क्या देवदास की कहानी शरतचंद्र की अपनी जिंदगी से ही प्रेरित थी? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 29 मार्च 2020

क्या देवदास की कहानी शरतचंद्र की अपनी जिंदगी से ही प्रेरित थी?

फ़िल्म योगी बिमल रॉय-चार, देवदास विशेष
माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–128

बिमल रॉय की फिल्म देवदास का एक दृश्य़

पिछली सदी में लिखा गया शरतचंद्र चटर्जी का छोटा सा उपन्यास देवदास अब तक हम लोगों पर छाया है। देवदास, पारो और चंद्रमुखी सामाजिक प्रतीक बन चुके हैं। अंततः मानव के अपने जीवन के उतार-चढ़ाव का उपमान ही तो है देवदास। मानव मन में अंतर्निहित प्रेम भावना की अंतहीन ललक। किसी के लिए जीने मरने की, कष्ट सहने और मर मिटने की प्रवृत्ति।

शरतचंद्र
दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में इतिहास के एसोसिएट प्रोफ़ेसर जे.एन. सिन्हा ने लिखा है-
[सन् 1893 से शरतचंद्र बिहार के भागलपुर में मामा के साथ रहते थे। माना जाता है कि युवा लेखक शरत् ने अपने जीवन के आधार पर ही उपन्यास के मुख्य पात्रों की कथा लिखी होगी। देवदास उपन्यास लिखा तो गया था सन् 1901 में लेकिन छपा 1917 में। और तत्काल लोकप्रियता के शिखर तक जा पहुंचा। देवदास और पारो में कुछ ऐसा था जो सबके दिल को छूता था। पाठक और फ़िल्म दर्शक अभी तक इस के जादू से अछूते नहीं रह पाते।
[शरतचंद्र के एक सहपाठी की बहन धीरु असली पार्वती थी। स्वभाव से चंचल धीरु बात बात में रूठ जाती। दोनों लड़ते, रूठते जल्दी ही फिर मिल जाते थे। अकसर नदी किनारे ख़ंजरबेग का मज़ार पर जा बैठते, भविष्य के जीवन के सपने देखते। धीरु के घरवालों ने दोनों की शादी की बात उठाई भी। शरत् के परिवार ने ठुकरा दी। दोनों का दिल टूट गया। यह धीरु के लिए अपमानजनक भी था। पर वह शरत् को नहीं भूल पाई। दोनों का मिलना जुलना चलता रहा। धीरु के घरवालों ने उसका रिश्ता पक्का कर दिया। एक रात वह शरत् से मिलने आई भी। लेकिन शरत् ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। निराश धीरु शादी के बाद किसी और शहर में चली गई।


[पूरी तरह टूटा शरत् लगभग पागल हो गया। सन् 1901 में एक बार फिर भागलपुर आया। इधर उधर भटकते उसे धीरु मिली तो नशे में धुत शरत ने कौली में भर लिया। उसके आलिंगन से छूट कर किसी तरह धीरु ने पति से शिकायत कर दी। पति ने शरत् की अच्छी ख़ासी मरम्मत करवा दी। हमलावर उसे मरा जान कर तालाब के किनारे डाल गए। सुबह पुंटी नाम की वेश्या ने उसे पहचाना और अपने साथ वेश्याओं की बस्ती चतुर्भुजस्थान ले गई।
[अच्छा क़िस्सागो और गायक निराश शरत् महफ़िलों की जान बन गया। उसे मिले मुज़फ़्फ़रपुर के रईस महादेव साहू–नाच रंग की महफ़िलों के शौक़ीन। उन्हों ने शरत् को उसे मानसिक दुर्दशा से उबारा।


