति कभी उसे नहीं दे पाया। एक के बाद एक
फ़िल्म अभिनेता उस के पास आता रहा और भोग कर जाता रहा।
यह मानना पड़ता है कि जब किसी से उस का कोई संबंध बना तो वह उस के प्रति सच्ची रहती थी।

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-एक बार फिर सन् 1971 में मीना ने कुछ दिन धर्मेंद्र के साथ बिताए – जिस से शादी नामुमकिन थी। वह विवाहित था। 1972 में मीना की ज़िंदगी के केवल चार महीने बचे थे। धर्मेंद्र को नई तारिका हेमा मालिनी के साथ फ़िल्मों के ऑफ़र मिल रहे थे। उस के साथ पहली दो फ़िल्म थीं –तुम हसीन मैं जवान और शराफ़त
दिलफेंक धर्मेंद्र जल्दी ही हेमा से शादी करने वाला था।


-1966 की फूल और पत्थर एक तरह से मीना और धर्मेंद्र के जीवन की ही कहानी थी। मर्द और औरत एक ही छत के नीचे साथ रहते हैं, एक दूसरे को चाहते हैं, पर...। इस में मीना ने अपने अभिनय को पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया था।
-अनेक भारतीय नारियों की तरह मीना भी आत्मपीडनोन्माद ​(मैसोकिज़्म–masochism) से भी ग्रस्त थी। मन ही मन अपने दुख झेलती रहती थी।
वह अपने में सिमटती गई। जीवन के प्रति निराशा की भावना उस पर हावी होती जा रही थी। मुझे याद आता है सहगल का गीत –अब हम जी कर क्या करेंगे जब दिल ही टूट गया।
उनतालीस, चालीस साल की उम्र में वह साठ साल की लगने लगी थी।
छिटपुट-
-अब्बा ने मीना से भी कम उम्र की लड़की से शादी कर ली तोमीना कुमारी को विश्वास ही नहीं हुआ। यही नहीं नई बीवी घर की नौकरानी थी। दुनिया ऐसे ही चलती है।
-मीना और कमाल के झगड़ों के कारण बरसों से पाकीज़ा रुकी पड़ी थी। पहले राजकुमार वाली भूमिका में धर्मेंद्र हुआ करता था। शक़्क़ी कमाल ने उसे निकाल दिया था।
नरगिस ने बीच बचाव किया। अब राजकुमार के साथ फिर से शुरू करने की बात थी।
अपनी बढ़ी उम्र और बदली शक्ल सूरत को लेकर मीना को कई आशंकाएं थीँ। पुरानी शूटिंग से किस तरह मेल बैठेगा, वग़ैरा...। अब नृत्यों के दृश्यों में मीना के डुप्लिकेट के तौर पर पद्मा खन्ना को लिया गया। बाद में पद्मा ने अमेरीका में डांस एकाडमी खोल ली थी।

पाकीजा में मीना कुमारी
पाकीज़ा की स्पेशल स्क्रीनिंग पर मीना के साथ थे नरगिस और सुनील दत्त। फ़िल्म पूरी होने पर मीना ने कमाल से कहा, चंदन इस के बाद कोई और फ़िल्म मत बनाना। दर्शकों को यह हमारी यादगार बनी रहने देना। पर कमाल हमेशा की तरह बेवफ़ा निकला। उसने 1983 में हेमा मालिनी को लेकर बनाई रज़िया सुल्तान जो मेरी राय में अच्छी नहीँ बन पाई। इस में हीरो था वही धर्मेंद्र जो कभी मीना का प्रेमी था।
मीना और नरगिस सहेलियां थीं। मीना ने मज़ाक़ के तौर पर कहा, मैं तेरे ख़ाविंद को चुरा लूंगी!” मीना ने सुनील के साथ दो फ़िल्में की थीं – मैँ चुप रहूंगी और ग़जल।
कठोर सत्य यह है कि मीना के दफ़्न का सारा ख़र्च नरगिस ने उठाया था। धर्मेंद्र और कमाल हाथ खीँचे ख़ड़े रहे। मीना के अस्पताल का भारी ख़र्च भी नरगिस ने उठाया। उससे इश्क़ का दावा करने वाले धर्मेंद्र और कमाल ने एक भी पैसा नहीं निकाला।
-मीना के आख़िरी बरसों में बस गुलज़ार और सावन कुमार टाक थे।
-कहें तो गुलज़ार ने बंगाली फ़िल्म आपन जन के हिन्दी रीमेक मेरे अपने में मीना कुमारी को मुख्य भूमिका में लिया और उस की सफलता से भरपूर कमाई की। अभिनेता रमेश देव ने कहा था, बमुश्किल तमाम अकेली सीढ़ियां चढ़ती मीना पहुंची मेरे अपने की स्क्रीनिंग देखने। उस की मदद करने कोई आगे नहीं बढ़ा!”

