बेहतरीन पटकथा के लिए याद की जाती है बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

रविवार, 15 मार्च 2020

बेहतरीन पटकथा के लिए याद की जाती है बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन

फ़िल्म योगी बिमल रॉय-दो, दो बीघा जमीन विशेष
माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–126

बिमल रॉय के जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ उनकी अपनी कंपनी बिमल रॉय प्रोडक्शंस की पहली फ़िल्म 1953 की दो बीघा ज़मीन से।


सिेनेमा जगत की बड़ी खबरों को पढ़ने के लिए क्लिक करें 

दो बीघा ज़मीन के बाद बनी – नौकरी (1954), बिराज बहू (1954), बाप बेटी (1954), देवदास (1955), मधुमती (1958), यहूदी (1958) (बांबे टाकीज के लिए), सुजाता (1959), परख (1960), काबुली वाला (1961), प्रेमपत्र (1962) और बंदिनी (1963)
उनकी कंपनी बिमल रॉय प्रोडक्शंस के लिए असित सेन ने निर्देशित कीं 1956 की परिवार और 1957 की अपराधी कौन, मोनि भट्टाचार्जी ने 1960 की उसने कहा था, हेमेन गुप्ता ने 1961 काबुलीवाला, ऐस. ख़लील ने 1964 बेनज़ीर (भाग 125 की शुरुआत मैं ने इसी के प्रैस प्रीव्यू से की थी और इस के बारे में लिखा भी था) और उन के देहांत के बाद आई थी राजबंस खन्ना द्वारा निर्दशित गौतम द बुद्धा।
-
दो बीघा ज़मीन

दो बीघा ज़मीन में एक तरफ़ है अनपढ़ अज्ञानी किसान शंभु तो दूसरी तरफ़ है क्रूर लालची ज़मींदार ठाकुर हरनाम सिंह। ज़मींदार ने गाँव का बड़ा भूभाग मिल बनाने के लिए बेच दिया। देश में उद्योगीकरण का आरंभ इसी तरह हुआ था। फ़िल्म हमें दिखाती है इस बदलाव में शंभु जैसे किसानों की अपनी धरती से अलग हो कर सर्वहारा बन कर टूट जाने की प्रक्रिया।
शुरुआत होती है पपड़ाई प्यासी धरती के दृश्यों से... फिर बादल उमड़ने घुमड़ने लगे। पंछी दिशा बदलने लगे। बादल गरज रहे हैं। और बरसों बाद आ गई झमाझम बारिश।किसानों को मानों नई जान मिल गई। चतुर्दिक् हंसी ख़ुशी, हलचल, सावन का झूला झूलती स्त्री, घनघनाते बादल बरस रहे हैं। पूरा गांव मस्त है। वे ही नहीं पूरी सृष्टि नवजीवन कागीत गा रही है हरियाला सावन ढोल बजाता आया। आजतक लोकप्रिय यह गीत सुनें:
इसके ख़त्म होते-होते शुरू हो जाता है एक और गीत: धरती कहे पुकार के मौसम बीता जाए’- किसानों के चेहरों पर आशा का संदेश। उतार-चढ़ावदार धरती पर दूर तकचलते फिरते लोग, धीरे धीरे उन के क्लोज़प, आकाश, फिर धरती, संगी। गीत के पहले बोल उभर रहे हैं: गंगा जमना की गहरी है - धार, आगे पीछे सब को जाना है - पार (जो इसे आध्यात्मिक रूप प्रदान करता है), और फिर धरती कहे पुकार के – बीज बिछा ले प्यार के - मौसम बीता जाए...
सबकी तरह सबके साथ बड़े उत्साह से किसान शंभु महतो (बलराज साहनी) और उस की घरवाली पारो (निरूपा राय) नई फ़सल बोने के कामों में लग जाते हैं। दूर सेचली आती शानदार कार रुकती है जमींदार ठाकुऱ हरनाम सिंह (मुराद) के महल पर। जो आया है वह गांव की ज़मीन पर मिल खड़ी करना चाहता है और ठाकुर को भागीदार बना लेता है। गांव की ज़मीन बिक रही है। शंभु महतो नहीं बेचना चाहता। उस पर ठाकुर के पैंसठ रुपए बकाया हैं। वह वसूलने के नाम पर ठाकुर शंभो को ज़मीन से उखाड़ने पर तुल जाता है। बहीखातोँ में हेरफेर कर शंभुपर 235 रुपए का ज़ाली केस ठोंक देता है। चटपट फ़ैसला सुना दिया जाता है - तीन महीनों में सारा पैसा चुका दो वरना ज़मीन नीलाम हो जाएगी। कुल तीन महीने! ऊपर से नीलामी की तलवार!