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[पिता की मृत्य पर शरत् एक बार फिर टूट गया। भागलपुर आया। टूटे शरत् को दोस्त राजू ने संभाला। मंसूरगंज की वेश्या कालिदासी से मिलवाया। शरत् अब उसका दीवाना हो गया। यहीं शरत् ने देवदास लिखना शुरू किया। कालिदासी बन गई चंद्रमुखी। धीरु का ही प्रतिरूप। कहते हैं कि शरत् के लिए कालिदासी धंधा छोड़कर सड़कों पर भजन गाती फिरने लगी। धीरु की याद में शरत् फिर भटकने लगा। 1903 में रंगून में नौकरी मिली। वहां की गंदी बस्तियों में एकाकी मस्त रहता था। शादी कर ली। पहले बेटा और बाद में पत्नी शांति देवी प्लेग का शिकार हो गए। एक बार फिर वही आवारगी – अनेक औरतों से संबंध। अंत में उसे मिली निर्धन हिरण्यमयी। दोनों साथ रहने लगे। वह 1960 में मरी।
[1916 में रंगून से लौटने पर अकस्मात धीरु उसे फिर मिली। अब वह विधवा थी और शरत् साहित्य का सिरमौर। दोनों के बीच क्या बात हुई – कोई नहीं जानता। धीरु का क्या हुआ – यह भी अज्ञात है। शरच्चंद्र के जीवन से जुदा हो जाने के बावजूद वह उसके साहित्य में बार बार आती है। अपनी रचनाओं में नारी पात्रों में शरत् ने उसे जो शालीनता और मान मर्यादा दी है, वही पाठकों को बार बार शरत् के पास ले जाती है।
[1955 में बिमल रॉय का देवदास जीवित हुआ। सुचित्रा सेन ने पारो को गरिमा प्रदान की। महादेव साहू हमें चुन्नी लाल के रूप में मिलता है। मामा के घर का मुशाई नाम का नौकर धर्मदास है।
अब तक देवदास पर कई फ़िल्में बन चुकी हैं। लोग भुलाए नहीं भूलते इन तीनों को। मेरी देखी पांच-छह देवदासों में दो ही–सहगल वाली और दिलीप कुमार वाली – मुझे महत्वपूर्ण लगती हैं। सहगल वाली देवदास का निर्देशन प्रमथेश चंद्र बरुआ ने किया था। उसी ने मूल उपन्यास का ढीला ढाला अंत सशक्त बनाया था। मेरी अपनी राय है कि यह अंत मूल कहानी में एक नया तत्व जोड़ता है। देवदास का पारो के दरवाज़े पर मरना अकेले देवदास की त्रासदी नहीं रह जाता, उसके शव को देखने को पागलों सी दौड़ती पारो के सामने हवेली के दरवाज़े बंद कर दिया जाना स्वयं पारो की त्रासदी बन जाता है। वह दम भरा करती थी अपनी धनी गृहस्थी की वह स्वतंत्र अधिकारिणी है और देवदास को अपने ससुराल ले जा कर उसकी देखभाल करेगी। उसकी यह धारणा, यह आत्मविश्वास, निर्मूल सिद्ध होते हैं। यही देवदास को हमारे समाज की सच्चाई का ठोस सत्य साबित करता है।

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बरुआ की देवदास के फ़ोटोग्राफ़र थे स्वयं बिमल रॉय। स्वतंत्र और प्रसिद्ध हो कर उन्होंने देवदास बनाई और निर्देशित की। पटकथा नवेंदु घोष ने लिखी, संवाद राजिंदर सिंह बेदी ने। कैमरा संचालन किया कमल बोस ने। संगीतकार एस. डी. बर्मन के लिए गीत लिखे साहिर लुधानवी ने।
बिमल रॉय की देवदास के साल 1955 में मैँ दिल्ली में सरिता के संपादन विभाग में था। कभी कभी मेरठ जाता था। वहां एक मित्र का नौजवान रिश्तेदार अपने को देवदास में ढाल रहा था। दिलीप कुमार के संवाद दोहराता रहता। उन में से एक था, कौन कमबख़्त है जो बर्दाश्त करने के लिए पीता है? मैं तो पीता हूं बस सांस ले सकूं!” ये संवाद लिखे थे प्रसिद्ध साहित्यकार राजिंदर सिंह बेदी ने। शायद बिमल रॉय की देवदास ही है जिसके संवादों का रिकॉर्ड स्वतंत्र रूप से बिकता था।
छोटे से क़स्बे में रहते हैं देवदास और पारो। देवदास के पिता पारो के परिवार से अधिक धनी हैं। शरारती देवदास अपने अध्यापकों को जितना सताता है, पारो उसकी उतनी ही दीवानी हो जाती है। एक बार जब पारो देवदास का कहना नहीं मानती तो वह उसे तमाचा मार बैठता है। जल्दी ही वे दोनों हंसते खेलते नज़र आते हैं।
देवदास को सुधारने और पढ़ा लिखा आधुनिक इंसान बनाने के लिए पिता उसे कलकत्ते भेज देते हैं। पारो सुनती है बाउलों का गीत–कृष्ण से बिछड़ी राधा की विरह वेदना का गीत।
दसेक साल बीत गए। पारो (सुचित्रा सेन) के घाट पर पानी लेने आई है। सहेली देवदास के आने की ख़बर देती है–कलकत्ते से आया है पूरा जेंटलमैन बना देवदास (दिलीप कुमार)– हाथ में छड़ी, कलाई पर घड़ी, सोने के बटन, गले में सोने का हार… पारो के दिल की धड़कन...


