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रविवार, 5 अप्रैल 2020

बिमल रॉय ने मधुमति के जरिये क्या अपील की थी? जानिये अरविंद कुमार से...

फ़िल्म योगी बिमल रॉय-पांच, मधुमति विशेष
माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–129
 
मधुमति में दिलीप कुमार और बैजयंती माला
बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन, सुजाता, देवदास, बंदिनी जैसी तमाम फ़िल्मों से हट कर है ऋत्विक घटक की कहानी पर बनी मधुमति। अधिकांश फ़िल्म सामयिक होती हैं, मधुमति की अपील कालातीत है। एक समीक्षक ने इसकी तुलना रैमसे बंधुओं की डरावनी फ़िल्मों से की है। कहां वे, कहां भावभीनी कलात्मक, सुमधुर मधुमति!
पहले इस पर विहंगम दृष्टिपात:
भयानक रात, आंधी तूफ़ान। टेढ़े-मेढ़े पहाड़ी रास्ते। कार तीखे ख़तरनाक़ मोड़ों पर कहीं भी नीचे गिर सकती है। पिछली सीट पर बैठे हैं देवेंद्र (दिलीप कुमार) और उसका दोस्त डॉक्टर (तरुण बोस)। देवेंद्र को जल्दी है 20 मील दूर स्टेशन पहुंचने की, उसकी पत्नी और बच्चे आने वाले हैं। कार अचानक रोक ली ड्राइवर ने। बरसात में बड़े बड़े शिलाखंड सड़क पर गिर गए हैं। ड्राइवर ने सलाह दी उधर बंगले में आप टिक जाएं, मैं गांववालों को लाता हूं मदद के लिए। देर तक खटखटाने के बाद लालटेन थामे चौकीदार ने आकर दोनों को अंदर बुलाया। इधर-उधर देखते अचानक देवेंद्र ने पूछा, उस दीवार पर...एक पेंटिंग हुआ करती थी। चौकीदार ने कहा, हाँ। डॉक्टर अचरज में था।
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चौकीदार से चाय वाय के लिए पूछा। वह गोल सीढ़ियां चढ़ाकर ऊपर ले गया। चाय पीकर वे दोनों पलंगों पर आराम करने लगे।...देवेंद्र को कोई चीख़ सी सुनाई दी। वह उचका, फिर ऊंघने लगा। इस बार चीख़ कुछ देर तक सुनाई दी। दोनों नीचे हाल में आए। एक पेंटिंग दिखाई दी। देवेंद्र ने देखा तो बोला, यह मैंने बनाई थी!” चौकीदार ने बताया – यह टिंबर एस्टेट के स्वर्गीय मालिक उग्रनारायण की है। देवेंद्र को मानों अपना पिछला जन्म याद आ गया:


पहाड़ों की सुंदर दृश्यावली। बग़ल में झोला लटकाए आता नौजवान आनंद (दिलीप कुमार) प्राकृतिक सौंदर्य पर मुग्ध है। उधर नीचे स्त्रियां लाइन बांधे टोकनियां उठाए जा रही हैँ। कहीं भेड़ बकरियों के रेवड़ चल रहे हैं। वह गा रहा हैसुहाना सफ़र और यह मौसम हसीं, हमें डर है हम खोन जाएं कहीं।एक पहाड़ी मज़दूर से शामगढ़ का रास्ता पूछता है। अपनी भाषा में वह जो कहता है आनंद समझ नहीं पाता। इधर जाए या उधर जाए तय करने के लिए दुअन्नी का सिक्क उछालता है। सिक्का ऊपर ही रह गया। पेड़ पर बैठे चरणदास (जानी वाकर) ने पकड़ लिया है। यह चरणदास आनंद को लिवा लाने के लिए निकला था, पर यहां मस्ती कर रहा है। चरणदास उसे बंगले के कर्मचारियों से मिलवाता है। आनंद को आभास होता है कहीं कुछ घोटाला हो रहा है हिसाब किताब में। आनंद काग़ज़ पत्तर देख रहा है। दूर से आते अधसुने से बोल कान में पड़ते हैं – आ जा रे परदेसी। एस्टेट के रखवाले को चिट्ठी मिलती है – पुराने मालिक का बेटा आ रहा है, यहीं रहेगा। वह घबरा जाता है। कटे पेड़ों के तने इकट्ठे करवा रहा है।