इतना पैसा कहां से लाए! शंभु घर के सारे बरतन भांडे, पत्नी पारो के छोटे छोटे ज़ेवर बेचता है। फिर भी पूरा नहीं पड़ता। सलाहकारों के कहने पर वह कलकत्ता जाने के लिए बस में बैठता है। बेटा कन्हैया भी साथ जाना चाहता था। शंभु ने बरज दिया था, पर हम देखते हैं वह भी पीछे किसी सीट पर छिपा बैठा है। रेलगाड़ी में दोनों एक साथ जा रहे हैं। कलकत्ता शहर। ऊँचे ऊँचे मकान। उन में आदमी बड़े छोटे लगते हैं।


सिेनेमा जगत की बड़ी खबरों को पढ़ने के लिए क्लिक करें 


शहर की बेरहम व्यस्ता में शंभु के पास जीने को कोई सहारा नहीं बचता। पार्क में चौकीदार सोने नहीं देते। सोने के लिए फ़ुटपाथ है। जो पोटली वह लाया था, वह चोरी हो गई। एक के बाद एक दृश्य में शंभु और उस के परिवार का चित्रण दर्शक की सहानुभूति तो खींच लेता है। लेकिन उन के कठिन जीवन में सहायता कम ही करता है। बेटा कन्हैया बुख़ार से तप रहा है। जैसे तैसे शंभु को छोटी सी खोली मिल जाती है। दिन में शंभु कुलीगीरी करता है। पड़ोसी रिक्शावाला (नज़ीर हुसैन) बीमार है। वह सुझाव देता है कि मेरी रिक्शा चला कर कुछ कमाओ खोली का भाड़ा देने और गुज़रबसर व बचत के लिए। इस तरह शंभु बन गया रिक्शावाला। कुछ ठीक हुआ तो कन्हैया बूटपालिश करने लगा। पालिश करने वाले लड़के मनोरंजन के लिए गाते हैं आवारा हूँ। (उल्लेखनीय है कि अगले साल राज कपूर ने बनाई बूट पालिश।)