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-सावन कुमार टाक के निर्देशन की पहली फ़िल्म थी 1972 की गोमती के किनारे। मीना कुमारी नायिका थीं और सहअभिनेत्री थी मुमताज़। इस फ़िल्म में मुमताज़ का भुगतान न हो पाया तो मीना ने अपना घर उस के नाम कर दिया था।
सावन कुमार अकसर मेरे पास आकर बैठते थे। एक दिन उन्होंने सुनाई थी मीना के साथ उनके हमबिस्तर होने की कहानी। उनका कहना था – छह रात हम दोनों पलंग के इस और उस तरफ़ बैठे एक दूसरे को देखते रहे। सातवीं रात...।
-मीना का कहना था, मैं भी पढ़ना चाहती थी, पर मिला क्या?– मेरा क्लास रूम था फ़िल्म स्टूडियो, मेरा जीवन ही मेरी यूनिवर्सिटी बना, बतौर डिग्री मिली स्टारडम, कभी कांटों का ताज, तो कभी सुनहरे फूल।
मौक़ा मिलता तो कुछ अलग हट कर अपने तख़ल्लुस नाज़ से शायरी करने लगती। किसी ने पूछा, इतनी फ़ुरसत कैसे मिलती है, तो बोलीं, लिखने में वक़्त ही कितना लगता है। बस जो चाहो लिख लो!”
उसकी कविताओं का संकलन का नाम है तन्हा चांद– यह उसकी मौत के साल गुलज़ार ने प्रकाशित करवाया था।
-रोने की दृश्यों में मीना को आंखों में कभी ग्लीसरीन की ज़रूरत नहीं पड़ी। ग़रीबी में पली बढ़ी होने के कारण बस कोई घटना याद करना काफ़ी होता था।
-राज्य सभा टीवी की एक डॉक्यूमेंटरी में उस की तुलना ऐसी गाय से की गई थी जो बासी रोटी खाती थी और अशरफियां निकालती थी।
-केवल साहब बीबी और ग़ुलाम (1962) और पाकीज़ा (1972) उस के आंतरिक संघर्ष को चित्रित कर पाईं।
उसे अमर करने वाली फ़िल्म है पाकीज़ा। मुजरा करने वाली वेश्या को पाकीज़ा - निष्कलुष और निर्मल पाक दामनकहने वाली फ़िल्म। मां की मौत के बाद साहिब जान कोठों पर नाम कमाती है, पर मन ही मन उसे रोमांस और इज्जत की तलाश है।
मीना को पता था मौत सामने खड़ी है, पर फ़िल्म पूरी किए बिना उस का मरना नामुमकिन था।
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अरविंद कुमार
-मीना के अंधेरे दिनों में एक मात्र संगी थे शराब और शायरी।
दर्द के साये, उदासी का धुआं, दुख की घटा
ज़िंदगी ये है तो मौत किसे कहते हैं
मीना लंदन गई थी उन ग़मोँ से जूझने जो उसे प्रदीप कुमार, राज कुमार, राजेंद्र कुमार और ख़ासकर धर्मेंद्र ने दिए थे।
मेरे ही ख़्वाब मेरे लिए ज़ह्र बन गए
मेरे तस्सुवरात ने डस लिया मुझे
पाकीज़ा के 4 फ़रवरी 1972 प्रीमियर पर फ़िल्म देख कर मीना ने अभिभूत हो कर कमाल अमरोही को आलिंगन में जकड़ लिया था। लेकिन यह ख़ुशी जल्दी ही उदासी बन गई। दर्शकों को फ़िल्म पसंद नहीं आ रही थी। फिर 31 मार्च 1972 को मीना की मौत की ख़बर के बाद फ़िल्म सोने की खान बन गई। मराठा मंदिर में गोल्डन जुबली मनी।
अंत में मीना (नाज़) का एक शेर
तुम क्या करोगे सुन कर मुझ से मेरी कहानी
बेलुत्फ़ ज़िंदगी के क़िस्से हैं फीके फीके
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 सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

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