बिमल रॉय और बैजयंती माला

आनंद के कानों में फिर वही गीत सुनाई पड़ता है। वह देखता है दूर कहीं दूर बहते दरिया के किनारे खड़ी पहाड़ी बाला मधुमति - ‘आ जा रे परदेसी मैं तो कब से खड़ी इस पार, ये अंखियां थक गईं पंथ निहार!’ युवती की अपने अज्ञात प्रेमी से मिलने की आकांक्षा।
आनंद को बताया गया है कि नदी के उस पार मत जाना। उस पार पान राजा का इलाक़ा है। कई साल पहले एस्टेट के कर्मचारी वीर सिंह ने पान राजा के बेटे को मार डाला था। अब पान राजा का आदेश है कि इधर जो भी आएगा मार डाला जाएगा। पान राजा के पुरखे हुआ करते थे राजा। इलाक़े की सारी सत्ता तो उग्रनारायण के कारिंदों के हाथों में है।
उस पहाड़ी बालासे आनंद मिलता है गाँव के मेले में।
बेतहाशा घोड़ा दौड़ाते घुड़सवार को परवाह नहीं है किस को क्या चोट लगती है। यह है पुराने मालिक का बेटा ठाकुर रुद्रनारायण सिंह (प्राण)। (वही जिसकी तस्वीर आनंद ने बंगले पर देखी थी, जो कभी पहले उसने बनाई थी।) घुटरियों चलने वाला कोई बच्चा घोड़े पैरों तले कुचला जाने वाला था। उसे बचाते बचाते आनंद को चोट आई। घुड़सवार चला गया। बच्चा मां की गोद में चला गया। मधुमति का बाप स्थानीय नुस्ख़ों से औषध और लेप बनाता है। वह आनंद को ले आई अपनी झोपड़ी तक और बाप से लेप लगवा दिया। पान सिंह को पता चला आनंद एस्टेट का मैनेजर है तो अपमानित कर के उसे दुत्कार दिया। फिर भी दोनों मिलते रहते हैं।

मधुमति में प्राण

उग्रनारायण की बुरी नज़र मधुमति पर पड़ी। आनंद ने उसकी दुष्टता के क़िस्से सुन रखे थे। वह कितना दुष्ट है – यह वह अब समझ पाता है। रास्ते से हटाने के लिए उग्रनारायण आनंद को काम के बहाने शहर भेजना चाहता है। अब तक पान राजा को आनंद की भलमनसाहत पर भरोसा हो गया था। पान राजा पास के किसी गांव जाना था। वह आनंद के भरोसे मधुमति को छोड़ गया। मधुमति ने आनंद से कहा, मत जाओ, बाबु। पर वह रुका नहीं: कुल दो दिन ही की तो बात है!” उसके जाने से पहले मधुमति उसकी रक्षा के लिए देवता के मंदिर ले गई। वहीं दोनों ने शादी कर ली।
उग्रनारायण के दुष्ट कारिंदे की जालसाज़ी का शिकार हो कर चरणदास गया मधुमति को बताने कि दुर्घटनाग्रस्त आनंद उग्रनारायण के पलंग पर बेहोश पड़ा है। तूफ़ानी रात में आंधी पानी की परवाह किए बग़ैर मधुमति वहां पहुंची। उग्रनारायण उसी के इंतज़ार में था। हम देखते हैं बांस के टट्टे को पकड़े मधुमति बचने की कोशिश कर रही है। हमें नहीँ दिखाया जाता वहां क्या हुआ। हम देखते हैं कि आनंद लौट आया है। मधुमति को ढूंढ़ रहा है। पान राजा भी लौट आया है। घर पर मधुमति नहीं है। घर ख़ाली है। उसका दुपट्टा मिलता है। पान राजा को विश्वास है कोई जंगली जानवर उसे खा गया है। एक जंगली जानवर नहीं, मधुमति वहशी इनसान का शिकार हो गई है।
आनंद पगला गया है। उसे पता चलता है कि उस रात मधुमति उग्रनारायण की हवेली पर देखी गई थी। आनंद ने आरोप लगाने शुरू किए – हो न हो उग्रनारायण ने कुछ किया है मधुमति के साथ। वह नौकरी से निकाल दिया गया। कड़की के दिन आ गए – कभी खाता, कभी न भी खा पाता। दिन रात मधुमति के स्कैच बनाता रहता। और इसी हालत में उस ने देखी – मधुमति! वह मधुमति नहीं माधवी (वैजयंती माला) है। पिकनिक पर उस के साथ है पुलिस अफ़सर भाई। तीनों योजना बनाते हैं कि उग्रनारायण से सच कैसे उगलवाया जाए। मतलब माधवी को मधुमति बना कर पेश किया जाएगा।
मधुमति का एक दृश्य
योजना के अनुसार आनंद जाता है उग्रनारायण के महल। उसे मनाता है, ख़ुश करता है। जाने से पहले वह उसकी तस्वीर बनाना चाहता है। तय हुआ कि तस्वीर अगली शाम बनाई जाएगी। तस्वीर बन गई। ठीक आठ बजे के घंटे बजे। उग्रनारायण ने देखा सामने बैठी है मधुमति! मधुमति सवाल पूछ रही। घटना की याद दिला रही है। उस रात जो कुछ हुआ उस की याद दिला रही है। उग्रनारायण जड़ तक हिल गया है। माफ़ी मांगता सब कुछ उगल रहा है। पुलिस सुन रही है स्वीकारोक्ति - उसने मधुमति को मारा था। पुलिस के लिए यह काफ़ी है।
लेकिन आनंद को अचंभा यह है कि जो सवाल मधुमति पूछ रही थी, वे तो माधवी को ज्ञात ही नहीं हैं। यहां तक कि स्वयं आनंद को भी उन का ज्ञान नहीं था। सीढ़ियां चढ़ती मधुमति रहस्यमय मुस्कान से आमंत्रण दे रही है।
इधर माधवी दौड़ती आती है। रास्ते में उसकी कार ख़राब हो गई थी, इसलिए देरी से पहुंची है।
अब आनंद की समझ में आया जो अब तक बैठी थी, वह मधुमति का भूत था। मधुमति का भूत उसे बुला रहा है, आनंद उस के पीछे आ रहा है। वह उसे ले जाती है वहां उग्रनारायण से बचने को वह छत से कूदी थी। आनंद भी कूद जाता है।

