कैसे शुरू हुआ पिक्चर प्लस में माधुरी सिनेवार्ता संस्मरण लिखने का सिलसिला? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 19 अप्रैल 2020

कैसे शुरू हुआ पिक्चर प्लस में माधुरी सिनेवार्ता संस्मरण लिखने का सिलसिला?


पंद्रह की उम्र में ही प्रेस से जुड़ गये, नब्बे की उम्र में भी लिख रहे हैं
माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–131
अरविंद कुमार

मेरे प्रिय पाठकों और माधुरी के प्रशंसकों।
मैं लिखता रहा आप पढ़ते रहे, मेरे बॉलीवुड के संस्मरण। कभी आप को बहुत पसंद आए, कभी जिसे कहते हैं– सो सो...फिर भी वह सिलसिला चलता रहा, जो कभी शुरू हुआ था।
[जहां तक मुझे याद है-18 सितंबर 1963 (शायद छोटी दीवाली) 
मैँ बंबई जाने वाली शताब्दी मेँ सवार था। वहां टाइम्स परिवार के लिए नई फ़िल्म पत्रिका निकालनी थी। बीसियोँ प्रसन्न मित्र और परिवारजन बधाई देने और विदा करने आए थे। 21 सितंबर सोमवार। मैँ टाइम्स के दफ़्तर जा पहुंचा और तत्कालीन जनरल मैनेजर प्रताप कुमार राय से मिला। यह तय था कि पत्रिका का पहला अंक गणराज्य दिवस 26 जनवरी 1964 को बाज़ार मेँ आएगा। समय कम था, कम नहीं लगभग था ही नहीं। 
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मुझे दफ़्तर के लिए फ़िलहाल एक अस्थायी केबिन दिलवा दिया। पूछा-स्टाफ़ में कितने जन चाहिएं। मैँने कहा- एक टाइपिस्ट तथा चार संपादकीय कर्मी, उन मेँ से एक वह हो जो टाइम्स कार्यालय मेँ कहां क्या है, कौन क्या है जानता हो, एक फ़िल्म जगत से सुपरिचित और दो बिल्कुल अनुभवहीन ट्रेनी। धीरे धीरे, छह सात दिन मेँ मुझे मिले धर्मयुग के जैनेंद्र जैन, दो ट्रेनी विनोद तिवारी, रमेशचंद्र जैन। महेंद्र सरल बाद मेँ आए। हां, एक टाइपिस्ट तत्काल मिल गया।
जहां तक फ़िल्मोँ का सवाल है–मैँ कोरा काग़ज़ था, फिल्म उद्योग भी मेरे लिए कोरा काग़ज़ था। न मैँ उसे जानता था, न वह मुझे।]