पारो विवाह योग्य हो गई है। दादी देवदास की मां से रिश्ते की बात चलाती है। देवदास का मुखर्जी परिवार हैसियत और धन दौलत के हिसाब से बहुत ऊंचा है। वह इनकार कर देती है। अपमानित पिता नीलकांत (शिवराज) ने तत्काल पारो का रिश्ता देवदास के घर से भी कहीं ज़्यादा धनवान घर में कर दिया।
पारो को भनक पड़ी तो सारा मान-सम्मान और समाज के रीति रिवाज का डर ताक़ पर रख कर अधरात देवदास से मिलने जा पहुंची। उसे पूरा भरोसा था कि देवदास उसे स्वीकार कर लेगा। लेकिन देवदास ने कहा, मुझे अपने माता पिता से अनुमति लेनी होगी। माता पिता के सहमत होने का सवाल ही नहीं था। देवदास में दम नहीं था माता पिता के विरुद्ध जाने का। वह कलकत्ता भाग गया। वहां से पारो को चिट्ठी भेज दी, हम दोनों मित्र हुआ करते थे, प्रेम की बात ही नहीं थी!” चिट्ठी भेज तो दी फिर अहसास हुआ कि वह कुछ ग़लत लिख गया है। भागा भागा गांव आया।


बड़े ज़ोर शोर से पारो की शादी की तैयारियां हो रही हैं। जिस धनी और बूढ़े विधुर ज़मींदार (मोनी चटर्जी) से पारो की शादी होने को है, उसके बच्चे पारो की उमर के हैं! देवदास घाट पर गया। पारो पानी भरने आई है। अभिमानिनी पारो ने देवदास को झिड़क दिया। आशुक्रोधी देवदास ने पारो के माथे पर छड़ी मार दी। फिर पछताया। पारो के माथे को सहलाने लगा।
कलकत्ते में देवदास का दोस्त नाचरंग का शौक़ीन चुन्नी (मोतीलाल) गया उसे नर्तकी चंद्रमुखी (वैजयंती माला) के पास। अब देवदास पूरा पियक्कड़ बन गया। चंद्रमुखी के लिए अब वह मात्र ग्राहक नहीं है। चंद्रमुखी उसे दिल से चाहने लगी है। उस की सेवासुश्रूषा करती है।


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पिता की मृत्यु पर देवदास गांव गया। ससुराल से पारो भी आई है। देवदास की आवारगी और बीमारी के समाचार सुन कर वह एक बार फिर उसके पास जाती है। उसकी देखभाल करने के इरादे से अपने साथ ले जाना चाहती है। देवदास सीधा सवाल करता है, अभी भाग चलोगी मेरे साथ?” पारो चुप। देवदास ने कहा, मरने से पहले एक बार आऊंगा तुम्हारे पास।
पियक्कड़ी और जीवन से निराशा से देवदास की सेहत बिगड़ती जा रही है। एक तरह से आत्मनाश की ओर बढ़ रहा है। अब जीवन से उसे कोई आस नहीं है। मन ही मन वह पारो और चंद्रमुखी की तुलना करता रहता है। समझ नहीं पाता कि दोनों में से किसे वह चाहता है।
अरविंद कुमार
मौत नज़दीक आ रही है। उसे याद आता है पारो को दिया अपना पुराना वादा – मरने से पहले एक बार ज़रूर मिलूंगा। पारो के घर की दहलीज़ पर उसका देहांत हो जाता है। पारो को उसके मरने की ख़बर मिलती है। मान मर्यादा त्याग वह देवदास को देखने दोड़ती है। घर वाले बाहर वाला फाटक बंद कर देते हैं।
यह कहानी किसी भी सफल फ़िल्मी फ़ॉर्मूला के सांचे में फ़िट नहीं बैठती, फिर भी इसकी निरंतर लोकप्रियता बनी रहती है। एक के बाद एक महत्वाकांक्षी गुणी निर्माता-निर्देशक इस पर अपनी कला मांजते हैँ। क्या है इसका रहस्य? एक विचारक ने कहा है कि पारो का और (वेश्यावृत्ति छोड़ने के बाद) चंद्रमुखी का आत्मबलिदानी अडिग अनन्य प्रेम। एक और का विचार है देवदास का आत्मनाशी पागलपन। या फिर अर्वाचीन से टकराव में प्राचीन का दिशाहीन हो जाना।

सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)


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