उधर गाँव में पार्वती और ससुर गंगु सिंघाड़े खा कर गुज़ारा कर रहे हैं। शंभु ने मनी आर्डर भेजा है, अपना पता भी लिखा है। घर में ख़ुशी की हलकी सी लहर आती है। जवाब में चिट्ठी लिखवाने शरमाती पार्वती जाती है धनी बहु (मीना कुमारी) के पास, जो बच्चा सुलाने के लिए लोरी गा रही है। (फ़िल्म में मीना कुमारी अतिथि कलाकार है बस एक दृश्य के लिए।)
तीसरा महीना समाप्त होने को है। ज़मींदार खेत हथिया लेगा! शंभु को जैसे तैसे और ज़्यादा कमाना होगा। एक लड़की किसी रिक्शा में चढ़ती है। उस का प्रेमी उसे रोकना चाहता है। वह शंभु की रिक्शा में सवार हो जाता है। अगली रिक्शा में लड़की रिक्शा तेज़ करवाती है। शंभु वाला बाबू उसे ज़्यादा पैसों का लालच दे कर और भी दौड़वाता है। और... यह क्या! रिक्शा का एक पहिया निकल भागा। शंभु धड़ाम हो गया। वह घायल हो जाता है। अब कन्हैया को और भी कमाना है। वह जेबकतरा बन जाता है। मालूम हुआ तो शंभु ने कन्हैया की धुनाई कर दी।
बहुत दिन से शंभु का कोई समाचार नहीं मिला है। पार्वती परेशान है। शंभु की चोट की ख़बर मिली तो चल दी कलकत्ता। एक धोखेबाज़ उस पर बलात्कार की कोशिश करता है। वह भागी तो कार के नीचे आ गई। उसे अस्पताल ले जाने के लिए जो रिक्शा मिली वह शंभु की ही थी। मां के इलाज के लिए किसी महिला के पैसे चुरा कर कन्हैया अस्पताल पहुंचा। मां की हालत देख कर उसे लगा कि मां उस की चोरी के पाप का फल भोग रही है। उस ने सारे नोट फाड़ डाले। जो कुछ भी शंभु के पास था वह इलाज में ख़र्च हो गया।
गाँव में शंभु की ज़मीन नीलाम हुई तो हरनाम ने ख़रीद ली। उस पर मिल की इमारत खड़ी होने लगी। शंभु सपरिवार घर लौटा तो अब उस का खेत था ही नहीं। शंभु अपनी धरती की माटी उठाने झुका तो गार्ड ने रोक दिया। अपना सब कुछ खो कर वे अपनी धरती से दरबदर हो कर वापस लौट रहे हैं। फ़िल्म समाप्त होती है।
सलिल चौधरी ने अपनी कहानी बिमल रॉय को सुनाई तो उन्होंने तुरंत पसंद कर ली। इस पर सलिल ने एक शर्त लगा दी। फ़िल्म में संगीत रचना भी मैं करूँगा। बिमल रॉय सहमत हो गए। परिणाम आशातीत सफल रहा। बलराज साहनी, निरूपा राय, रतन कुमार, मुराद तथा नाना पल्सीकर के अतिरिक्त बाल कलाकार के रूप में बूट पालिश वाला लालू उस्ताद बना था जगदीप। अतिथि कलाकार मीना कुमारी से आप मिल ही चुके हैं।

अरविंद कुमार
फ़िल्मांकन किया था कमल बोस ने तो संपादक थे बिमल रॉय के विश्वस्त हृषीकेश मुखर्जी।
फ़िल्म सफल तो थी, लेकिन अधिक कमाई नहीं कर पाई। फ़िल्मफ़ेअर का पहला श्रेष्ठ फ़िल्म अवार्ड जीतने वाली फ़िल्म यही थी। कान्स फ़िल्म फ़ेस्टिवल में इसे इंटरनेशनल पुरस्कार मिला, तो कार्लो वैरी मॆं इसे सामाजिक प्रगति (Social Progress) अवॉर्ड मिला। इंडिया टाइम्स मूवीज़ में यह भारत में बनीं पच्चीस सर्वाधिक दर्शनीय फ़िल्मों में गिनी जाती है।
एक समीक्षक ने लिखा है, फ़िल्मांकन में कमल बोस जैसा महारथी था, तो बिमल रॉय के साथ परदे के पीछे थे पटकथाकार हृषीकेश मुखर्जी और सहायक निर्देशक थे भविष्य में उसने कहा था और मुझे जीने दो के निर्देशक मणि भट्टाचार्जी। हृषीकेश ने पटकथा लिखने के साथ साथ फ़िल्म का संपादन भी किया था। 'दो बीघा जमीन' को देखना हिंदी सिनेमा के अनेक भावी मास्टरों की कला को देखना है।


सिेनेमा जगत की बड़ी खबरों को पढ़ने के लिए क्लिक करें 


 सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ीअगले रविवार
संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Bottom Ad