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सुबह हो गई है। देवेंद्र को समाचार मिलता है कि जिस ट्रेन से उस की पत्नी आ रही थी, उस की दुर्घटना हो गई थी। अब तक रास्ता साफ़ हो चुका है। देवेंद्र और डॉक्टर स्टेशन पहुंचते हैं। ट्रेन भी आ गई है। राधा और बच्चा सकुशल हैं।


गीत संगीत की बात करें तो मधुमति का पहला सुहाना सफ़र हिंदी के श्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है। मुकेश की आवाज़, चिड़ियों की चहचहाट, फ़्लूट की ध्वनि प्रतिध्वनि...ये आसमां झुक रहा है ज़मीं पर…

अरविंद कुमार
कुछ समय बाद लता मंगेशकर की आवाज़ में अज्ञात प्रेमी को पुकारता आ जा रे परदेसी मैं तो कब से खड़ी इस पार… लता के दस श्रेष्ठ गीतों में से एक... इस के बारे में शैलेंद्र जी के बेटे दिनेश शंकर शैलेंद्र ने लिखा है –
दिलीप कुमार वन में है, चहचहाट, दिलीप ने झोला वृक्ष के कटे तने पर रख दिया, पेड़ों पर से बहती आ रही है पुकार आ जा रे परदेसी... दिलीप कुमार रुकता है, सुनता है, मानो कोई उसे ही पुकार रही है... आवाज़ की तरफ़ दौड़ता सा है...फ़्लूट, मधुर मद्धम वायलिन, सैलो, पियानो... दिलीप कुमार और दर्शक उत्सुक हैं कौन है जो बुला रही है... पहाड़ों में नीचे देखता है... एक युवती.. दूर... दूर... कैमरा दिखाता है नदी किनारे गायिका... वैजयंती माला का लौंग शौट... वह गा रही है,‘मैं तो कब से खड़ी इस पार... यहां से उठान लेती है धुन...मैंडोलिन, वायलिन, क्लैवायलिन...मैं दीए की ऐसी बाती, जल ना सकी जो, बुझ भी न पाती, आ मिल मेरे जीवन साथी...
और इस के विपरीत मोहम्मद रफ़ी का गाया टूटे हुए ख़्वाबों ने जिसमें पूरा स्क्रीन अंधकारमय हो जाता है।
मधुमति के बारह गीतों में मुझे ख़ास पसंद है मधुमति में सबसे लंबा 5.54 मिनट वाला लता मंगेशकर और मन्ना डे का गाया गीत चढ़ गयो पापी बिछुआ’:

सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

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