युवा अरविंद कुमार
मैंने बहुत कुछ सीखा, जो भी सीखा काम करते करते सीखा। शिक्षा दीक्षा में हम सीखते हैं पाठ्य विषयों की जनकारी। उससे भी ज़्यादा सीखते हैं, उस जानकारी का अपने दिमाग़ से उपयोग। असली शिक्षा शुरू होती है कार्यालयों से, सांसारिक व्यवहार से।
मेरी शिक्षा शुरू हुई नई दिल्ली के कनॉट सर्कस के एम ब्लॉक में दिल्ली प्रैस से, जहां आजकल दिल्ली बुक कंपनी का शो रूम है। तब वहां छापेख़ाना था। वहां सबसे निचली पायदान होती है–एकएक अक्षर जोड़कर एक पंक्ति, फिर पैरा, फिर पूरा लेख बनाना, या दुकानदारों के बिल और रसीद बनाना। लेकिन यह सीखने से भी पहले सीखना होता था छपी सामग्री में जो अक्षर या छापेख़ाने की भाषा में टाइप उन्हें कंपोज़िंग में काम आने वाले केसों में सही जगह डालना। इसे कहते थे डिस्ट्रीब्यूशन। कंपोज़िंग वाली पायदान से भी निचली पायदान होती थी यह डिस्ट्रीब्यूशन। यह करने वाले को डिस्ट्रीब्यूटर कहा जाता था। तो सन् 1945 के अप्रैल महीने में मैं डिस्ट्रीब्यूशन सीखने दाख़िल हुआ था। मेरे उस्ताद थे मुहम्मद शफ़ी, मुझसे सीनियर था बलबीर। उन दोनों और मुझमें एक बड़ा भारी अंतर था। उनके लिए अ आ इ ई या ए बी सी डी के ज्ञान से बढ़ कर कुछ और नहीं था। उम्र में वे मुझ से बड़े थे। मैं कुल पंद्रह साल ढाई महीने का था, साथ ही मैंने इंग्लिश, हिन्दी, संस्कृत के साथ गणित आदि विषयों में दिल्ली बोर्ड की दसवीं की परीक्षा दी थी, रिजल्ट आने पर मुझे चार विषयों में डिस्टिंक्शन मिला था।
अपनी पुस्तकों के साथ अरविंद कुमार
दिल्ली प्रैस में मैं लगभग हर साल, कई बार हर छह महीने बाद किसी न किसी ऊपर वाली पायदान पर चढ़ता चला गया।
इसके कई कारण थे। अन्य श्रमिकों से अलग मेरा एक सामाजिक जीवन भी था। मेरी रुचि स्वतंत्रता आंदोलन में भी थी। वहां मेरे कुछ साथी बस मुझ जितना पड़े थे और दफ़्तरों में काम करते थे। कुछ बहुत ज़्यादा पढ़े लिखे थे। मुझ जितना पढ़े साथी कुछ और पढ़ कर तरक्की करना चाहते थे। देश के विभाजन से जो लोग पाकिस्तान से उजड़ कर आए थे, उनकी सहायता के लिए देश शाम को पढ़कर आगे बढ़ने की सुविधा दे रहा था। हमलोग भी उनके साथ पढ़ने लगे। धीरे-धीरे मैं 1957 में इंग्लिश साहित्य में एम.ए. कर लिया और दिल्ली प्रैस से छपने वाली सरिता और कैरेवान से संपादकीय विभागों में चोटी तक जा पहुंचा। धीरे-धीरे 1963 आ गया। हमारे संपादक-प्रकाशक श्री विश्वनाथ से अनावश्यक से मतभेद के कारण मैंने इस्तीफ़ा दे दिया। तभी मुझे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुंबई कार्यालय से हिन्दी में फ़िल्म पत्रिका आरंभ करने का ऑफ़र मिला और. . .
18 सितंबर 1963 (शायद छोटी दीवाली)। मैँ बंबई जाने वाली शताब्दी मेँ सवार था। वहां टाइम्स परिवार के लिए नई फ़िल्म पत्रिका निकालनी थी। बीसियोँ प्रसन्न मित्र और परिवारजन बधाई देने और विदा करने आए थे।
माधुरी के संपादन काल में मैंने बहुत कुछ सीखा।
आगे की कहानी आप स्वयं पढ़ते आए हैं।
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1945 में वह जो छोकरा था पंद्रह साल ढाई महीने का वह अभी जनवरी 2020 में नब्बे साल का हो गया। माधुरी छोड़ कर मैंने अपनी पत्नी कुसुम के सहयोग से बीस साल लगा कर हिन्दी में पहला थिसारस बनाया। दिसंबर 1996 में उसका पहला सैट तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा को भेंट किया। उसके बाद कई और थिसारस जैसे कोश बनाए। कई सम्मान मुझे मिले।

अरविंद कुमार और पिक्चर प्लस संपादक संजीव श्रीवास्तव
पिक्चर प्लस के संपादक श्री संजीव श्रीवास्तव बड़े चतुर हैं। लगभग तीन साल पहले वे मुझे एक बार फिर बॉलीवुड और माधुरी में ले जाने में जुट गए। परिणाम हुआ ई पत्रिका पिक्चर प्लस में मेरे संस्मरणों वाला सिलसिला। पूरे ढाई साल में मैंने अपने संस्मरणों के 130 भाग लिखे और आप ने पढ़े।
जैसा मैंने लिखा-1945 में वह जो छोकरा था पंद्रह साल ढाई महीने का वह अभी जनवरी 2020 में नब्बे साल का हो गया।
वह छोकरा अपने स्वतंत्र लेखन में जाने को उतावला हो गया है। उसे लगता है कि और बहुत कुछ है जो उसे समाज को देना है। उसके मन में कई किताबें मचल रही हैं। वे क्या होंगी इसकी विशद रूपरेखा उसके मन में है। वे कब पूरी होंगी, यह पता नहीं है।
जब भी उसे संतोष हो जाएगा, उसके बाद एक बार फिर वह आप की सेवा में हाज़िर होगा।
उसे विश्वास है आप सबका आशीर्वाद, आप की शुभकामनाएं उसके साथ हैं।
बार-बार अनेक धन्यवादों के साथ नब्बे साल, ढाई महीने का वह छोकरा-
अरविंद कुमार...।

(वीडियो में अरविंद कुमार को सुनने के लिए निम्नांकित लिंक्स को क्लिक करें:-
सिनेवार्ता’ फिर आयेगी...!
संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट:श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)
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